Author : Prem Sagar
वनोगी कोठी के आराध्य देव पुंडीर ऋषि का जन्मोत्सव यानी हूम पर्व कथैउगी गांव में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। हूम पर्व के दौरान क्षेत्र में सदियों से चली आ रही देव परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों का अनूठा संगम देखने को मिला। विभिन्न देव गतिविधियों के बीच श्रद्धालुओं ने देवता के दर्शन किए और आशीर्वाद प्राप्त किया।
हूम पर्व के अवसर पर पुंडीर ऋषि का देवरथ देवालय प्रांगण में दिव्य दर्शन के लिए विराजमान हुआ। इसके साथ ही पुरातन परंपरा के अनुसार देव कार्रवाई का निर्वहन किया गया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने देवता के दर्शन किए और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की। संध्या आरती के बाद हारियानों ने पारंपरिक देवगीतों का गायन किया। देवगीतों की धुन से पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब गया। स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ अपनी पुरानी देव संस्कृति से जुड़ने का अवसर भी रहा।
हूम पर्व की देव परंपरा रात के चौथे प्रहर भी जारी रही। इस दौरान माता गंड़सरी का दिव्य मोहरा बाजे-गाजे के साथ पुंडीर ऋषि की तपोस्थली दलोगी पहुंचा। इसके बाद हारियान सराहन गांव की ओर रवाना हुए। सराहन पहुंचने पर मौशाल जलाकर हूम पर्व से जुड़ी देव कार्रवाई को पारंपरिक विधि से निभाया गया। देव परंपरा में मौशाल का विशेष महत्व माना जाता है और इस पूरी प्रक्रिया के दौरान स्थानीय लोगों की श्रद्धा और सहभागिता देखने को मिली।
वीरवार सुबह शुभ मुहूर्त में दुशाहड़ गांव के निवासी माता दुर्गा की छड़ी लेकर कथैउगी पहुंचे। इसके बाद पुंडीर ऋषि पूरे लाव-लश्कर और हारियानों के साथ बाजे-गाजे की धुन पर सराहन के लिए रवाना हुए। सराहन में पुराने पारंपरिक बाजों की धुनों के बीच देवता का भव्य स्वागत किया गया। इसके बाद हूम पर्व की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में से एक शाही स्नान की प्रक्रिया शुरू हुई।
शुभ मुहूर्त में रोहिणी नक्षत्र के दौरान सराहरी सौर में पुंडीर ऋषि का पुरातन परंपरा के अनुसार शाही स्नान करवाया गया। हारियानों के अनुसार, सराहरी सौर को पुंडीर ऋषि की ऐतिहासिक तपोस्थली माना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार देवता इस स्थान पर जलक्रीड़ा और स्नान किया करते थे। इसी प्राचीन मान्यता और परंपरा का निर्वहन आज भी अश्विन माह में रोहिणी नक्षत्र के दौरान किया जाता है। शाही स्नान के दौरान देव परंपरा से जुड़े कारकून और अन्य लोग निर्धारित रीति-रिवाजों के अनुसार धार्मिक प्रक्रिया में शामिल हुए।
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हूम पर्व की इस परंपरा में संयम और नियमों का भी विशेष महत्व बताया गया है। इन दिनों क्षेत्र में मांस और मदिरा का सेवन पूरी तरह वर्जित रहता है। हारियानों के अनुसार मुख्य देव कारकून सात दिन तक उपवास रखते हैं। इसके बाद निर्धारित परंपरा के अनुसार देवरथ के साथ सराहरी सौर में प्रवेश किया जाता है। इस धार्मिक प्रक्रिया में दूमंच, धामी और गूर भी परंपरा के अनुसार आस्था की डुबकी लगाते हैं। पुंडीर ऋषि के हूम पर्व के दौरान निभाई गई यह पूरी देव परंपरा क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत की झलक प्रस्तुत करती है। शाही स्नान से लेकर पारंपरिक देवगीतों और पुराने वाद्य यंत्रों तक, आयोजन में स्थानीय देव संस्कृति के कई रंग देखने को मिले।
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