संविधान सर्वोपरि: आस्था, धर्मग्रंथ और देवपरंपरा के बीच संतुलन की राह
संविधान सर्वोपरि: आस्था, धर्मग्रंथ और देवपरंपरा के बीच संतुलन की राह

Post by : BS Shetty Chet

Dec. 29, 2025 12:25 p.m. 573

भारत जैसे विविध और लोकतांत्रिक देश में यह बहस नई नहीं है कि शासन और समाज का मार्गदर्शन किससे होना चाहिए—संविधान से, धार्मिक ग्रंथों से या फिर स्थानीय देवपरंपराओं से। लेकिन यदि हम इतिहास, कानून और समाज—तीनों को शांत मन से देखें, तो स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्र-जीवन को दिशा देने में संविधान सर्वोपरि है, जबकि धर्म और देवपरंपराएँ हमारे नैतिक और सांस्कृतिक जीवन को सँवारती हैं। भारत जैसे विविध और जीवंत लोकतंत्र में आस्था, परंपरा और आधुनिक कानून—तीनों साथ-साथ चलते हैं। संविधान रास्ता दिखाता है, धर्म मूल्य देता है और देवपरंपरा पहचान बनाती है। कभी-कभी ये एक-दूसरे से टकराते प्रतीत होते हैं, लेकिन सच यह है कि इनका वास्तविक उद्देश्य समाज को बेहतर, सुरक्षित और न्यायपूर्ण बनाना ही है।

संविधान यह स्पष्ट करता है कि किसी भी नागरिक के अधिकार आस्था, जाति या परंपरा के नाम पर कुचले नहीं जा सकते। यही लोकतंत्र की असली रीढ़ है। धार्मिक ग्रंथ सदियों से मानव समाज को नैतिक दिशा देते आए हैं। वे सत्य, करुणा, संयम और कर्तव्य का संदेश देते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य आध्यात्मिक मार्गदर्शन है—शासन और न्याय की व्यवस्था नहीं।

इसीलिए जब कभी धार्मिक व्याख्याएँ कट्टरता या भेदभाव का रूप लेती हैं, तब संविधान संतुलन बनाता है और कहता है—हर व्यक्ति पहले नागरिक है, फिर अनुयायी। धर्मग्रंथ हमें मूल्य सिखाते हैं, देवपरंपरा हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है और संविधान हमें भविष्य की दिशा दिखाता है।

प्रश्न यह नहीं है कि कौन बड़ा है, बल्कि यह है कि किसकी भूमिका कहाँ तक है। इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि सार्वजनिक जीवन, अधिकारों और न्याय के प्रश्नों पर अंतिम निर्णय संविधान का ही होता है, क्योंकि वही सभी नागरिकों के लिए समानता, स्वतंत्रता और गरिमा की गारंटी देता है।

धर्मग्रंथ मानव सभ्यता की नैतिक विरासत हैं। रामायण, महाभारत, गीता और वेद—ये सभी हमें करुणा, सत्य, कर्तव्य, संयम और धर्म का भाव सिखाते हैं। इनमें हिंसा, घृणा या अन्याय को किसी भी रूप में आदर्श नहीं माना गया है। लेकिन धार्मिक शिक्षाओं को समय के अनुरूप समझने और व्यवहारिक जीवन में लागू करने के लिए विवेक की आवश्यकता होती है।

इसीलिए जब कभी धार्मिक व्याख्याएँ सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव या स्त्री-पुरुष असंतुलन को उचित ठहराने लगती हैं, तब संविधान हमें याद दिलाता है कि किसी भी परंपरा से ऊपर मानव की गरिमा है।

हिमाचल की देवपरंपरा का अपना एक अनूठा इतिहास है। गाँव-गाँव में देवता समुदाय का मार्गदर्शन करते हैं। उत्सव मिल-बैठने, बाँटने और सहयोग की भावना को मजबूत करते हैं। ये स्थानीय परंपराएँ हैं। किंतु इतिहास में कभी-कभी देवपरंपरा के नाम पर सामाजिक वर्गों के बीच दूरियाँ भी पैदा हुई हैं। ऐसी परंपराएँ भी बनीं, जहाँ कुछ लोगों को केवल जन्म के आधार पर ऊँचा और कुछ को नीचा मान लिया गया।

