Author : Prem Sagar
हिमाचल प्रदेश की प्रसिद्ध सैंज घाटी एक बार फिर आस्था, श्रद्धा और देव परंपराओं के रंग में पूरी तरह डूब गई, जब रुपी रैला (धलियारा) की आराध्य गढ़पति माहामाई आशापुरी का ऐतिहासिक बागीकशैड़ी दौरा पूरे विधि-विधान और परंपरागत उत्साह के साथ आरंभ हुआ। यह पावन देव यात्रा लगभग 13 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आयोजित हुई, जिस कारण पूरे क्षेत्र में विशेष उत्साह और आध्यात्मिक उमंग देखने को मिली। नव-निर्मित देवरथ के निर्माण के उपरांत जैसे ही यह यात्रा प्रारंभ हुई, घाटी के हर गांव, हर घर और हर श्रद्धालु के मन में एक नई ऊर्जा का संचार हो गया।
गढ़पति माहामाई आशापुरी के लिए तैयार किया गया नया देवरथ इस यात्रा का विशेष आकर्षण रहा। शनिवार के दिन शुभ मुहूर्त में जब देवरथ को विधिवत रूप से सजाकर यात्रा के लिए निकाला गया, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनियां, ढोल-नगाड़ों की गूंज और शंखनाद के साथ श्रद्धालुओं के जयकारे गूंजने लगे। हर ओर “माता आशापुरी की जय” के स्वर सुनाई दे रहे थे। यह दृश्य न केवल धार्मिक था, बल्कि सैंज घाटी की जीवंत देव संस्कृति का सशक्त प्रतीक भी बन गया।
इस देव यात्रा का प्रमुख उद्देश्य कोठी शैंशर के ऐतिहासिक बागीकशैड़ी दौरे को पूर्ण करना था, जिसे सैंज घाटी की सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन देव यात्राओं में गिना जाता है। वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, यह दौरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का उत्सव भी माना जाता है। 13 वर्षों बाद इस पवित्र यात्रा के पुनः आरंभ होने से बुजुर्गों की आंखों में आस्था की चमक और युवाओं के मन में अपनी परंपरा को जानने की जिज्ञासा साफ दिखाई दी।
देवरथ यात्रा का पहला पड़ाव मनू ऋषि की पावन तपोस्थली शैंशर धारा देहूरा रहा। यह स्थान प्राचीन काल से ही तप, साधना और देव संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मान्यता है कि यहीं पर मनू ऋषि ने तपस्या की थी, जिसके कारण यह क्षेत्र आज भी आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण माना जाता है। जब देवरथ इस पवित्र स्थल पर पहुंचा, तो श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा और पूजा-अर्चना के साथ माता का स्वागत किया। पूरा वातावरण शांति, श्रद्धा और भक्ति से भर गया।
शैंशर धारा देहूरा में माता आशापुरी का भव्य देव मिलन संपन्न हुआ, जहां माता सतरूपा, मनू ऋषि और काशू नारायण के साथ दिव्य संगम देखने को मिला। इस देव मिलन को देखने के लिए आसपास के गांवों से ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचे। इस अवसर पर देव वाणी, पारंपरिक नृत्य और लोक गीतों के माध्यम से देव संस्कृति की अद्भुत झलक देखने को मिली। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा क्षेत्र कुछ समय के लिए सांसारिक चिंताओं से मुक्त होकर केवल भक्ति और आस्था में लीन हो गया हो।
देव मिलन के पश्चात देवरथ यात्रा आगे बढ़ी और तूंघ गांव से होते हुए तलियाहरा गांव पहुंची। इस पूरे मार्ग में ग्रामीणों ने अपने-अपने घरों के बाहर दीप प्रज्ज्वलित किए, फूल बरसाए और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ माता का स्वागत किया। महिलाओं ने लोक गीत गाए, बुजुर्गों ने देव परंपराओं से जुड़ी कथाएं सुनाईं और युवाओं ने इस ऐतिहासिक क्षण को सहेजने के लिए इसे अपने जीवन का यादगार हिस्सा बना लिया। यह यात्रा केवल एक मार्ग की यात्रा नहीं थी, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली एक सांस्कृतिक कड़ी भी बन गई।
लगभग 13 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब यह ऐतिहासिक देव यात्रा पुनः आयोजित हुई, तो लोगों की भावनाएं स्वतः ही उमड़ पड़ीं। बुजुर्गों ने बताया कि कैसे उन्होंने बचपन में इस यात्रा को देखा था और आज फिर वही परंपरा जीवंत होती देख उन्हें गर्व और संतोष की अनुभूति हो रही है। युवाओं के लिए यह यात्रा अपनी जड़ों से जुड़ने और देव संस्कृति को करीब से समझने का एक दुर्लभ अवसर बन गई। इस आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि समय चाहे कितना भी बदल जाए, सैंज घाटी की देव परंपराएं आज भी उतनी ही जीवंत और सशक्त हैं।
यह देव यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने सामाजिक समरसता और सामूहिक सहयोग की भावना को भी मजबूत किया। यात्रा के दौरान सभी जाति, वर्ग और उम्र के लोग एक साथ जुड़े नजर आए। कहीं भंडारे का आयोजन हुआ, कहीं यात्रियों के लिए जल और विश्राम की व्यवस्था की गई। यह सब दर्शाता है कि देव संस्कृति किस प्रकार समाज को जोड़ने और आपसी भाईचारे को बढ़ावा देने का कार्य करती है।
गढ़पति माहामाई आशापुरी का यह ऐतिहासिक बागीकशैड़ी दौरा सैंज घाटी की सांस्कृतिक पहचान को एक बार फिर नई ऊर्जा प्रदान करने वाला सिद्ध हुआ। लोक परंपराएं, देव रीतियां और सामूहिक आस्था इस यात्रा के माध्यम से पुनः जीवंत हो उठीं। यह आयोजन न केवल वर्तमान पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण रहा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बन गया, जिससे वे अपनी संस्कृति, परंपरा और देव आस्था को समझ सकें और आगे बढ़ा सकें।
अंततः यह कहा जा सकता है कि रुपी रैला की गढ़पति माहामाई आशापुरी की 13 वर्षों बाद निकली यह भव्य देव यात्रा सैंज घाटी के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है। यह यात्रा आस्था, tradition, culture और social unity का ऐसा संगम बनी, जिसने पूरे क्षेत्र को एक सूत्र में बांध दिया। आने वाले वर्षों में भी जब इस यात्रा का स्मरण किया जाएगा, तो यह लोगों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने और देव संस्कृति को सहेजने की प्रेरणा देती रहेगी।
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