Author : Rajesh Vyas
पालमपुर में स्थित एक ऐतिहासिक विद्यालय, जिसकी स्थापना वर्ष 1868 में मंडी रियासत के तत्कालीन राजा बिजेश सेन द्वारा उपहार स्वरूप की गई थी, आज अपनी विरासत और पहचान को लेकर चर्चा में है। यह विद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि क्षेत्र के इतिहास और सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
करीब डेढ़ सौ वर्षों से अधिक पुराना यह संस्थान शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर योगदान देता आ रहा है। इस विद्यालय ने कई पीढ़ियों को शिक्षित किया और समाज को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्थानीय लोग इस स्कूल को गर्व और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि यह क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा हुआ है।
प्रदेश सरकार द्वारा स्कूलों के मर्जर को लेकर जारी निर्देशों के तहत अब इस ऐतिहासिक विद्यालय को भी दूसरे विद्यालय के साथ जोड़ा गया है। राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला पालमपुर, जो नेहरू चौक पालमपुर के सामने स्थित है, का मर्जर राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला सह शिक्षा पालमपुर, जो राम चौक घुग्गर में स्थित है, के साथ कर दिया गया है। इस निर्णय के बाद विद्यालय की स्वतंत्र पहचान समाप्त हो जाएगी और यह नए प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत संचालित होगा। इस फैसले ने स्थानीय लोगों, अभिभावकों और पूर्व छात्रों के बीच चर्चा और चिंता दोनों को जन्म दिया है।
वर्तमान समय में इस विद्यालय में छठी कक्षा से लेकर जमा दो तक कुल 251 छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। यदि प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को भी जोड़ा जाए, तो कुल संख्या लगभग 370 तक पहुंच जाती है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि विद्यालय अभी भी सक्रिय रूप से संचालित हो रहा है और बड़ी संख्या में छात्राओं को शिक्षा प्रदान कर रहा है। ऐसे में विद्यालय के मर्जर को लेकर यह प्रश्न उठ रहा है कि इससे छात्राओं की पढ़ाई, सुविधाओं और प्रबंधन पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
यह विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहर का प्रतीक भी है। 1868 में स्थापित यह संस्थान मंडी रियासत के इतिहास से जुड़ा हुआ है। स्थानीय नागरिकों का मानना है कि ऐसे ऐतिहासिक संस्थानों की पहचान और विरासत को संरक्षित रखा जाना चाहिए।
कई लोगों का कहना है कि प्रशासनिक सुधार और संसाधनों के बेहतर उपयोग के उद्देश्य से यदि मर्जर किया गया है, तो भी ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए विशेष कदम उठाए जाने चाहिए। विद्यालय की पुरानी इमारत और उससे जुड़ी स्मृतियां क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं।
मर्जर के निर्णय के बाद अभिभावकों में यह चिंता भी देखी जा रही है कि क्या नए परिसर में सभी छात्राओं को पर्याप्त सुविधा मिल पाएगी। विद्यालय की दूरी, परिवहन व्यवस्था और कक्षाओं की उपलब्धता जैसे मुद्दे भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार को ऐसे निर्णय लेते समय ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान छात्र संख्या दोनों पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए।
सरकार का उद्देश्य संभवतः शिक्षा व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित और संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है। लेकिन इस प्रक्रिया में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाले संस्थानों की पहचान को बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। पालमपुर का यह विद्यालय वर्षों से शिक्षा की अलख जगा रहा है। यहां से पढ़कर निकले अनेक विद्यार्थियों ने विभिन्न क्षेत्रों में नाम कमाया है। ऐसे में विद्यालय के मर्जर को लेकर यह बहस जारी है कि क्या यह कदम शिक्षा के हित में है या इससे एक ऐतिहासिक पहचान धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी।
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