Post by : Himachal Bureau
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया है। इस दर्दनाक घटना में 15 लोगों की जान चली गई, जबकि कई अन्य लोग घायल हो गए। हादसे के बाद अब केवल आग लगने के कारणों की ही नहीं, बल्कि उस इमारत से जुड़े पुराने प्रशासनिक रिकॉर्ड और कार्रवाई की भी जांच शुरू हो गई है। सामने आई जानकारी ने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं।
जांच के दौरान पता चला है कि जिस भवन में यह हादसा हुआ, उसके खिलाफ लगभग दस वर्ष पहले अवैध निर्माण को लेकर कार्रवाई की गई थी। इतना ही नहीं, भवन को गिराने का आदेश भी जारी किया गया था। हालांकि बाद में यह आदेश रद्द कर दिया गया। अब इस फैसले को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
1980 में हुआ था भवन का आवंटन
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार अलीगंज योजना के सेक्टर डी में स्थित इस भवन का आवंटन वर्ष 1980 में किया गया था। यह संपत्ति एक आवासीय योजना के तहत लॉटरी प्रक्रिया के माध्यम से आवंटित की गई थी। बाद में निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद भवन का कब्जा आवंटी को सौंप दिया गया।
कई वर्षों तक यह भवन मूल स्वामियों के नाम पर रहा। वर्ष 2005 में संपत्ति का पंजीकरण एक दंपति के नाम हुआ। इसके बाद वर्ष 2013 में यह भवन नए खरीदारों को बेच दिया गया। अगले वर्ष विकास प्राधिकरण ने स्वामित्व परिवर्तन की प्रक्रिया भी पूरी कर दी।
भवन निर्माण को मिली थी आवासीय मंजूरी
दस्तावेजों के अनुसार भवन के लिए वर्ष 2014 में आवासीय उपयोग का नक्शा स्वीकृत किया गया था। यह स्वीकृति स्व-प्रमाणन योजना के अंतर्गत दी गई थी। उस समय भवन का उपयोग आवासीय श्रेणी में माना गया था। लेकिन बाद में निरीक्षण के दौरान परिसर में कथित रूप से स्वीकृत मानकों से अलग निर्माण पाए गए। इसके बाद विकास प्राधिकरण ने संबंधित मालिकों के खिलाफ मामला दर्ज किया और जांच प्रक्रिया शुरू की।
अवैध निर्माण पर जारी हुआ था गिराने का आदेश
जांच पूरी होने के बाद संबंधित प्राधिकारी ने मई 2016 में भवन के अवैध हिस्सों को गिराने का आदेश जारी किया था। यह कार्रवाई भवन नियमों के उल्लंघन के आरोपों के आधार पर की गई थी। हालांकि सबसे बड़ा सवाल इस बात को लेकर उठ रहा है कि यह आदेश जारी होने के कुछ ही समय बाद वापस क्यों ले लिया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जुलाई 2016 में गिराने का आदेश निरस्त कर दिया गया था। अब आग हादसे के बाद यही फैसला चर्चा के केंद्र में आ गया है।
हादसे के बाद दर्ज हुई एफआईआर
भीषण आग की घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस विभिन्न धाराओं के तहत कानूनी कार्रवाई कर रही है। जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि हादसा किन परिस्थितियों में हुआ और क्या किसी स्तर पर लापरवाही हुई थी। प्रशासन का कहना है कि घटना से जुड़े हर पहलू की गहन जांच की जाएगी। भवन की संरचना, सुरक्षा मानकों और पूर्व में हुई प्रशासनिक कार्रवाई की भी समीक्षा की जा रही है।
सात दिन में रिपोर्ट देगी विशेष जांच टीम
घटना की गंभीरता को देखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने दो सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन किया है। इस टीम को पूरे मामले की समयबद्ध जांच करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे सभी रिकॉर्ड, अनुमति दस्तावेज, निर्माण संबंधी फाइलें और सुरक्षा प्रबंधों की विस्तार से जांच करें।
सरकार ने जांच दल को सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि क्या पहले की गई प्रशासनिक कार्रवाई में कोई चूक हुई थी।
कई अहम सवालों के जवाब का इंतजार
लखनऊ का यह हादसा केवल एक आग की घटना नहीं रह गया है, बल्कि इसने भवन सुरक्षा, अवैध निर्माण और प्रशासनिक निगरानी से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जिस भवन के खिलाफ कभी कार्रवाई हुई थी, वह बाद में किस आधार पर राहत पाने में सफल रहा।
अब पूरे मामले में लोगों की नजर विशेष जांच दल की रिपोर्ट पर टिकी हुई है। उम्मीद की जा रही है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद हादसे की असली वजहों और संभावित जिम्मेदारियों पर तस्वीर साफ हो सकेगी। फिलहाल पीड़ित परिवारों के लिए यह समय बेहद कठिन है और पूरे प्रदेश में इस दर्दनाक घटना को लेकर शोक का माहौल बना हुआ है।
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