Author : Gopal Dutt Sharma
हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने की दिशा में सिरमौर जिले के जालग क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल देखने को मिली। यहां आयोजित मुखौटा निर्माण एवं मुखौटा नृत्य प्रशिक्षण कार्यक्रम ने न केवल युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य किया, बल्कि धीरे-धीरे विलुप्त होती इस अनमोल कला को नई पहचान और नई ऊर्जा भी प्रदान की। कार्यक्रम का उद्देश्य पारंपरिक कलाओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना और लोक संस्कृति को जीवंत बनाए रखना था।
गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में युवा कलाकारों को पारंपरिक मुखौटा निर्माण की विभिन्न विधियों का विस्तृत प्रशिक्षण दिया गया। इसके साथ ही उन्हें मुखौटा नृत्य की शैली, भाव-भंगिमा, प्रस्तुति और सांस्कृतिक महत्व के बारे में भी जानकारी दी गई। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों ने गहरी रुचि दिखाई और अपनी कला क्षमता का प्रभावशाली प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध लोक कलाकारों के मार्गदर्शन में किया गया, जिन्होंने वर्षों से इस कला को जीवित रखने के लिए निरंतर कार्य किया है। प्रशिक्षण के दौरान कलाकारों को लकड़ी, मिट्टी और अन्य पारंपरिक सामग्रियों से मुखौटे तैयार करने की तकनीकों से अवगत कराया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि मुखौटा कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोक जीवन, आस्था और सामाजिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मूल्यांकन के लिए पहुंचे विशेषज्ञों ने प्रशिक्षुओं द्वारा तैयार किए गए मुखौटों और प्रस्तुतियों का बारीकी से निरीक्षण किया। इस दौरान कलाकारों ने पारंपरिक शैली में तैयार किए गए मुखौटों का प्रदर्शन किया तथा विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी प्रतिभा दिखाई। विशेष रूप से लोक संस्कृति से जुड़े पारंपरिक नृत्यों ने दर्शकों और विशेषज्ञों का मन मोह लिया।
कार्यक्रम में प्रस्तुत किए गए सिंहटू और डग्याली नाच ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। इन प्रस्तुतियों में कलाकारों ने पारंपरिक वेशभूषा और मुखौटों का उपयोग करते हुए क्षेत्रीय संस्कृति की झलक पेश की। विशेषज्ञों ने कहा कि ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी पहचान और विरासत से जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकते हैं। उन्होंने माना कि लोक नृत्य और मुखौटा परंपरा का संरक्षण समय की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों ने बताया कि आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के कारण कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे समाप्त होने की स्थिति में पहुंच रही हैं। ऐसे में सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए प्रशिक्षण आधारित कार्यक्रम बेहद जरूरी हैं। इनसे युवा पीढ़ी न केवल कला सीखती है बल्कि उसके महत्व को भी समझती है।
कार्यक्रम में मौजूद गणमान्य व्यक्तियों और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि यह पहल प्रदेश की पहचान को मजबूत करने में सहायक सिद्ध होगी। उन्होंने कहा कि यदि इस प्रकार के प्रयास लगातार जारी रहे तो हिमाचल की अनेक विलुप्तप्राय कलाओं को नया जीवन मिल सकेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि हिमाचली परंपरा और लोक कलाओं का संरक्षण केवल कलाकारों की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। जालग में आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ है, जिसने युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने के साथ-साथ लोक कला संरक्षण का मजबूत संदेश भी दिया है।
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