Post by : Shivani Kumari
भारत के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय ने एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए खांसी की सभी दवाओं पर देशव्यापी प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। यह कदम भारत की बाल स्वास्थ्य नीति में एक ऐतिहासिक सुधार है। इसका उद्देश्य मिलावटी सिरप और विषैले रसायनों से होने वाले खतरे को समाप्त करना है।
हाल के वर्षों में भारत में मिलावटी खांसी की सिरप से जुड़ी कई दुखद घटनाएँ सामने आईं। मध्य प्रदेश में दर्जनों बच्चों की मृत्यु ऐसे सिरप से हुई जिनमें डायथिलीन ग्लाइकोल जैसे जहरीले तत्व पाए गए।
विदेशों में भी भारत निर्मित बाल दवाओं के कारण गाम्बिया और उज़्बेकिस्तान में बच्चों की मौतें हुईं। इन घटनाओं ने भारत की औषधि निर्माण प्रणाली और दवा सुरक्षा नीति पर गंभीर प्रश्न उठाए।
स्वास्थ्य महानिदेशालय द्वारा जारी नए दिशा-निर्देश भारत में अब तक के सबसे सख्त माने जा रहे हैं।
इन नियमों का मुख्य उद्देश्य बच्चों की दवा सुरक्षा सुनिश्चित करना और मिलावटी सिरप पर अंकुश लगाना है।
बाल रोग विशेषज्ञों ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है।
डॉ. नेहा शर्मा, वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ, कहती हैं —
“अधिकांश बच्चों की खांसी सामान्य वायरल संक्रमण के कारण होती है और कुछ दिनों में स्वयं ठीक हो जाती है। ऐसे में घर पर अपनाए जाने वाले उपाय जैसे गुनगुना पानी, भाप, सेलाइन बूंदें और कमरे में नमी बनाए रखना अधिक सुरक्षित और प्रभावी हैं।”
भारतीय बाल रोग अकादमी ने माता-पिता से अपील की है कि वे स्वयं दवा देने की प्रवृत्ति से बचें और हर स्थिति में डॉक्टर से परामर्श करें।
शहरी क्षेत्रों में अभिभावकों ने इस नीति का खुले दिल से स्वागत किया है। हालाँकि, ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी अब भी एक चुनौती बनी हुई है।
सरकार द्वारा शुरू किए गए जागरूकता अभियान माता-पिता को यह सिखा रहे हैं कि बच्चों की खांसी-जुकाम में प्राकृतिक घरेलू उपाय जैसे भाप, हल्का गर्म पानी, शहद (एक वर्ष से अधिक उम्र में) और आराम सबसे सुरक्षित हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के इस निर्णय को दवा सुरक्षा में साहसिक कदम माना जा रहा है। इससे भारत की औषधि गुणवत्ता और विश्वसनीयता को सुधारने में मदद मिलेगी।
इन नियमों से भारत की बाल स्वास्थ्य व्यवस्था में गहरा प्रभाव पड़ेगा।
यह नीति भारत में बच्चों की औषधि सुरक्षा को नई दिशा देगी और देश की स्वास्थ्य प्रणाली को अधिक जिम्मेदार बनाएगी।
स्वास्थ्य महानिदेशालय का यह कदम भारत की ओर से शिशु स्वास्थ्य और दवा सुरक्षा के प्रति मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह केवल एक प्रतिबंध नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियान है।
अब समय है कि माता-पिता, चिकित्सक और नीति निर्माता मिलकर बच्चों के सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य के लिए साथ काम करें।
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