पूण्डीर ऋषि के नए पालसरा बने हीरालाल, सैंज घाटी में खुशी और आस्था का माहौल
पूण्डीर ऋषि के नए पालसरा बने हीरालाल, सैंज घाटी में खुशी और आस्था का माहौल

Author : Prem Sagar

April 15, 2026 1:07 p.m. 872

सैंज घाटी की कोठी बनोगी में धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण आयोजन संपन्न हुआ, जब पूण्डीर ऋषि के नए पालसरा के रूप में हीरालाल की विधिवत ताजपोशी की गई। इस अवसर पर पूरे क्षेत्र में खुशी और उत्साह का माहौल देखने को मिला। लंबे समय से यह पद रिक्त था, क्योंकि पूर्व पालसरा मानदास के निधन के बाद से इस जिम्मेदारी को संभालने वाला कोई नियुक्त नहीं किया गया था। अब देव परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार इस पद को पुनः भर दिया गया है।

इस पावन अवसर पर कोठी बनोगी और आसपास के कई गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, देव समाज के लोग और स्थानीय नागरिक एकत्रित हुए। सभी ने पूरे श्रद्धा भाव से इस धार्मिक कार्यक्रम में भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक पूजा-अर्चना और विशेष अनुष्ठानों के साथ हुई, जिसमें देवताओं की विधिवत पूजा की गई और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की गई।

देव परंपराओं के अनुसार विभिन्न धार्मिक विधियां पूरी करने के बाद हीरालाल को पालसरा के रूप में मान्यता दी गई। यह प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न की गई, जिसमें देव समाज के वरिष्ठ लोगों की अहम भूमिका रही।

हीरालाल की नियुक्ति को लेकर क्षेत्र के लोगों में विशेष खुशी देखी गई। लोगों का मानना है कि उनके नेतृत्व में पूण्डीर ऋषि की परंपराओं को और मजबूती मिलेगी और धार्मिक गतिविधियों को नई दिशा प्राप्त होगी। उपस्थित लोगों ने विश्वास जताया कि वह इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ निभाएंगे।

कार्यक्रम के दौरान कई गणमान्य लोग भी उपस्थित रहे, जिन्होंने इस ऐतिहासिक पल को देखा और अपनी खुशी जाहिर की। सभी ने इस अवसर को सैंज घाटी की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताया। लोगों ने कहा कि इस तरह के आयोजन समाज में एकता, विश्वास और परंपराओं के प्रति सम्मान को बढ़ावा देते हैं।

ताजपोशी के साथ ही सैंज घाटी में श्रद्धा और विश्वास का एक नया अध्याय शुरू हो गया है। पूरे क्षेत्र में लोगों ने इसे एक शुभ संकेत माना और आने वाले समय में धार्मिक गतिविधियों के और अधिक विस्तार की उम्मीद जताई। यह आयोजन न केवल एक धार्मिक प्रक्रिया था, बल्कि समाज को एकजुट करने और परंपराओं को आगे बढ़ाने का एक सशक्त माध्यम भी बना।

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