Post by : Khushi Joshi
टैरिफ और ट्रेड विवादों की पृष्ठभूमि में भारत और अमरीका के बीच ऊर्जा क्षेत्र में एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है, जो आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई दिशा देगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई यह पहली बड़ी ऊर्जा डील है, जिसके तहत भारत वर्ष 2026 में अमरीका से लगभग 2.2 मिलियन टन तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) खरीदेगा। यह मात्रा भारत की कुल वार्षिक जरूरत का करीब 10 प्रतिशत है, जो इस सौदे को अत्यधिक महत्वपूर्ण बनाती है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता देश है और अपनी मांग का लगभग 50 प्रतिशत से अधिक विदेशी बाजारों से आयात करता है। अब तक भारत की ज्यादातर आयात निर्भरता पश्चिम एशिया पर रही है, लेकिन वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव और राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए भारत अपनी सप्लाई के स्रोतों को विविध करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। अमरीका के साथ यह डील उसी रणनीति का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य ऊर्जा आयात को स्थिर और सुरक्षित बनाना है।
यह सौदा भारत की तीन प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों—इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC), भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL)—ने अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों चेवरॉन, फिलिप्स 66 और टोटल एनर्जीज ट्रेडिंग के साथ मिलकर किया है। यह न केवल आर्थिक रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भू-राजनीतिक दृष्टि से भी यह एक बड़ा संदेश देता है कि भारत सुरक्षित ऊर्जा भविष्य को लेकर कितनी रणनीतिक तैयारी कर रहा है।
देश के पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस डील को भारतीय ऊर्जा क्षेत्र के लिए “ऐतिहासिक और निर्णायक कदम” बताया। उन्होंने कहा कि एलपीजी की बढ़ती घरेलू मांग को देखते हुए यह बहुत आवश्यक था कि भारत अपनी सप्लाई बेस को विस्तृत करे। यूएस से एलपीजी आयात शुरू होने से भारत को स्थिर सप्लाई, बेहतर मूल्य और लंबे समय तक विश्वसनीय ऊर्जा स्रोत मिलेंगे।
पुरी ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सौदा आम भारतीय परिवारों के लिए भी बड़ी राहत लेकर आएगा, क्योंकि इससे एलपीजी सप्लाई अधिक सुरक्षित और किफायती बनेगी। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल बाजार के खुल जाने से अमेरिकी कंपनियों के लिए भी यह एक बड़ा अवसर बनेगा, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और मजबूत होगी।
भारतीय अधिकारियों का मानना है कि यह समझौता लंबे समय में भारत की ऊर्जा निर्भरता को संतुलित करेगा और किसी एक क्षेत्र विशेष पर निर्भरता कम करेगा। साथ ही यह भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार की तीव्र मूल्य उतार-चढ़ाव से भी बचाएगा।
भारत-अमरीका संबंधों में यह डील ऊर्जा सहयोग का एक महत्वपूर्ण अध्याय बनने जा रही है, जो आने वाले समय में दोनों देशों के बीच व्यापार और रणनीतिक सहयोग को नई गति देगी।
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