Post by : Shivani Kumari
जब हिमाचल प्रदेश की घाटियाँ शरद ऋतु के स्वर्णिम रंगों से निखर उठती हैं, तब कुल्लू घाटी के नग्गर क्षेत्र के समीप बसे जगतीपट्ट गाँव में वार्षिक जगती मेला चर्चा का केंद्र बन जाता है। आगामी 31 अक्टूबर 2025 को आयोजित होने वाला यह प्राचीन मेला आध्यात्मिकता, संस्कृति और सामुदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है। इस आयोजन को लेकर लोगों में उत्साह का वातावरण है। डीडी न्यूज़ हिमाचल द्वारा सोशल मीडिया मंच एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर की गई घोषणा ने इस मेले को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है, जो हिमालय की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश की जीवंत लोक संस्कृति का सजीव उदाहरण प्रस्तुत करता है।
18 अक्टूबर 2025 को डीडी न्यूज़ हिमाचल ने एक्स पर एक पोस्ट जारी कर जगतीपट्ट गाँव में जगती मेले के आयोजन की आधिकारिक घोषणा की। साझा किए गए वीडियो में यह दर्शाया गया कि इस वर्ष मेले में लगभग 175 स्थानीय देवता एकत्रित होंगे, जो कुल्लू क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक जीवनधारा का अभिन्न हिस्सा हैं। वीडियो में नग्गर किले के भीतर स्थित जगतीपट्ट मंदिर में चल रही तैयारियों की झलक भी दिखाई गई, जहाँ आयोजक पारंपरिक रीति-रिवाजों के पालन और समुदाय की एकता को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दे रहे हैं।
इस घोषणा के बाद स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों में भी भारी उत्साह देखने को मिल रहा है। यह मेला कुल्लू दशहरा उत्सवों का ही एक हिस्सा है, परंतु इसका विशेष महत्व देवताओं की प्रतीकात्मक सभा और पारंपरिक लोककथाओं के संरक्षण से जुड़ा है, जो इसे अन्य धार्मिक आयोजनों से अलग बनाता है।
जगती मेले की परंपरा कुल्लू के शाही इतिहास से जुड़ी हुई है, जिसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी में मानी जाती है। कहा जाता है कि कुल्लू के राजा जगत सिंह ने एक ब्राह्मण की हत्या के पश्चात् प्रायश्चित हेतु देवताओं को जगतीपट्ट में एकत्र करने की परंपरा आरंभ की थी। इसी से “जगती-पूछ” की प्रथा का जन्म हुआ, जिसमें देवताओं की सामूहिक उपस्थिति और निर्णय को सर्वोपरि माना जाता है।
प्राचीन काल में यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। यह कुल्लू राज्य के शासन और सामाजिक व्यवस्था का केंद्र माना जाता था। समय के साथ यह मेला कुल्लू क्षेत्र की पहाड़ी सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न प्रतीक बन गया है, जहाँ देवता और मानव एक साझा आस्था में एकजुट होते हैं।
जगती मेला पहाड़ी संस्कृति की आत्मा को प्रतिबिंबित करता है। हिमाचल प्रदेश की यह संस्कृति अपने प्राकृतिक परिवेश, लोककथाओं, पारंपरिक संगीत, नृत्य और लोकभाषाओं से समृद्ध है। यूनेस्को द्वारा 2003 में घोषित अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संरक्षण अभिसमय के अनुरूप, ऐसे आयोजन स्थानीय परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जगती मेले का प्रमुख आकर्षण पारंपरिक लोक नृत्य और संगीत हैं। ढोल, नगाड़ा और शहनाई की गूंज से पूरा वातावरण पर्व जैसा बन जाता है। गीतों के विषय प्रायः प्रकृति, प्रेम, भक्ति और जीवन के संघर्ष से जुड़े होते हैं, जो स्थानीय लोगों के भावनात्मक संसार को दर्शाते हैं। यह प्रदर्शन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मौखिक परंपराओं को पीढ़ियों तक पहुँचाने का माध्यम हैं।
मेले में स्थानीय शिल्पकारों की बनाई हुई हस्तनिर्मित वस्तुएँ, बुनाई, लकड़ी की नक्काशी और पहाड़ी चित्रकला प्रदर्शित की जाती हैं। नग्गर किले और जगतीपट्ट मंदिर की लकड़ी की बालकनियों पर बनी बारीक नक्काशी हिमाचल की समृद्ध कलात्मक परंपरा का प्रमाण है।
जगती मेला पूरी तरह से जन-सहभागिता से संचालित होता है। महीनों पहले से ग्रामीण क्षेत्र के लोग मिलकर इसकी तैयारियों में जुट जाते हैं। दशहरा की परंपरा से जुड़े लंका दहन के लिए आवश्यक सामग्री जुटाना, झाँकियाँ बनाना और आयोजन स्थल की सजावट में ग्रामीण सक्रिय भूमिका निभाते हैं। यह सामूहिक सहयोग सामाजिक एकता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
कुल्लू क्षेत्र में लगभग 175 देवता पूजे जाते हैं, जिनकी अलग-अलग पंचायतों और गाँवों से संबद्धता होती है। इन देवताओं के प्रतिनिधि, जिन्हें गुर कहा जाता है, मेले में विशेष भूमिका निभाते हैं। वे देवताओं की वाणी और इच्छाओं का संचार करते हैं तथा विधि-विधान का पालन सुनिश्चित करते हैं। यह मानव और देवत्व के बीच जीवंत संवाद का प्रतीक है।
जगती मेले का केंद्रबिंदु जगतीपट्ट मंदिर है, जो ऐतिहासिक नग्गर किले के भीतर स्थित है। यह किला पारंपरिक काठकूनी स्थापत्य शैली में निर्मित है, जिसमें लकड़ी और पत्थर की परतों का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता है। मंदिर में स्थित पवित्र पत्थर की चट्टान वह स्थान है जहाँ देवताओं के एकत्र होने की मान्यता है।
किले से ब्यास नदी और आसपास की घाटियों का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है, जो इस स्थल की आध्यात्मिकता और सौंदर्य दोनों को बढ़ाता है। मंदिर की वास्तुकला में बनी त्रिकोणीय छतें और नक्काशीदार लकड़ी की दीवारें हिमाचली स्थापत्य कौशल की मिसाल हैं।
वर्तमान समय में जब आधुनिकीकरण की लहर पारंपरिक भाषाओं और रीति-रिवाजों को प्रभावित कर रही है, तब जगती मेला जैसी परंपराएँ पहाड़ी संस्कृति को जीवित रखने में आधारस्तंभ की भूमिका निभा रही हैं। यह मेला न केवल लोककला और धार्मिक आस्थाओं का संगम है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक जीवंत संस्कृति संग्रहालय भी है।
ऐसे आयोजन यह संदेश देते हैं कि परंपरा केवल अतीत की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की पहचान और भविष्य की धरोहर है।
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