Post by : Shivani Kumari
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने पर इसके संस्थापक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार का जीवन फिर से चर्चा में है। “डॉक्टर हेडगेवार कौन थे?” और “आरएसएस की स्थापना कब हुई?” जैसे सवाल आज भी लोगों के मन में हैं। उनका जीवन केवल संगठन निर्माण तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक सच्चे क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी भी थे।
डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर में हुआ। वे बचपन से ही राष्ट्रभक्ति की भावना से ओतप्रोत थे। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान वे बंगाल गए, जहाँ उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़कर ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया।
1900 के दशक की शुरुआत में बंगाल क्रांति का केंद्र था। डॉक्टर हेडगेवार ने अनुशीलन समिति जैसे संगठनों से जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। ब्रिटिश सरकार की नजरों से बचने के लिए उन्होंने ‘कोडनेम कोकीन’ का इस्तेमाल किया। यह नाम उनके गुप्त मिशनों के दौरान प्रयोग होता था ताकि उनकी पहचान गुप्त रहे।
बंगाल क्रांति ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। डॉक्टर हेडगेवार ने इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और कई गुप्त बैठकों में हिस्सा लिया। उन्होंने महसूस किया कि भारत को केवल सशस्त्र संघर्ष से नहीं, बल्कि सामाजिक संगठन से भी आज़ादी मिल सकती है।
बंगाल से लौटने के बाद डॉक्टर हेडगेवार ने नागपुर में 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की। “आरएसएस की स्थापना कब हुई?” यह प्रश्न आज भी लोगों के मन में है, और इसका उत्तर है—विजयादशमी के दिन, 27 सितंबर 1925।
आरएसएस का उद्देश्य था भारत को एक संगठित, सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाना। हेडगेवार का मानना था कि जब तक समाज एकजुट नहीं होगा, तब तक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी।
आरएसएस की विचारधारा भारतीय संस्कृति, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति पर आधारित थी। डॉक्टर हेडगेवार ने स्वयंसेवकों को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी सशक्त बनने की प्रेरणा दी।
डॉक्टर हेडगेवार ने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भाग लिया और जेल भी गए। जेल में उन्होंने कई क्रांतिकारियों से मुलाकात की और संगठन निर्माण के विचार को और मजबूत किया।
जेल में रहते हुए उन्होंने महसूस किया कि भारत को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक एकता की भी आवश्यकता है। यही सोच आगे चलकर आरएसएस की नींव बनी।
1940 में डॉक्टर हेडगेवार के निधन के बाद भी आरएसएस लगातार बढ़ता गया। आज यह संगठन भारत के सबसे बड़े सामाजिक संगठनों में से एक है।
आज आरएसएस शिक्षा, सेवा, और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय है। डॉक्टर हेडगेवार की विचारधारा आज भी संगठन की नींव बनी हुई है।
‘कोडनेम कोकीन’ केवल एक गुप्त पहचान नहीं थी, बल्कि उस युग की क्रांतिकारी भावना का प्रतीक थी। यह नाम ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष की रणनीति का हिस्सा था।
बंगाल की क्रांतिकारी भावना ने डॉक्टर हेडगेवार को संगठन निर्माण की प्रेरणा दी। नागपुर में आरएसएस की स्थापना उसी विचार का विस्तार थी, जिसमें राष्ट्र को एकजुट करने का सपना था।
हालांकि आरएसएस ने प्रत्यक्ष रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया, लेकिन इसके संस्थापक की सोच ने स्वतंत्रता के बाद भारत के सामाजिक ढांचे को मजबूत किया।
डॉक्टर हेडगेवार की विरासत आज भी जीवित है। उनका जीवन यह सिखाता है कि संगठन, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति से कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं।
आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर डॉक्टर हेडगेवार की कहानी भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनकर उभरती है। उनका जीवन यह दर्शाता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी परिणाम है।
वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे।
27 सितंबर 1925 को नागपुर में आरएसएस की स्थापना हुई थी।
यह डॉक्टर हेडगेवार का गुप्त नाम था, जिसका उपयोग उन्होंने ब्रिटिश शासन से बचने के लिए किया।
उन्होंने बंगाल में अनुशीलन समिति जैसे संगठनों से जुड़कर क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया।
आरएसएस भारतीय संस्कृति, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति पर आधारित संगठन है, जिसका उद्देश्य समाज को संगठित करना है।
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