वैशाख संक्रांति पर सैंज घाटी में सांस्कृतिक उत्सव और मेलों का हुआ शुभारंभ
वैशाख संक्रांति पर सैंज घाटी में सांस्कृतिक उत्सव और मेलों का हुआ शुभारंभ

Author : Prem Sagar

April 15, 2026 12:46 p.m. 171

वैशाख संक्रांति के पावन अवसर पर सैंज घाटी में वर्ष 2026 के पारंपरिक मेलों का भव्य और विधिवत शुभारंभ हुआ। इस खास दिन पर पूरी घाटी में आस्था, श्रद्धा और सांस्कृतिक उत्साह का अद्भुत वातावरण देखने को मिला। सुबह से ही मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी और पूरा क्षेत्र धार्मिक रंग में रंग गया। घाटी के विभिन्न देवालयों में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए गए, जिससे वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय हो गया।

इस अवसर पर सैंज घाटी की प्रसिद्ध देव परंपराओं का भी भव्य प्रदर्शन हुआ, जो यहां की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बनोगी कोठी के पटाहरा गांव में माता दुर्गा बनोगी देहूरी का प्रसिद्ध बीठ पर्व बड़े उत्साह और धूमधाम के साथ मनाया गया। इस आयोजन में स्थानीय लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया और अपनी परंपराओं को जीवित रखने का संदेश दिया।

इस दौरान एक अनोखी परंपरा के तहत हारियानों ने जंगल की बेल से बनी मजबूत रस्सी को खींचकर अपनी शक्ति और सामूहिक एकता का प्रदर्शन किया। इस प्रतियोगिता में निउला और नेसरा क्षेत्र के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह परंपरा केवल एक खेल नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का प्रतीक मानी जाती है। लोगों का मानना है कि जो दल इस प्रतियोगिता में जीत हासिल करता है, उस पर माता रानी की विशेष कृपा बनी रहती है और क्षेत्र में सुख-समृद्धि आती है। इस बार तराई क्षेत्र के लोगों ने इस प्रतिस्पर्धा में जीत हासिल की।

इसी क्रम में गांव मन्याशी में पुंडीर ऋषि के सम्मान में पारंपरिक “पड़ैई उत्सव” का आयोजन भी किया गया। इस आयोजन में ग्रामीणों ने तीर-कमान से ध्वज को निशाना बनाकर अपनी कला और कौशल का प्रदर्शन किया। इस प्रतियोगिता में देवता चतरखण्ड के गूर नीकाराम ने बाज़ी मारी। स्थानीय मान्यता के अनुसार, जिस व्यक्ति का तीर सबसे पहले ध्वज पर लगता है, उसे देवता का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

वैशाख संक्रांति के इस शुभ अवसर पर सैंज घाटी एक बार फिर अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और देव परंपराओं के रंग में रंगी नजर आई। यहां के लोगों ने अपनी पुरानी परंपराओं को पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हुए यह संदेश दिया कि आधुनिकता के दौर में भी अपनी संस्कृति को सहेजकर रखना बेहद जरूरी है।

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