Post by : Shivani Kumari
पिछले एक सप्ताह के भीतर बिलासपुर शहर और उसके निकटवर्ती ग्रामीण इलाकों में निर्माण कार्य से जुड़े लोगों का जीवन एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। उन सैंकड़ों परिवारों के लिए, जो वर्षों से अपना सपना—आधुनिक मकान, दफ्तर, दुकान या फैक्ट्री—साकार करने में जुटे थे, बाजार में सरिया और निर्माण सामग्री के दामों में आई भारी गिरावट किसी वरदान से कम नहीं मानी जा रही। पुराने बाजारों में सुबह से ही भीड़ नजर आने लगी है, दुकानदारों के पास लगातार फोन कॉल, ऑनलाइन ऑर्डर और रोजाना ग्राहक के साथ-साथ नए संपर्क भी बनने लगे हैं।
वास्तविक स्थिति को समझने के लिए, स्थानीय स्टील एवं भवन सामग्री व्यापार संघ के सचिव ने विस्तार से बताया कि पिछले कुछ महीने बेहद चुनौतीपूर्ण रहे हैं। कोरोना महामारी के बाद जिस तरह से बाजार ने करवट ली, उस दौरान निर्माण सामग्री की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं। लोगों ने निर्माण रोक दिया, कई ठेकेदारों ने आगामी प्रोजेक्ट टाल दिए। पिछले हफ्ते अचानक, सरिया की कीमतों में प्रतिदिन 50-100 रुपये की कमी आने लगी और आठ दिनों में कुल 800 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट दर्ज की गई। यह बदलाव सिर्फ बिलासपुर ही नहीं, आसपास के मंडी, हमीरपुर, ऊना, शिमला, और सोलन जैसे क्षेत्रों में भी इसी पैटर्न पर दिखने लगा।
इस गिरावट ने मकान बनवा रहे परिवारों की उम्मीदों को पुनर्जीवित किया। घर का छज्जा अधूरा था, छत के लिए सरिया मंगा नहीं पा रहे थे, अब दाम घटने से अचानक पूरा काम शुरू हो गया है। कुछ मकान मालिकों, जैसे तारा सिंह, ने कहा कि आठ महीने पहले जब भाव 6,000 रुपये रहा था, तब वे मजबूरी में ही सीमित निर्माण कर पाए। अब उन्हीं के लिए कीमत 5,200 रुपये पर आ जाने का मतलब पचास हजार रुपये तक सीधी बचत है।
इस वित्तीय राहत से न केवल ग्राहकों का लाभ हुआ, बल्कि स्थानीय मजदूर वर्ग—राजमिस्त्री, निर्माण मज़दूर, बेलदार—और सप्लाई चैन से जुड़े छोटे ट्रक मालिक, लोडर व दुकानदारों की आमदनी भी दोगुनी हो गई। अर्चना देवी, जो पिछले पांच साल से मजदूरी कार्य कर रही हैं, बताती हैं कि सरिया की मांग बढ़ने के साथ ही मजदूरी की उपलब्धता में भी स्थिरता आई है और बचत के पैसों से उनके बच्चों की शिक्षा पहले से बेहतर हो सकेगी।
व्यापारियों और वितरकों का बाजार ब्यौरा पेश करते हुए देखा जाए तो, बिलासपुर शहर स्थित प्रमुख थोक व्यापारी मीना स्टील मार्ट के मालिक ने बताया कि इस बार मिली गिरावट अप्रत्याशित है। राष्ट्रीय कानूनी परिवर्तनों, लौह-अयस्क के वैश्विक मूल्य, और कंपनियों के स्टॉकिंग पैटर्न में बदलाव—इन सबका सीधा असर जिले के बाजार तक आया। उनके अनुसार, सेल, जिंदल, टाटा स्टील जैसी प्रमुख कंपनियाँ पिछले कई माह से अपने अतिरिक्त स्टॉक निकालने की कोशिश कर रही थीं। मांग में कमी, सप्लाई बढ़ना और कोरोना के बाद श्रमिकों की वापसी के कारण मिलों को अपनी किराया व स्टोरेज लागत से बचना पड़ा।
स्थानीय आर्थिक विशेषज्ञ, प्रोफेसर धर्मपाल सिंह, जो हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष हैं, उन्होंने विस्तार से बताया कि पिछले एक दशक में वैश्विक बाजार बार-बार बदल चुका है। कभी चीन और अमेरिका में भवन निर्माण की मांग बेतहाशा बढ़ी, तो लौह-अयस्क की कीमतें आसमान छूने लगीं। दूसरी ओर, भारत में घरेलू मांग सीमित रही। कोरोना महामारी के बाद निर्माण कामों का ग्राफ तेज़ी से गिरा। कंपनियाँ अपनी लागत और बाजार के दबाव में आकर कीमतें कम करने पर मजबूर हुई हैं।
बिलासपुर शहर की राजधानी से सटे गांवों में भी यही माहौल है। रामपुर के निवासी सुरेश कुमार का कहना है कि उनके गाँव में बीते चार वर्षों में कोई नया मकान नहीं बना था, पर अब जब भाव घटा है, तो छह नए मकानों की नींव साथ-साथ पड़ती दिखी। वे बताते हैं कि कमी सिर्फ कीमत में ही नहीं, बल्कि श्रमिकों की उपलब्धता, ट्रक किराया, और सीमेंट या बजरी सप्लाई में भी आई है। बिलासपुर के व्यापारी और ठेकेदार हमेशा से मांग-आपूर्ति के संतुलन की बात करते रहे हैं।
सीमेट, टाइल्स, बजरी और अन्य निर्माण सामग्री के दाम भी पिछले महीने से स्थिर हैं, जिससे कुल लागत में फायदा मिल रहा है। बिलासपुर के सड़क निर्माण ठेकेदार बताते हैं कि सड़क, पुल और अन्य संरचना के प्रोजेक्ट अब कम लागत में पूरे किए जा रहे हैं, जिससे सरकारी निधि बची है।
राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों ने भी हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों में निर्माण सामग्री की कीमतों और मांग की रिपोर्ट जारी की। उनके मुताबिक, इस गिरावट के पीछे मुख्य कारण है ग्लोबल लौह-अयस्क का दाम 12% कम होना, घरेलू सप्लाई-चैन में लॉजिस्टिक्स लागत कम होना, और मीन्स ऑफ ट्रांसपोर्ट में ऑनलाइन बुकिंग व स्मार्ट डिलीवरी तंत्र का विकास।
लौह-अयस्क, जिसे आम बोलचाल में 'ऑयरन ओर' कहते हैं, भारत में ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और गोवा जैसे राज्यों से सप्लाई होता है। इन राज्यों की खान कंपनियों में उत्पादन बढ़ा, रेलवे का किराया कम हुआ—इन सबसे सरिया बाजार में तेजी आई। पिछले वर्ष की तुलना में बिलासपुर में इस समय सप्लाई 13% अधिक है और कीमत 17% कम।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि स्टील इंडस्ट्री की लागत में सीधे तौर पर ऊर्जा मूल्य का बहुत बड़ा प्रभाव है। मान लिया जाए, कोयला, बिजली दर, ट्रांसपोर्ट खर्च यदि कम रहता है, तो कंपनियाँ अपनी उत्पादन नीति लचीली रखती हैं। इस कारण 2025 में लौह-अयस्क का दाम कम होते ही बड़े पैमाने पर उत्पादन हुआ।
उद्योग मंत्रालय ने इस गिरावट की पुष्टि करते हुए कहा कि भविष्य में निर्माण सामग्री की कीमतें इसी तरह स्थिर बनी रहेंगी, यदि घरेलू मांग बढ़े और श्रमिक वर्ग को पर्याप्त रोजगार मिलता रहे। वे बताते हैं कि आने वाले साल में रियल एस्टेट सेक्टर को सरकार से कई नई परियोजनाओं के लिये वित्तीय सहायता मिलेगी।
इसी बीच पर्यावरणविद् तारा शर्मा ने देखा कि निर्माण कार्य बढ़ने से पर्यावरण पर भी असर पड़ता है। उन्होंने कहा कि लागत कम होने से निर्माण कार्य तेजी से हुआ, लेकिन नुकसान तभी है जब मजदूरों की सुरक्षा, श्रमिक अधिकारों और पर्यावरण मानकों का पालन न हो। स्थानीय पंचायतों और नगर निगम ने मिलकर सफाई और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए कई अभियान चलाए हैं।
बिलासपुर और उसके आसपास के शहरी इलाकों में निर्माण सामग्री के विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। कई कंपनियाँ अपने ब्रांडेड स्टील व सरिया के लिये ऑनलाइन ऑफर्स और डिस्काउंट देने लगी हैं। ग्राहक अब ऑनलाइन पोर्टल से रेट की तुलना कर सकते हैं और डिजिटल भुगतान के ज़रिए कैशबैक व नकद छूट पा सकते हैं। इससे बाजार में पारदर्शिता आई और ठगी का खतरा कम हुआ।
प्रमुख व्यापारी संगठनों ने अपने बयान में कहा कि यदि वैश्विक बाजार में कोई बड़ी हलचल नहीं होती, तो हिमाचल प्रदेश समेत पूरे उत्तर भारत में सरिया और निर्माण सामग्री के दाम कम-से-कम अगले छः महीने तक स्थिर रहने की उम्मीद है।
मकान मालिकों ने भी समर्थन जताया है कि गिरावट के समय अगर सरकार विशेष ऋण सुविधा, सस्ती मजदूरी, और गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था करे तो ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ जैसे प्रोजेक्ट्स की रफ्तार बढ़ सकती है।
राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन ने कीमतों की निगरानी के लिए टीम गठित कर दी है। विभिन्न डीलरों और व्यापारियों से हर सप्ताह भाव का ब्यौरा लिया जाता है ताकि कालाबाजारी या मुनाफाखोरी पर कड़ी नजर रखी जाए। इसी कारण निर्माण सामग्री की सप्लाई-चेन स्थिर बनी हुई है और नागरिकों को समय पर सामान मिल रहा है।
आम जन ने भी राहत की सांस ली है। श्रमिक वर्ग को रोजगार के अवसर बढ़े हैं, व्यापारी वर्ग को अधिक बिक्री और मुनाफा मिला है, और सरकार को इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की लागत में कमी की सीधी राहत है।
सरिया दाम में गिरावट के पीछे सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक पहलू भी जुड़े हैं। चुनावी साल में राज्य सरकारें निर्माण सामग्री को किफायती रखने के लिए बार-बार हस्तक्षेप करती हैं, ताकि आम जनता को सीधी राहत मिले। इस गिरावट ने न केवल मौजूदा मकान मालिकों, बल्कि नए दंपति, किरायेदार और छोटे व्यापारी वर्ग को भी लाभ पहुंचाया है जिनके लिए घर बनाना या व्यापार शुरू करना अब आसान हो गया है।
इस लेख की आगे की कड़ियाँ, संवाद, विशेषज्ञ राय, डाटा विश्लेषण, राष्ट्रीय-राज्यीय बाजार तुलना, मजदूर वर्ग की ज़िन्दगी, सरकारी नीति एवं फैसले, निर्माण लागत में बदलाव, पर्यावरणीय प्रभाव, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, श्रमिक अधिकार और भविष्य के रुझानों के साथ लेखन विस्तार से प्रस्तुत किए जाएंगे।
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