ऐसी परंपराएँ मनुष्यों को जातिवाद में बाँटती हैं। यहीं से भेदभाव और ऊँच-नीच की भावना जन्म लेती है। सोचने वाली बात यह है कि यदि देव समाज में भी देवताओं के बीच आपसी विवाद हो जाता है, तो वे भी न्यायालय का सहारा लेते हैं और पूरी प्रक्रिया कानून के अनुसार होती है। वहाँ भी अंततः वही संविधान सर्वोपरि होता है।

आज जब समाज शिक्षा, जागरूकता और संविधान की समझ के साथ आगे बढ़ रहा है, तब देवपरंपरा को भी उसी मानवीयता, समानता और सम्मान के साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। परंपरा तभी जीवित रहती है जब वह समय के साथ सुधरती है, कठोर नहीं होती।

हाल के दिनों में हिमाचल के सोशल मीडिया पर शहनाई वादक के एक वीडियो को लेकर बहस तेज हुई। कुछ लोगों ने इसे परंपरा के अपमान के रूप में देखा, तो कुछ ने इसे अभिव्यक्ति का अधिकार कहा। अब शहनाई वादक ने जब कहा कि संविधान सर्वोपरि है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। संविधान सर्वोपरि था, सर्वोपरि है और सर्वोपरि रहेगा।

ऐसे विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि सोशल मीडिया का शोर कई बार मुद्दे को समझने से अधिक उसे उकसाने का काम करता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कलाकार—चाहे वह शहनाई बजाने वाला हो या कोई और—सबसे पहले एक इंसान है। उसकी मेहनत, उसकी आजीविका और उसकी गरिमा का सम्मान आवश्यक है।

यदि शहनाई वादक ने सवाल भी किए हैं, तो उन्हें अनाप-शनाप कहना उचित नहीं है। उनका समाधान खोजना हमारा कर्तव्य बनता है। यदि कोई बात परंपरा से टकराती भी प्रतीत हो, तो संवाद और संवेदनशीलता ही समाधान हैं—न कि अपमान, धमकी या बहिष्कार।

संविधान यहाँ मार्ग दिखाता है—कि किसी की आस्था का मजाक न बने और किसी नागरिक के अधिकार भी न टूटें। जातिवाद इस पूरे विमर्श का सबसे संवेदनशील पहलू है। यह केवल कानून का प्रश्न नहीं, बल्कि मानसिकता का विषय है। संविधान ने स्पष्ट कहा है कि जन्म के आधार पर किसी को ऊँचा या नीचा नहीं माना जा सकता।

धर्मग्रंथों के मूल संदेश भी यही हैं—मनुष्य कर्म से बड़ा होता है, जन्म से नहीं। इसलिए देवपरंपरा की असली आत्मा तभी सुरक्षित रहेगी जब मंदिरों, उत्सवों और सामाजिक अवसरों में हर व्यक्ति को बराबरी का स्थान मिले।

आज की पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वह पूर्वजों की परंपराओं का सम्मान करे, लेकिन उनमें छिपी असमानताओं को बिना भय और बिना कटुता के सुधारने का साहस भी रखे।

अंततः प्रश्न फिर वही है—हमारे लिए सर्वोपरि क्या है? उत्तर स्पष्ट है: सार्वजनिक व्यवस्था, नागरिक अधिकार, कानून और न्याय के मामलों में संविधान सर्वोपरि है। क्योंकि संविधान किसी एक समुदाय, धर्म या परंपरा का नहीं, पूरे भारत का है।

वह हमें यह सिखाता है कि आस्था निजी है, लेकिन न्याय सार्वजनिक है; पूजा व्यक्तिगत है, पर अधिकार सार्वभौमिक हैं। धर्मग्रंथ हमारी आत्मा को मजबूत बनाते हैं, देवपरंपरा हमारी पहचान को समृद्ध करती है और संविधान हमारे लोकतंत्र को सुरक्षित रखता है।

जब ये तीनों मिलकर चलते हैं—आस्था संवेदनशील हो, परंपरा मानवीय हो और संविधान मार्गदर्शक हो—तभी समाज सुदृढ़, एकजुट और प्रगतिशील बनता है। यही वह संतुलन है, जिसकी हमें सबसे अधिक आवश्यकता है—ताकि न आस्था आहत हो, न अधिकार टूटें और न ही इंसान छोटा पड़े।

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