Post by : Himachal Bureau
ब्रिटिश शासनकाल में भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी रही शिमला का आकर्षण आज भी विदेशों में रहने वाले लोगों के लिए कम नहीं हुआ है। पहाड़ों की रानी कहलाने वाला यह शहर न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि ऐतिहासिक धरोहरों और औपनिवेशिक काल की यादों के लिए भी जाना जाता है। अंग्रेजों के समय में शिमला प्रशासनिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। यहां कई ब्रिटिश अधिकारी और उनके परिवार लंबे समय तक रहे। आज भी उनके वंशज अपने पूर्वजों की यादों और जड़ों की तलाश में शिमला पहुंचते हैं।
सोमवार को भी ऐसा ही एक भावुक दृश्य नगर निगम शिमला के कार्यालय में देखने को मिला, जब इंगलैंड से आया एक दंपति अपनी दादी से जुड़ी ऐतिहासिक जानकारी हासिल करने की उम्मीद लेकर यहां पहुंचा। इंगलैंड निवासी टैली ब्लेसवेथ अपनी पत्नी के साथ शिमला पहुंचे थे। उनका उद्देश्य केवल पर्यटन नहीं था, बल्कि वे अपने परिवार के इतिहास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कड़ी को खोजने आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी दादी एलेसबर्थ ह्यूज का निधन शिमला में हुआ था और वे उनका मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त करना चाहते हैं।
दंपति को उम्मीद थी कि नगर निगम के रिकॉर्ड में उनकी दादी का नाम दर्ज होगा और उन्हें आधिकारिक प्रमाण मिल सकेगा। यह दस्तावेज उनके परिवार के लिए भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उनके पारिवारिक इतिहास को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों को बताने में मदद मिलेगी।
टैली ब्लेसवेथ ने नगर निगम शिमला में अपनी दादी एलेसबर्थ ह्यूज के मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए औपचारिक आवेदन किया। आवेदन प्राप्त होते ही निगम प्रशासन ने रिकॉर्ड खंगालने की प्रक्रिया शुरू कर दी। अधिकारियों ने सबसे पहले ऑनलाइन पोर्टल पर उपलब्ध डिजिटल डेटा की जांच की, लेकिन वहां संबंधित जानकारी नहीं मिली।
इसके बाद अधिकारियों ने पुराने हस्तलिखित रजिस्टरों और ऑफलाइन अभिलेखों को भी खंगालना शुरू किया। कई दशक पुराने रजिस्टरों में दर्ज सूचनाओं को ध्यानपूर्वक देखा गया। पुराने दस्तावेजों को संभालकर रखने और उनमें से जानकारी निकालने का कार्य आसान नहीं था, क्योंकि कई रिकॉर्ड समय के साथ खराब भी हो चुके हैं।
नगर निगम के कर्मचारियों ने पूरी मेहनत और लगन से रिकॉर्ड की जांच की, लेकिन काफी मशक्कत के बाद भी एलेसबर्थ ह्यूज का कोई उल्लेख नहीं मिल सका। ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों में नाम की पुष्टि नहीं हो पाई। नगर निगम के संयुक्त आयुक्त भुवन शर्मा ने बताया कि विदेशी दंपति की भावनाओं को समझते हुए संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए थे कि वे उपलब्ध सभी पुराने रिकॉर्ड को गहनता से खंगालें। उन्होंने कहा कि निगम प्रशासन ने पूरी पारदर्शिता और गंभीरता के साथ खोजबीन की, लेकिन फिलहाल कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई है।
यह मामला एक बार फिर पुराने अभिलेखों के संरक्षण की चुनौती को सामने लाता है। ब्रिटिश काल के कई रिकॉर्ड समय के साथ नष्ट या क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। डिजिटलाइजेशन की प्रक्रिया अभी भी कई जगह अधूरी है, जिसके कारण पुराने दस्तावेजों को खोजना कठिन हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐतिहासिक दस्तावेजों का बेहतर तरीके से डिजिटलीकरण किया जाए, तो न केवल विदेशी नागरिकों बल्कि स्थानीय लोगों को भी अपने परिवार के इतिहास से जुड़ी जानकारी आसानी से मिल सकेगी।
हालांकि फिलहाल रिकॉर्ड नहीं मिल पाया है, लेकिन दंपति ने उम्मीद जताई है कि वे अन्य अभिलेखागार या चर्च रिकॉर्ड में भी तलाश करेंगे। उनके लिए यह केवल एक कागजी दस्तावेज नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों से जुड़ाव का प्रतीक है। शिमला आज भी अपने ऐतिहासिक अतीत और औपनिवेशिक विरासत के कारण दुनियाभर के लोगों को आकर्षित करता है। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि शहर का इतिहास केवल इमारतों और सड़कों में ही नहीं, बल्कि लोगों की यादों और परिवारों की कहानियों में भी जीवित है।
नगर निगम प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि यदि भविष्य में कोई संबंधित जानकारी मिलती है, तो दंपति को अवश्य सूचित किया जाएगा। फिलहाल यह खोज भले ही अधूरी रह गई हो, लेकिन यह घटना शिमला के ऐतिहासिक महत्व और वैश्विक जुड़ाव को एक बार फिर उजागर करती है।
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