बद्दी में श्रीमद्भागवत कथा का चौथा दिन, श्रद्धालुओं ने सुने धर्म और भक्ति के संदेश
बद्दी में श्रीमद्भागवत कथा का चौथा दिन, श्रद्धालुओं ने सुने धर्म और भक्ति के संदेश

Author : Sourabh Jain

June 12, 2026 1:42 p.m. 124

बद्दी के साई रोड स्थित गुल्लरवाला के ऐतिहासिक दुर्गा माता मंदिर परिसर में इन दिनों श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन चल रहा है। समस्त ग्रामवासियों के सहयोग से आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। कथा के दौरान भक्तों को धर्म, अध्यात्म और जीवन मूल्यों से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें सुनने का अवसर मिल रहा है।

क्षेत्र के प्रसिद्ध कथावाचक ऋषि गौतम अपने प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को भागवत और महाभारत के विभिन्न प्रसंगों से परिचित करा रहे हैं। कथा के चौथे दिन भी मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। भक्तों ने श्रद्धा और भक्ति के साथ कथा का श्रवण किया और धार्मिक वातावरण में आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया।

भीष्म पितामह के जीवन से मिला प्रेरणादायक संदेश

कथावाचक ऋषि गौतम ने अपने प्रवचनों में महाभारत के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों का उल्लेख किया। उन्होंने भीष्म पितामह के जीवन की चर्चा करते हुए बताया कि वे त्याग, तपस्या और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक थे। उन्होंने अपने पिता के सम्मान और वचन की रक्षा के लिए जीवनभर कठिन निर्णय लिए।

प्रवचन के दौरान बताया गया कि भीष्म पितामह को अपने पिता से इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इसी कारण वे महाभारत युद्ध में घायल होने के बाद भी लंबे समय तक जीवित रहे और उचित समय आने पर ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे। उनके जीवन से कर्तव्य पालन, धैर्य और समर्पण की प्रेरणा मिलती है।

राजा परीक्षित की कथा का किया वर्णन

कथा के दौरान राजा परीक्षित के जीवन से जुड़े प्रसंगों का भी विस्तार से वर्णन किया गया। श्रद्धालुओं को बताया गया कि राजा परीक्षित का जीवन मानव को धर्म और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाला माना जाता है। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु निश्चित है, तब उन्होंने सांसारिक मोह-माया का त्याग कर ईश्वर की भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया।

कथावाचक ने कहा कि राजा परीक्षित ने अपने राज्य का दायित्व अपने उत्तराधिकारी को सौंपकर गंगा तट पर जाकर संतों और ऋषियों के बीच आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। उनके जीवन की यह घटना लोगों को यह संदेश देती है कि जीवन में धर्म और सत्य का मार्ग सबसे महत्वपूर्ण होता है।

प्रवचन के दौरान महाभारत युद्ध के बाद की एक महत्वपूर्ण घटना का भी उल्लेख किया गया। श्रद्धालुओं को बताया गया कि जब पांडव वंश को समाप्त करने का प्रयास किया गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य स्वरूप से एक अजन्मे बालक की रक्षा की थी।

कथावाचक ने बताया कि भगवान की कृपा और संरक्षण के कारण ही वह बालक सुरक्षित रहा और आगे चलकर उसका नाम परीक्षित पड़ा। इस प्रसंग को सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गए और मंदिर परिसर में भक्ति का वातावरण और अधिक गहरा हो गया।

श्रद्धालुओं ने लिया कथा का आध्यात्मिक लाभ

श्रीमद्भागवत कथा के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीणों और श्रद्धालुओं ने भाग लिया। कथा स्थल पर सुबह से ही भक्तों की आवाजाही बनी रही। लोगों ने पूरे मनोयोग से कथा का श्रवण किया और धार्मिक संदेशों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया। धार्मिक कार्यक्रम में क्षेत्र के कई गणमान्य लोग भी मौजूद रहे। सभी ने कथा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज में आध्यात्मिक चेतना और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देते हैं। कथा के माध्यम से नई पीढ़ी को भी भारतीय संस्कृति, धर्म और परंपराओं की जानकारी मिलती है।

प्रतिदिन हो रहा है भंडारे का आयोजन

श्रीमद्भागवत कथा के साथ-साथ प्रतिदिन भंडारे का आयोजन भी किया जा रहा है। कथा समाप्त होने के बाद श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं। स्थानीय लोगों और समाजसेवियों द्वारा भंडारे की सेवा में बढ़-चढ़कर योगदान दिया जा रहा है। आयोजकों ने बताया कि कथा के आगामी दिनों में भी विभिन्न धार्मिक प्रसंगों का वर्णन किया जाएगा। श्रद्धालुओं में कथा को लेकर लगातार उत्साह बना हुआ है और बड़ी संख्या में लोग प्रतिदिन कथा स्थल पर पहुंचकर धर्म और अध्यात्म का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। यह आयोजन क्षेत्र में भक्ति, संस्कृति और सामाजिक एकता का संदेश देने का कार्य कर रहा है।

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