बर्फ में दब गईं उम्मीदें, भरमौर-पांगी का सवाल— चुनाव के बाद क्या रास्ता भूल गईं कंगना रनौत
बर्फ में दब गईं उम्मीदें, भरमौर-पांगी का सवाल— चुनाव के बाद क्या रास्ता भूल गईं कंगना रनौत

Author : Ashok Kumar Chamba

Feb. 10, 2026 10:50 a.m. 618

हिमाचल प्रदेश के सुदूर जनजातीय क्षेत्र भरमौर और पांगी इन दिनों केवल भारी बर्फबारी से ही नहीं, बल्कि राजनीतिक उपेक्षा के एहसास से भी जूझ रहे हैं। हाल ही में हुई भीषण बर्फबारी के दौरान क्षेत्र ने अपने दो युवा बेटों को खो दिया। यह हादसा पूरे इलाके के लिए गहरा आघात बन गया, लेकिन इस दुख की घड़ी में स्थानीय लोगों को अपनी सांसद की गैरमौजूदगी और भी ज्यादा खल गई।

भरमौर और पांगी मंडी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा हैं, जहां से सांसद कंगना रनौत निर्वाचित हुई हैं। चुनाव प्रचार के दौरान “पहाड़ की बेटी” बनकर क्षेत्र से भावनात्मक जुड़ाव दिखाया गया, लेकिन आपदा के समय उनकी अनुपस्थिति ने लोगों के भरोसे को झकझोर दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि संकट की घड़ी में एक जनप्रतिनिधि की मौजूदगी प्रशासन को सक्रिय करने और पीड़ित परिवारों को संबल देने के लिए बेहद जरूरी होती है।

भरमौर में बर्फीले तूफान के कारण दो जिंदगियों के खत्म हो जाने से पूरे क्षेत्र में शोक का माहौल है। ऐसे समय में सांसद का मौके पर न पहुंचना लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या वोट की अहमियत इंसानी जान से ज्यादा हो गई है। जनता का कहना है कि चुनाव के समय जिन दुर्गम रास्तों पर चलकर वोट मांगे गए, वही रास्ते आपदा के समय पार नहीं किए गए।

स्थानीय लोग मानते हैं कि संवेदना केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार असली नेतृत्व वही है जो आपदा के समय ज़मीन पर उतरकर हालात का जायजा ले और पीड़ितों के साथ खड़ा हो। सांसद की गैरमौजूदगी से प्रशासन की सक्रियता पर भी असर पड़ने की बात कही जा रही है।

भरमौर-पांगी की जनता अपनी सांसद से यह सवाल पूछ रही है कि क्या सांसद का दायित्व केवल संसद भवन तक सीमित है। क्या यह क्षेत्र केवल चुनावी वोट बैंक बनकर रह गया है। क्या रील लाइफ का हीरो असली जीवन की आपदाओं में पीछे हट जाता है। साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि सड़क, संचार और स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझ रहे इस क्षेत्र की अनदेखी कब तक होती रहेगी।

यह घटना भरमौर-पांगी के लिए केवल एक प्राकृतिक त्रासदी नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधित्व की परीक्षा भी बन गई है। जनता आज जवाब चाहती है और उम्मीद करती है कि उनकी आवाज सुनी जाएगी। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक बर्फ से ढके इन पहाड़ों में यही सवाल गूंजता रहेगा कि चुनाव जीतने के बाद क्या उनके रास्ते भुला दिए गए।

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