Post by : Shivani Kumari
ऑस्ट्रेलिया सरकार ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। यह कानून 10 दिसंबर, 2025 से लागू होगा, जिसमें यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, स्नैपचैट, एक्स (पूर्व में ट्विटर) जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पर बच्चों को अकाउंट बनाने या चलाने की अनुमति नहीं होगी। इस कानून का मकसद बच्चों को ऑनलाइन शोषण, साइबर बुलिंग और इंटरनेट पर हानिकारक कंटेंट से बचाना है। संसद में इस कानून को “Online Safety Amendment (Social Media Minimum Age) Act, 2024” नाम दिया गया। प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज और संचार मंत्री मिशेल रोलैंड ने साफ किया कि कंपनियों को यह दिखाना होगा कि वे प्लेटफॉर्म पर नाबालिग बच्चों को रोकने के लिए क्या कदम उठा रही हैं।
अगर कोई कंपनी इस कानून का पालन नहीं करती है तो उस पर 49.5 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक जुर्माना लगाया जा सकता है। बच्चों या उनके माता-पिता पर कोई सज़ा नहीं होगी, सारी जिम्मेदारी कंपनियों की होगी। सरकार ने यह भी निर्देश दिया है कि बच्चों को यू-ट्यूब किड्स प्लेटफॉर्म का उपयोग करने की सीमित अनुमति तो होगी, लेकिन नए अकाउंट बनाने और वीडियो अपलोड करने की अनुमति नहीं मिलेगी। कई सर्वे के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में अकसर बच्चे यूट्यूब पर असुरक्षित या गैर-लाभकारी कंटेंट देखते पाए गए, इसी वजह से यूट्यूब को भी अंतिम समय में प्रतिबंध की सूची में जोड़ दिया गया।
तकनीकी स्तर पर बैन लागू करना सोशल मीडिया कंपनियों के लिए बड़ी चुनौती है। कंपनियों को एडवांस्ड एआई, यूज़र बिहेवियर डेटा और डिजिटल वेरिफिकेशन प्रक्रियाओं का इस्तेमाल कर 16 साल से कम उम्र के बच्चों की पहचान करनी होगी। कंपनियां अपने तरीके खुद चुन सकती हैं, जैसे बायोमेट्रिक स्कैन या आयु प्रमाण पत्र। गूगल (यूट्यूब संचालक) तथा अन्य कंपनियों ने इसे "अस्पष्ट", "समस्याग्रस्त" और "जल्दबाजी में लिया गया" फैसला बताया है। उनके अनुसार बच्चों और किशोरों के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक विकास और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर यह बैन बहुत बड़ा असर डाल सकता है। तकनीकी कंपनियों ने चेतावनी भी दी है कि बैन लागू करना बेहद मुश्किल होगा और बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा की संभावना कम हो सकती है, क्योंकि इससे बच्चे असुरक्षित ऐप्स या प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित हो सकते हैं।
सरकार ने इसी वर्ष नए दिशा-निर्देश जारी किए जिसमें कंपनियों से डिलीट, डीएक्टिवेट, या फ्रीज़ करने का विकल्प देने पर जोर दिया गया है। अगर 16 साल से कम उम्र के बच्चों का सोशल मीडिया अकाउंट पाया जाता है, तो तुरंत कार्रवाई की जाएगी। बच्चे केवल पेरेंटल गाइडेंस के साथ यूट्यूब किड्स इस्तेमाल कर सकेंगे, पर वहां भी कोई नया कंटेंट अपलोड नहीं कर सकेंगे। कंपनियों को खुद रिपोर्ट करना होगा कि वे नियमों का पालन कैसे सुनिश्चित कर रही हैं।
ऑस्ट्रेलिया की इस पहल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी खूब चर्चा हो रही है। ब्रिटेन, यूरोप, अमेरिका समेत कई देशों में सरकारें ऐसी ही सख्त नीतियों पर विचार कर रही हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, बाल अधिकार संगठनों और अभिभावक फोरम की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं। कुछ इसे बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण कदम मानते हैं, जबकि अन्य संगठन इसे बच्चों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और रचनात्मकता में हस्तक्षेप भी मानते हैं। बीते एक वर्ष में ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने सिलिकॉन वैली की प्रमुख कंपनियों से कई दौर की बैठकें भी कीं ताकि नियमों का पालन, डेटा सुरक्षा और बचाव योजनाओं पर सलाह ली जा सके।
ऑस्ट्रेलिया की सरकार का कहना है कि यह कानून ऑनलाइन शिकारी एल्गोरिदम, साइबर क्राइम, हानिकारक विज्ञापनों और अन्य डिजिटल जोखिमों से बच्चों को बचाने के लिए बेहद जरूरी था। कई रिसर्च में सामने आया है कि बच्चों का सोशल मीडिया पर लंबा वक्त बिताना उनकी सेहत, पढ़ाई और सामाजिक व्यवहार पर प्रतिकूल असर डालता है। यह भी कड़ा निर्देश दिया गया है कि कंपनियां अपनी सुरक्षा टीमों, मॉडरेशन और कंटेंट फिल्टरिंग टेक्नोलॉजी में बड़े बदलाव करें ताकि बच्चों को हानिकारक, आपत्तिजनक या विज्ञापनिजन्य कंटेंट से बचाया जा सके।
