Post by : Samir
हिमाचल प्रदेश के कई प्रमुख उत्सव अब अपने मूल स्वरूप और स्थानीय कलाकारों से दूर होते जा रहे हैं। शिमला विंटर कार्निवल, कांगड़ा कार्निवाल और इंदौरा उत्सव जैसे समारोह अब अक्सर बाहरी कलाकारों और बड़े बजट वाली प्रस्तुतियों का केंद्र बन गए हैं। जबकि हिमाचल की समृद्ध संस्कृति, परंपरागत संगीत और लोक कलाकार इन आयोजनों का असली हकदार हैं, उन्हें अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।
जिला स्तर के समारोह अब राज्यस्तरीय होने के बावजूद अपनी सांस्कृतिक विरासत खोते जा रहे हैं। कभी कुल्लू दशहरा जैसी महफिलें अंतरराष्ट्रीय संगीत समूहों के मुकाबले अपने स्थानीय कलाकारों की प्रतिभा दिखाती थीं, वहीं अब इन आयोजनों में राजनीतिक रंग और बाहरी कलाकारों का प्रभुत्व बढ़ गया है। उदाहरण के तौर पर, चिन्तपूर्णी या इंदौरा उत्सव में पंजाब के गायक अमृत मान या लखविंदर वड़ाली जैसे कलाकारों को बुलाया जाता है, जबकि कांगड़ा और आसपास के इलाके के नामी हिमाचली गायक—जैसे सुनील मस्ती, अनुज शर्मा, कुमार साहिल और काकू राम ठाकुर—को मौका कम मिलता है।
स्थानीय कलाकारों की उपेक्षा केवल सांस्कृतिक नुकसान ही नहीं, बल्कि आर्थिक नुकसान भी साबित हो रही है। बड़े बजट का एक बड़ा हिस्सा बाहरी कलाकारों पर खर्च हो जाता है, जबकि हिमाचली कलाकारों को उचित सम्मान और पारिश्रमिक नहीं मिल पाता। करनैल राणा, संजीव दीक्षित, धीरज शर्मा, ईशांत भारद्वाज और सुनील राणा जैसे लोक कलाकारों का योगदान इन आयोजनों में महत्वपूर्ण हो सकता है, फिर भी उन्हें स्वतंत्र मंच और सम्मानजनक पारिश्रमिक की कमी रहती है।
हिमाचल के उत्सवों की यह स्थिति चिंता का विषय है। पर्यटन और सांस्कृतिक महफिलों को केवल शोर-शराबे और बाहरी प्रदर्शनियों तक सीमित करना स्थानीय संस्कृति और कलाकारों के लिए एक चुनौती बन गया है। विशेषज्ञ और कला प्रेमियों का मानना है कि प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कम से कम 50% बजट स्थानीय कलाकारों और हिमाचली कला को प्रोत्साहन देने में लगे। केवल तभी हिमाचल के उत्सव अपने असली स्वरूप और सांस्कृतिक गरिमा को बरकरार रख पाएंगे।
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