Post by : Shivani Kumari
16 अक्टूबर 2025 को देहरादून में आयोजित जलवायु बैठक ने पश्चिमी हिमालय के ग्लेशियरों में 70 प्रतिशत कमी की गंभीर समस्या को विश्व के सामने रखा। यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया के करोड़ों लोगों की जीवन रेखा—गंगा, यमुना, और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों—को प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण बर्फ का तेजी से पिघलना कृषि, जल आपूर्ति, और पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे में डाल रहा है। बैठक में वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, और पर्यावरणविदों ने हिमालय संरक्षण और कृषि आधारित समाधानों पर गहन विचार-विमर्श किया। यह लेख इस संकट की गहराई, इसके प्रभाव, और समाधानों को विस्तार से समझाता है।
हिमालय, जिसे "तीसरा ध्रुव" कहा जाता है, विश्व का सबसे बड़ा गैर-ध्रुवीय बर्फ भंडार है। यह 1.9 बिलियन लोगों के लिए जल का प्रमुख स्रोत है। गंगा, यमुना, और सिंधु जैसी नदियां हिमालयी ग्लेशियरों से निकलती हैं, जो भारत, पाकिस्तान, नेपाल, और बांग्लादेश की कृषि और अर्थव्यवस्था को आधार देती हैं। लेकिन पिछले 50 वर्षों में जलवायु परिवर्तन ने इस नाजुक पारिस्थितिकी को संकट में डाल दिया है।
1970 के दशक से हिमालयी ग्लेशियरों में कमी शुरू हुई, लेकिन 2000 के बाद यह गति दोगुनी हो गई। अंतरराष्ट्रीय केंद्र के लिए एकीकृत पर्वत विकास (ICIMOD) की 2023 रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिमी हिमालय में ग्लेशियरों का क्षेत्रफल 1990 के 10,768 वर्ग किलोमीटर से घटकर 2021 में 3,258 वर्ग किलोमीटर रह गया। यानी 70% बर्फ गायब हो चुकी है। तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि और कालिख (ब्लैक कार्बन) प्रदूषण ने इस संकट को बढ़ाया।
देहरादून जलवायु बैठक में प्रस्तुत "हिमालय क्षेत्र में बहु-आपदा जलवायु चेतावनी प्रणाली" रिपोर्ट ने चौंकाने वाले आंकड़े दिए। पश्चिमी हिमालय के ग्लेशियर 0.85 मीटर प्रति वर्ष की दर से पीछे हट रहे हैं। 2100 तक 75-80% ग्लेशियर लुप्त हो सकते हैं। गंगा नदी का प्रवाह 20% तक कम हो सकता है, जो 75 करोड़ लोगों की जल आपूर्ति को प्रभावित करेगा। यमुना नदी, जो दिल्ली और उत्तर भारत की जीवन रेखा है, पहले ही 30% प्रवाह कमी का सामना कर रही है।
हिमालयी ग्लेशियरों की कमी ने कृषि को सबसे अधिक प्रभावित किया। अनियमित मानसून, अतिवृष्टि, और सूखे ने फसलों को नष्ट किया। 2024 में उत्तराखंड में 40% धान की फसल बर्बाद हुई, जबकि पंजाब और हरियाणा में गेहूं उत्पादन 15% कम हुआ। जलवायु परिवर्तन के कारण सिंचाई जल की कमी से 22% कृषि भूमि बंजर होने की कगार पर है।
ग्लेशियर पिघलने से हिमनद झीलें (GLOFs) बन रही हैं, जो अचानक फटने पर भूस्खलन और बाढ़ का कारण बनती हैं। 2023 में सिक्किम की ल्होनक झील फटने से 60 लोगों की मौत हुई थी। बैठक में ऐसी 200 संभावित खतरनाक झीलों की निगरानी के लिए उपग्रह और ड्रोन तकनीक की सिफारिश की गई।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा, "हिमालय हमारी धरोहर है। इसके संरक्षण के लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी है। हमने ग्लेशियर निगरानी समिति बनाई है।" वैज्ञानिक विश्वंभर प्रसाद सती ने चेतावनी दी, "ग्लेशियरों का पिघलाव जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा संकेत है। अगर हम अभी नहीं जागे, तो दक्षिण एशिया में जल युद्ध शुरू हो सकता है।" ICIMOD की अमिना महारजन ने कहा, "हिमालयी समुदाय जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े शिकार हैं, जबकि उनका कार्बन उत्सर्जन न्यूनतम है। वैश्विक सहयोग जरूरी है।"
