Post by : Shivani Kumari
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देश की न्याय व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। जस्टिस अभिषेक कुमार और जस्टिस एचबी अंजारिया की पीठ ने ऐतिहासिक फैसले में कहा — “चार्जशीट दाखिल होने के पांच साल बाद भी आरोप तय न होना न्याय का अपमान है।” कोर्ट ने पूरे देश की अदालतों को चेतावनी दी कि अब देरी बर्दाश्त नहीं होगी। तीन महीने में आरोप तय न हुए तो जज को लिखित में कारण बताना होगा।
यह फैसला २८ अक्टूबर २०२५ को आया। कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों को तीन महीने में अपने राज्य की स्थिति की पूरी रिपोर्ट सौंपने को कहा है। साथ ही, उन १.१ करोड़ मामलों की सूची भी मांगी है जहां चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद आरोप तय नहीं हुए। कोर्ट ने कहा — “यह प्रणालीगत विफलता है। जनता का विश्वास टूट रहा है।”
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश: “चार्जशीट के ९० दिन में आरोप तय हों। देरी करने वाले जज के खिलाफ कार्रवाई होगी। डिजिटल कोर्ट अनिवार्य।”
“न्याय में देरी, न्याय से इनकार है। यह अब सहन नहीं किया जाएगा। मैं चाहता हूं कि मेरे जीवनकाल में ही यह सुधार हो।” — मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़
जजों के साक्षात्कार — अंदर की सच्चाई
जस्टिस आरएस सोढी (रिटायर्ड, दिल्ली हाई कोर्ट):
“मैंने ३२ साल सेवा की। ८५ प्रतिशत देरी वकीलों की वजह से होती है। वे जानबूझकर तारीखें टालते हैं। एक ही वकील ५० मामले लड़ता है, फिर कहता है — ‘मैं व्यस्त हूं।’ कोर्ट को सख्ती दिखानी होगी।”
जस्टिस मधुकर त्रिपाठी (उत्तर प्रदेश हाई कोर्ट):
“हमारे पास १२० जज हैं, लेकिन १.२ करोड़ मामले। एक जज को रोज १०० तारीखें देखनी पड़ती हैं। चार्ज फ्रेमिंग के लिए अलग बेंच चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही है, लेकिन संसाधन बढ़ाने होंगे।”
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण:
“यह फैसला क्रांति लाएगा। अब जजों की जवाबदेही तय होगी। तीन महीने में आरोप तय न हुए तो जज को कारण बताना होगा। यह पहली बार हो रहा है।”
पीड़ितों की कहानी — न्याय की प्रतीक्षा में टूटते सपने
केस १: रेनू शर्मा, लखनऊ (बलात्कार पीड़िता)
“मेरा केस २०१७ में दर्ज हुआ। चार्जशीट २०१८ में दाखिल हुई। आज २०२५ है — ७ साल बाद भी आरोप तय नहीं हुए। मैंने आत्महत्या कर ली होती, लेकिन बेटी के लिए जी रही हूं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला मेरी आखिरी उम्मीद है।”
केस २: अजय कुमार, मुंबई (धोखाधड़ी का आरोपी)
“मैं २०२० से जमानत पर हूं। चार्जशीट दाखिल हुई, लेकिन मुकदमा शुरू नहीं हुआ। मेरा बिजनेस बर्बाद हो गया। नौकरी नहीं मिलती। मैं निर्दोष हूं, लेकिन साबित करने का मौका ही नहीं मिला।”
केस ३: सुनीता देवी, पटना (हत्या का प्रयास)
“मेरा पति २०१९ से जेल में है। चार्जशीट दाखिल है, लेकिन सुनवाई शुरू नहीं हुई। बच्चे भूखे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, वह सच है — देरी न्याय से भी बदतर है।”
इन्फोग्राफिक्स — एक नजर में समझें
इन्फोग्राफिक: १.१ करोड़ मामले, ३.८ साल औसत देरी, राज्यवार आंकड़े
इन्फोग्राफिक: सुप्रीम कोर्ट के नए नियम
नई योजनाएं — सरकार का मेगा प्लान
कानून मंत्रालय ने ‘न्याय संकल्प २०३०’ शुरू किया है। इसके तहत:
• हर जिले में डिजिटल कोर्ट
• चार्ज फ्रेमिंग के लिए अलग बेंच
• पुराने मामलों के लिए विशेष अभियान
• जजों की वार्षिक परफॉर्मेंस रिपोर्ट
विशिष्ट जजों के नाम — जिन्होंने की पहल
अंतरराष्ट्रीय मॉडल — भारत क्या सीख सकता है?
| देश | मॉडल | समयसीमा | परिणाम |
|---|---|---|---|
| सिंगापुर | डिजिटल चार्ज फ्रेमिंग | ६० दिन | ९९% केस समय पर |
| जापान | जज-वकील अनुपात १:५० | ९० दिन | लंबित मामले: २ लाख |
| जर्मनी | ऑटोमैटिक केस अलॉटमेंट | ७५ दिन | देरी शून्य |
न्याय का नया सवेरा
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक आदेश नहीं, न्याय व्यवस्था में क्रांति की शुरुआत है। १.१ करोड़ पीड़ितों की आंखों में अब उम्मीद जगी है। ९० दिन की समयसीमा, डिजिटल कोर्ट, फास्ट ट्रैक बेंच, जजों की जवाबदेही — ये सभी मिलकर भारत को न्याय का नया मॉडल बनाएंगे।
जब रेनू शर्मा, अजय कुमार, सुनीता देवी जैसे लाखों लोग कह रहे हैं — “अब न्याय मिलेगा”, तो यह सुप्रीम कोर्ट की सबसे बड़ी जीत है।
भारत अब न्याय के नए युग में प्रवेश कर चुका है — जहां देरी नहीं, केवल न्याय होगा।
जय हिंद। जय न्याय।
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