हिमाचल में बनेगा देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट, पर्यावरण संरक्षण को मिलेगी नई ताकत
हिमाचल में बनेगा देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट, पर्यावरण संरक्षण को मिलेगी नई ताकत

Post by : Himachal Bureau

July 1, 2026 12:12 p.m. 127

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के नेरी में देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट स्थापित किया जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य जंगलों और कृषि क्षेत्रों से मिलने वाले जैविक अवशेषों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना और राज्य को कार्बन क्रेडिट दिलाना है। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिंह सुक्खू ने परियोजना की समीक्षा करते हुए कहा कि यह पहल हिमाचल प्रदेश के हरित विकास और जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

बायोचार प्लांट क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

बायोचार प्लांट एक ऐसी इकाई है, जहां पेड़-पौधों और कृषि से निकलने वाले जैविक अवशेषों को विशेष प्रक्रिया के जरिए बायोचार में बदला जाता है। बायोचार मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने, नमी बनाए रखने और कार्बन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करता है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ खेती को भी लाभ मिलता है। यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में इस तकनीक को जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रभावी उपाय के रूप में अपनाया जा रहा है।

तीन संस्थाओं के सहयोग से शुरू हुई परियोजना

इस परियोजना को डॉ. वाई.एस. परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, हिमाचल प्रदेश वन विभाग और चेन्नई की प्रोक्लाइम सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड मिलकर विकसित कर रहे हैं। पिछले वर्ष अगस्त में तीनों संस्थाओं के बीच समझौता हुआ था। इसके तहत हमीरपुर के नेरी और जाहू में दो बायोचार प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैविक संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सके।

मुख्यमंत्री ने बताए परियोजना के बड़े फायदे

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि यह परियोजना केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगी। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा, वन संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और हिमाचल प्रदेश को कार्बन क्रेडिट के माध्यम से अतिरिक्त आय भी प्राप्त होगी। उन्होंने कहा कि यह परियोजना राज्य को हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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किन संसाधनों से तैयार होगा बायोचार?

इस परियोजना में चीड़ की सूखी पत्तियां, लैंटाना, बांस और अन्य पेड़-पौधों से मिलने वाले जैविक अवशेषों का उपयोग किया जाएगा। इन अवशेषों से तैयार होने वाला बायोचार मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद करेगा। परियोजना के तहत बायोमास एकत्र करने वाले लोगों से 2.50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीद की जाएगी। बेहतर गुणवत्ता का बायोमास उपलब्ध कराने वालों को अतिरिक्त प्रोत्साहन राशि भी दी जाएगी।

कार्बन क्रेडिट से कैसे होगा लाभ?

राज्य सरकार के अनुसार अगले दस वर्षों में इस परियोजना से लगभग 28,800 कार्बन क्रेडिट मिलने की संभावना है। कार्बन क्रेडिट ऐसी व्यवस्था है, जिसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों से आर्थिक लाभ भी प्राप्त किया जा सकता है। इससे हिमाचल प्रदेश की हरित परियोजनाओं को नई मजबूती मिलेगी और राज्य की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

किसानों और खेती को मिलेगा सीधा फायदा

इस परियोजना के साथ जलवायु-अनुकूल कृषि और कृषि वानिकी कार्यक्रम भी चलाया जाएगा। इसके तहत खेती के साथ पेड़ लगाने को बढ़ावा दिया जाएगा। यह कार्यक्रम प्रदेश के लगभग 50 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में लागू होगा। इससे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरेगी, फसलों की उत्पादकता बढ़ेगी, किसानों की आय में सुधार होगा और खेती जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक मजबूत बनेगी।

परियोजना की निगरानी के लिए भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस), रिमोट सेंसिंग और डिजिटल डेटा संग्रह प्रणाली का उपयोग किया जाएगा। इन तकनीकों के माध्यम से परियोजना की प्रगति पर लगातार नजर रखी जाएगी। साथ ही अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार के मानकों के अनुसार सभी आंकड़े तैयार किए जाएंगे, जिससे पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और विश्वसनीय बनी रहे।

प्रोक्लाइम के सलाहकार बोर्ड के सदस्य और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के पूर्व कार्यकारी निदेशक एरिक सोलहाइम ने हिमाचल सरकार की इस पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक तकनीक और स्थानीय स्तर पर प्रभावी कार्यान्वयन को साथ लेकर ही जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौती का समाधान किया जा सकता है। उनके अनुसार यह परियोजना अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती है।

हिमाचल के हरित विकास की दिशा में बड़ा कदम

हमीरपुर में स्थापित होने वाला देश का पहला स्वदेशी बायोचार प्लांट पर्यावरण संरक्षण, रोजगार, किसानों की आय बढ़ाने और वन संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यदि यह परियोजना सफल रहती है, तो भविष्य में इसे देश के अन्य राज्यों में भी लागू किया जा सकता है। इससे हिमाचल प्रदेश को हरित विकास, सतत कृषि और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने वाले अग्रणी राज्यों में शामिल होने का अवसर मिलेगा।

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