कांगड़ा के किसान सब्जियों की पौधे उगाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं
कांगड़ा के किसान सब्जियों की पौधे उगाकर अपनी आय बढ़ा सकते हैं

Author : Rajesh Vyas

Feb. 4, 2026 4:39 p.m. 570

कृषि क्षेत्र में अब सब्जियों की खेती अनाज की फसलों की तुलना में अधिक लाभकारी साबित हो रही है। कांगड़ा जिले में उप कृषि निदेशक डॉ. कुलदीप धीमान ने किसानों को जानकारी दी कि यदि वे फरवरी महीने के दूसरे पखवाड़े में मिर्च, शिमला मिर्च, टमाटर, बैंगन जैसी सब्जियों के पौधे तैयार करना शुरू करें, तो उन्हें बेहतर आर्थिक लाभ मिल सकता है।

डॉ धीमान ने बताया कि कांगड़ा जिले में लगभग एक लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल भूमि बुआई योग्य है, जिसमें से लगभग 6% में सब्जियों की खेती होती है। वहीं जिले में लगभग 35% क्षेत्रफल में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। यदि इस सुविधा का सही उपयोग किया जाए तो सब्जियों की खेती के लिए और अधिक भूमि का उपयोग किया जा सकता है और किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है।

उन्होंने यह भी बताया कि गर्मियों की सब्जियों के पौधे जैसे मिर्च, शिमला मिर्च, टमाटर, बैंगन की तैयारी क्यारियों में की जा सकती है। वहीं कद्दू वर्गीय फसलें जैसे घीया, तोरी, करेला, खीरा इत्यादि की पौध पोलीट्यूब में तैयार की जानी चाहिए। इन फसलों के बीजों का अंकुरण अभी मौसम के अनुसार धीमा है, इसलिए फरवरी में इन बीजों की बिजाई केवल पोलीहाउस या पोली टनल में ही करनी चाहिए।

सब्जियों के पौध तैयार करने के लिए किसान 3 मीटर लंबी, 1 मीटर चौड़ी और 15 सेंटीमीटर ऊँची क्यारी तैयार करें। इसमें सिंचाई, निराई-गुड़ाई और खरपतवार निकालना आसान हो। स्वस्थ पौधे तैयार करने के लिए प्रत्येक क्यारी में 20-25 किलोग्राम गोबर की गली सड़ी खाद डालें। बीज 5 सेंटीमीटर की दूरी पर पंक्तियों में डालें और अंकुरण तक क्यारी को सूखी घास या पोलीथीन की चादर से ढक दें।

डॉ धीमान ने बताया कि बैंगन और टमाटर के लिए क्रमशः 35 और 40 ग्राम बीज डालें। शिमला मिर्च और मिर्च के लिए क्रमशः 120-125 ग्राम बीज पर्याप्त हैं। उन्होंने कहा कि एक क्यारी से तैयार टमाटर और मिर्च के पौधे लगभग 2.5 से 3 कनाल भूमि में रोपाई के लिए पर्याप्त हैं, जबकि बैंगन और शिमला मिर्च के पौधे 1.5 से 2 कनाल भूमि में रोपाई के लिए पर्याप्त हैं।

उप कृषि निदेशक ने किसानों से कहा कि सब्जियों की खेती और पौधे तैयार करना सिर्फ आय का स्रोत नहीं बल्कि स्थायी रोजगार का अवसर भी है। सही तकनीक, पोलीहाउस की सुविधा और पर्याप्त सिंचाई से किसान अपनी उत्पादन क्षमता और आय दोनों में सुधार कर सकते हैं।

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