Author : Rajesh Vyas
हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते पर्यावरणीय संकट, जल स्रोतों के संरक्षण और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए युवाओं को तैयार करने के उद्देश्य से एक माह का राष्ट्रीय प्रशिक्षण एवं इंटर्नशिप कार्यक्रम शुरू किया गया है। यह कार्यक्रम एच.एन.बी. गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (उत्तराखंड) के भूगोल विभाग तथा इंद्रप्रस्थ कॉलेज फॉर वूमेन, दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ हिमालयन रिसर्च के संयुक्त सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। यह प्रशिक्षण 22 जुलाई 2026 तक चलेगा, जिसमें प्रतिभागियों को हिमालयी पारिस्थितिकी, जल सुरक्षा और आपदा जोखिम न्यूनीकरण से जुड़े विषयों का व्यावहारिक ज्ञान दिया जाएगा।
हिमालय में जलवायु परिवर्तन क्यों बड़ी चुनौती बन रहा है?
कांगड़ा उपायुक्त हेमराज बैरवा ने कहा कि जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का समाधान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, शिक्षण संस्थानों और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर सहयोग जरूरी है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार किए गए समाधान ही लंबे समय तक प्रभावी साबित हो सकते हैं। उन्होंने युवाओं से पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाने की अपील भी की।
कार्यक्रम के निदेशक प्रोफेसर एम.एस. पंवर ने बताया कि किसी भी क्षेत्र के जल स्रोत वहां की भू-वैज्ञानिक संरचना पर निर्भर करते हैं। उन्होंने स्प्रिंगशेड प्रबंधन और वैज्ञानिक जल प्रबंधन को समय की जरूरत बताते हुए कहा कि सूखते प्राकृतिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए उनके रिचार्ज क्षेत्रों की पहचान जरूरी है। प्रतिभागियों को फील्ड अध्ययन के दौरान भू-वैज्ञानिक संरचनाओं और जल प्रवाह का गहन अध्ययन करने का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा।
हिमालयी ग्लेशियरों का संरक्षण क्यों जरूरी है?
सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज के प्रोफेसर बी.डब्ल्यू. पांडे ने कहा कि हिमालय दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल है। बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना और अनियोजित विकास इस क्षेत्र के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि हिमालयी ग्लेशियर करोड़ों लोगों की जल आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, इसलिए इनके संरक्षण के लिए सभी को जिम्मेदारी निभानी होगी।
कांगड़ा सहित हिमालयी क्षेत्रों में जल संकट कैसे बढ़ रहा है?
प्रोफेसर वी.के. पुरोहित ने कहा कि जल स्रोतों पर बढ़ता दबाव मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों का परिणाम है। उन्होंने वनों के संरक्षण और ओक तथा रोडोडेंड्रॉन जैसे चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उनके अनुसार ये पेड़ भूजल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में युवाओं को क्या-क्या सिखाया जाएगा?
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, जल गुणवत्ता परीक्षण, स्प्रिंगशेड प्रबंधन, जीआईएस एवं जीपीएस आधारित मानचित्रण, मौसम विज्ञान, आपदा जोखिम न्यूनीकरण और ग्राम स्तरीय जलवायु कार्य योजना तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में फील्ड विजिट कराकर स्थानीय समुदायों के साथ काम करने का अनुभव भी दिया जाएगा।
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विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम युवाओं में वैज्ञानिक सोच, नेतृत्व क्षमता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी विकसित करते हैं। इससे भविष्य में हिमालयी क्षेत्रों में जल संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और आपदा जोखिम को कम करने की दिशा में प्रशिक्षित युवा प्रभावी भूमिका निभा सकेंगे।
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