Post by : Shivani Kumari
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित विश्व प्रसिद्ध श्रीनयना देवी मंदिर ने एक नया कीर्तिमान रचा है। देश के ५१ शक्तिपीठों में से एक यह पवित्र स्थल अब अपशिष्ट से निर्मित जैविक गैस पर लंगर तैयार करने वाला पहला शक्तिपीठ बन गया है। मंदिर प्रबंधन ने जैव गैस संयंत्र लगाकर न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाया है, बल्कि श्रद्धालुओं को शुद्ध एवं स्वच्छ भोजन परोसने की परंपरा को भी नई ऊंचाई दी है।
यह संयंत्र मंदिर परिसर में ही स्थापित किया गया है। प्रतिदिन आने वाले सैकड़ों श्रद्धालुओं के भोजन से बचे अपशिष्ट, फल-फूलों की मालाएं, प्रसाद के अवशेष तथा रसोई के जैविक कचरे को इस संयंत्र में डाला जाता है। बैक्टीरिया की सहायता से अपघटन प्रक्रिया द्वारा मीथेन युक्त गैस उत्पन्न होती है, जिसका उपयोग लंगर की रसोई में ईंधन के रूप में किया जाता है।
मुख्य बिंदु: एक लीटर जैव गैस से लगभग ४५०० किलो कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है, जो दो परिवारों के एक दिन के खाना पकाने के लिए पर्याप्त है। मंदिर में प्रतिदिन ५०० से १००० श्रद्धालुओं को भोजन कराया जाता है, अतः यह संयंत्र ऊर्जा की दृष्टिकोश से आत्मनिर्भर बन गया है।
मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित रामेश्वर शर्मा ने बताया कि यह विचार तब आया जब वे देखते थे कि प्रतिदिन सैकड़ों किलोग्राम जैविक अपशिष्ट बेकार फेंका जा रहा था। “मां नयना की कृपा से हमें यह संदेश मिला कि अपशिष्ट भी एक संसाधन है। हमने विज्ञान और आस्था को जोड़ा, परिणामस्वरूप यह अनूठा प्रयोग सफल हुआ।”
संयंत्र की क्षमता १० घन मीटर प्रतिदिन है। इसमें २०० किलोग्राम जैविक अपशिष्ट डाला जाता है, जिससे ५ से ६ घन मीटर मीथेन गैस प्राप्त होती है। यह गैस चार बर्नर वाले विशेष चूल्हों में प्रयुक्त होती है, जिन्हें स्थानीय कारीगरों ने तैयार किया है। गैस की शुद्धता ९० प्रतिशत से अधिक है, जिससे भोजन में किसी प्रकार की गंध या अशुद्धि नहीं आती।
परियोजना को हिमाचल प्रदेश ऊर्जा विकास अभिकरण तथा भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने तकनीकी सहायता प्रदान की है। कुल लागत १२ लाख रुपये आई, जिसमें ५० प्रतिशत अनुदान सरकार ने दिया। शेष राशि मंदिर न्यास तथा दानदाताओं ने वहन की।
“यह केवल ऊर्जा संरक्षण नहीं, अपितु मां नयना देवी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। हम अपशिष्ट को धन में बदल रहे हैं।” — मुख्य ट्रस्टी, श्रीनयना देवी मंदिर न्यास
संयंत्र के अतिरिक्त लाभ भी हैं। अपघटन के बाद बचा हुआ अवशेष उच्च कोटि का जैविक खाद है, जिसे मंदिर के बगीचों तथा आसपास के किसानों को निःशुल्क वितरित किया जाता है। इस खाद से उगाई गई सब्जियां पुनः लंगर में प्रयुक्त होती हैं, जिससे एक पूर्ण चक्रीय अर्थव्यवस्था स्थापित हो गई है।
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. अनीता शर्मा कहती हैं, “एक टन जैविक अपशिष्ट से लगभग ५० घन मीटर मीथेन गैस बनती है, जो २५ लीटर मिट्टी के तेल के बराबर है। मंदिर जैसे सार्वजनिक स्थल पर यह तकनीक अपनाना अन्य धार्मिक स्थलों के लिए प्रेरणास्रोत है।”
मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की प्रतिक्रिया भी सकारात्मक है। पंजाब से आईं सरोज बाला ने कहा, “हमें पता चला कि लंगर अपशिष्ट से बनी गैस पर पक रहा है, तो मन में और श्रद्धा बढ़ गई। यह साफ-सुथरा और पवित्र भोजन है।”
तकनीकी विवरण:
• संयंत्र प्रकार: स्थिर गुंबद डाइजेस्टर
• क्षमता: १० घन मीटर/दिन
• इनपुट: २०० किग्रा जैविक अपशिष्ट
• आउटपुट: ५-६ घन मीटर मीथेन (९०% शुद्ध)
• खाद उत्पादन: ५० किग्रा/दिन (एनपीके समृद्ध)
• रखरखाव: मासिक जीवाणु संस्कृति नवीकरण
यह परियोजना अन्य शक्तिपीठों तथा बड़े मंदिरों के लिए मॉडल बन रही है। वैष्णो देवी, अमरनाथ, केदारनाथ जैसे तीर्थ स्थल भी इसी दिशा में अध्ययन कर रहे हैं। हिमाचल सरकार ने घोषणा की है कि अगले तीन वर्षों में ५० धार्मिक स्थलों पर ऐसे संयंत्र स्थापित किए जाएंगे।
मंदिर न्यास अब दूसरे चरण की योजना बना रहा है। इसमें सौर ऊर्जा संयोजन होगा, जिससे दिन में बिजली तथा रात में जैव गैस का उपयोग संभव हो सके। साथ ही, अपशिष्ट जल शुद्धिकरण इकाई भी लगाई जाएगी, ताकि मंदिर का कोई भी जल स्रोत प्रदूषित न हो।
श्रीनयना देवी मंदिर की यह पहल न केवल धार्मिक आस्था और आधुनिक विज्ञान का सुंदर संगम है, बल्कि स्वच्छ भारत, हरित भारत तथा आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने की दिशा में एक ठोस कदम है। जब मां नयना का लंगर अपशिष्ट से बनी गैस पर पकता है, तो हर कौर में पर्यावरण संरक्षण की मिठास घुलती है।
यह प्रयोग सिद्ध करता है कि परंपरा और तकनीक में कोई विरोध नहीं। दोनों मिलकर समाज को नई दिशा दे सकते हैं। आने वाली पीढ़ियां इस मंदिर को न केवल शक्तिपीठ के रूप में, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक के रूप में भी याद रखेंगी।
मंदिर आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को यह संदेश दिया जाता है — “अपशिष्ट फेंकें नहीं, ऊर्जा बनाएं।” छोटे-छोटे कदमों से बड़ा परिवर्तन संभव है। मां नयना देवी की जय के साथ, हरित क्रांति की जय भी गूंज रही है।
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