क्षेत्रीय मौसम केंद्र के निदेशक चंदर सिंह तोमर ने बताया, "हम नासा के निसार उपग्रह के साथ ग्लेशियर गतिविधियों की निगरानी बढ़ा रहे हैं। यह 2026 तक पूरी तरह कार्यरत होगा।" विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि जलवायु चेतावनी प्रणाली में ड्रोन, AI, और सेंसर का उपयोग बढ़ाया जाए।
बैठक की खबर ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया। #हिमालयग्लेशियरकमी और #जलसंकट हैशटैग्स ट्विटर पर ट्रेंड किए, जहां 75,000 से अधिक पोस्ट्स दर्ज हुए। उत्तराखंड के स्थानीय निवासियों ने जल संकट के खिलाफ प्रदर्शन किए, मांग की कि सरकार बांध परियोजनाओं पर पुनर्विचार करे। नेपाल और भूटान के पर्यावरण संगठनों ने इसे "क्षेत्रीय आपदा" करार दिया।
अल जजीरा ने इसे "दक्षिण एशिया का जल संकट" बताया, जबकि बीबीसी ने ग्लेशियर पिघलाव को "वैश्विक आपदा का प्रतीक" कहा। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने हिमालय संरक्षण के लिए 100 मिलियन डॉलर की सहायता की घोषणा की। बाजारों में जल शुद्धिकरण और हरित ऊर्जा कंपनियों के शेयरों में 10% उछाल देखा गया।
हिमालयी ग्लेशियरों की कमी से 24 करोड़ पहाड़ी निवासियों और 1.65 बिलियन डाउनस्ट्रीम लोगों को जल संकट का सामना करना पड़ सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पलायन बढ़ रहा है, क्योंकि जल की कमी ने खेती को असंभव बना दिया।
कृषि उत्पादन में 20-30% की कमी से भारत की खाद्य सुरक्षा खतरे में है। जलविद्युत परियोजनाएं, जो 26% बिजली आपूर्ति देती हैं, 40% उत्पादन हानि का सामना कर सकती हैं। पर्यटन उद्योग, विशेष रूप से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में, 15% राजस्व खो सकता है।
भारत सरकार को जलवायु चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना होगा। निसार उपग्रह और ड्रोन तकनीक से ग्लेशियर निगरानी बढ़ेगी। हरित कृषि समाधान, जैसे ड्रिप इरिगेशन और जल संचयन, को बढ़ावा देना होगा। उद्योगों में जल शुद्धिकरण और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा।
देहरादून जलवायु बैठक ने हिमालय ग्लेशियर संकट की गंभीरता को उजागर किया। 70% बर्फ की कमी न केवल पर्यावरणीय आपदा है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट का संकेत भी है। तत्काल कार्रवाई, जैसे ग्लेशियर निगरानी, जलवायु चेतावनी प्रणाली, और कृषि समाधान, जरूरी हैं। नवंबर 2025 में विश्व आपदा प्रबंधन सम्मेलन में वैश्विक सहयोग पर चर्चा होगी। हिमालय को बचाना केवल भारत की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि वैश्विक प्राथमिकता है। आइए, आज कदम उठाएं, ताकि कल की पीढ़ियां जल के बिना न रहें।
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