ऑस्ट्रेलिया में करीब 40 प्रतिशत से ज्यादा बच्चे रोजाना यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म का उपयोग करते हैं। संसद ने चिंता जताई कि शिकारी या एडल्ट कंटेंट ऑटो एल्गोरिदम के जरिए बच्चों की प्रोफाइल पर पहुंच रहा है, जिससे सामाजिक खतरे बढ़ रहे हैं। संचार मंत्री एनिका वेल्स ने स्पष्ट कहा कि “सोशल मीडिया पर बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है जब तक वे सुरक्षित और परिपक्व नहीं हैं।”
नए कानून व उसकी प्रक्रिया पर उद्योग जगत में विवाद देखे जा रहे हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम व टिकटॉक ने कानून का पालन करने का वादा किया है लेकिन चेताया है कि इससे माता-पिता और किशोरों पर बड़ा बोझ पड़ेगा। टिकटॉक ने सरकार पर आरोप लगाया कि मानसिक स्वास्थ्य और विशेषज्ञों की राय को नज़रअंदाज किया गया। यूट्यूब ने अपनी स्थिति स्पष्ट की कि वह वीडियो लाइब्रेरी है न कि सोशल मीडिया, लेकिन इसके बावजूद उसे भी प्रतिबंध की सूची में शामिल कर दिया गया है।
नियम लागू करने के तरीके पर कंपनियों को स्वतंत्रता दी गई है, जैसे ऑनलाइन उम्र प्रमाण पत्र, फ़ेस रेकग्निशन, व्यवहारिक डेटा एनालिसिस। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऑनलाइन उम्र छुपाना आसान है, जिस कारण वास्तविक सुरक्षा मुश्किल होगा। अगर किसी प्लेटफॉर्म से नियम का उल्लंघन पाया गया, तो सरकार तत्काल जांच करेगी और फिर लाखों डॉलर का जुर्माना लगाया जाएगा। ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि प्लेटफार्म्स को अपने सुरक्षा सिस्टम बेहतर करने होंगे। अगर नाबालिग बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट्स चालू रहें, तो कंपनियां ही उत्तरदायी होंगी, उपभोक्ता या परिवार को कोई दोष नहीं दिया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम का वैश्विक प्रभाव नजर आ रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन और भारत समेत कई देशों की सरकारें ऑस्ट्रेलिया के मॉडल को समझ रही हैं और भविष्य में ऐसे प्रतिबंध लगाने की संभावना जता रही हैं। कई विश्लेषणकार मानते हैं कि डिजिटल युग में बच्चों की रक्षा के लिए एआई आधारित टेक बहुत जरूरी है, साथ ही साथ डिजिटल शिक्षा को भी बढ़ाना चाहिए। अभिभावकों को बच्चों के फोन, इंटरनेट गतिविधि और डिजिटल आदतों की निगरानी करनी होगी।
कई परिवारों के लिए यह कानून राहत भी है और चुनौती भी। कुछ अभिभावकों को चिंता है कि बच्चे छिपकर दूसरे ऐप या वीपीएन का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे उन्हें असुरक्षित प्लेटफॉर्म की तरफ धकेला जा सकता है। दूसरी ओर, कानून समर्थकों का मानना है कि ऑनलाइन वातावरण में बच्चों की सुरक्षा हर हाल में सर्वोपरि है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ आमतौर पर सरकार के कदम का समर्थन करते हैं, क्योंकि रिसर्च से पता चलता है कि सोशल मीडिया पर अवसाद, चिंता, साइबर बुलिंग, शारीरिक और मानसिक बीमारियों का खतरा बच्चों में बढ़ता है।
ऑस्ट्रेलिया विश्व का पहला देश है जहाँ इतना कड़ा कानून सोशल मीडिया के लिए आया है। लोगों की राय बंटी हुई है, लेकिन जिस तरह से बच्चों की सुरक्षा, बाल अधिकार और टेक्नोलॉजी का भविष्य इस एक कानून से प्रभावित हो रहा है, वह डिजिटल नीति-निर्माण का फ़ाउंडेशन तय कर सकता है। इसके बावजूद, विशेषज्ञ यह भी चेताते हैं कि वास्तविक सफलता तभी मिलेगी जब बैन के साथ-साथ डिजिटल शिक्षा, काउंसलिंग और अभिभावकों को भी जागरूक किया जाए।
दिसंबर 2025 की डेडलाइन के साथ अब ऑस्ट्रेलिया की हर सोशल मीडिया कंपनी पर बच्चों के लाखों अकाउंट्स डिलीट, डीएक्टिवेट या फ्रीज़ करने की जिम्मेदारी है। कंपनियां “Download My Data” जैसे टूल के जरिए बच्चों को अपना डेटा सेव करने का विकल्प देंगी। जिन प्लेटफार्म्स के सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं होंगे, उन्हें कड़ा दंड मिलेगा।
अंत में, यह पूरी प्रक्रिया कानून, टेक्नोलॉजी, समाज, परिवार, और बच्चों की मानसिक सेहत के परिप्रेक्ष्य से एक बड़ी परीक्षा है। अगर यह मॉडल सफल होता है तो निश्चित रूप से बाकी दुनिया भी इसी तरह के सख्त नियमों की ओर बढ़ सकती है। हर अपडेट के साथ अब यही देखने योग्य होगा कि बच्चे कैसे सुरक्षित रहेंगे, सोशल मीडिया कंपनियां कैसी चुनौतियों से जूझेंगी, और क्या यह बैन डिजिटल युग में बच्चों की भलाई के लिए वाकई प्रभावी साबित होगा.
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