Author : Rajneesh Kapil Hamirpur
ऊना जिले के उपायुक्त जतिन लाल के सरकारी आवास की क्यारी में उगी सब्जियां केवल ताजगी और हरियाली का दृश्य ही प्रस्तुत नहीं कर रहीं, बल्कि वे एक सशक्त और प्रेरणादायक संदेश भी दे रही हैं। यह संदेश है—नीतियों को कागजों तक सीमित न रखकर उन्हें जमीन पर उतारने का और बदलाव की शुरुआत स्वयं से करने का। उपायुक्त ने अपने निजी उदाहरण से यह साबित किया है कि प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ समाज को सही दिशा देने का कार्य भी प्रभावी रूप से किया जा सकता है।
उपायुक्त जतिन लाल ने अपने सरकारी आवास परिसर में गोभी, चुकंदर, टमाटर, मूली, प्याज, शलगम, लहसुन, हरा धनिया, आलू सहित अनेक प्रकार की सब्जियां पूरी तरह प्राकृतिक विधि से उगाई हैं। इन क्यारियों की मिट्टी में बसी ताजगी और उनसे उठती सौंधी खुशबू यह स्पष्ट संकेत देती है कि यह पहल केवल व्यक्तिगत प्रयोग नहीं है, बल्कि प्रशासनिक नेतृत्व के माध्यम से समाज को जागरूक करने और सही राह दिखाने का एक सार्थक प्रयास है।
इस पहल के माध्यम से उपायुक्त जतिन लाल ने मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू की प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने वाली सोच को न केवल अमल में उतारा, बल्कि उसे अपने घर की मिट्टी में बोकर एक सजीव उदाहरण में बदल दिया है। उनका यह कदम यह दर्शाता है कि जब नेतृत्व स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करता है, तो समाज में सकारात्मक बदलाव तेजी से फैलता है।
उपायुक्त का मानना है कि स्वस्थ जीवनशैली की असली शुरुआत थाली से होती है और इसके लिए ज़हर-मुक्त भोजन सबसे बेहतर विकल्प है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से उगा भोजन न केवल स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है, बल्कि स्वाद में भी अधिक समृद्ध होता है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। आज आवश्यकता है कि प्राकृतिक खेती को केवल खेती की पद्धति नहीं, बल्कि जीवनशैली के रूप में अपनाया जाए और इसे एक जनआंदोलन का रूप दिया जाए।
एक छोटी सी क्यारी से शुरू हुई यह कहानी हाल के वर्षों में किसानों द्वारा अपने खेतों को ज़हर-मुक्त बनाने की कोशिशों से जुड़ती चली जाती है। यह पहल यह भी बताती है कि बदलाव बड़े फैसलों से नहीं, बल्कि छोटे और सच्चे प्रयासों से शुरू होता है।
उल्लेखनीय है कि बीते कुछ वर्षों में मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के कुशल नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश में बड़ी संख्या में किसान और बागवान प्राकृतिक और रसायन-मुक्त खेती की ओर आकर्षित हुए हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा लिए गए दूरदर्शी निर्णयों के सकारात्मक परिणाम अब स्पष्ट रूप से सामने आ रहे हैं।
राज्य सरकार द्वारा किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर उपलब्ध कराने, उपज के उचित दाम सुनिश्चित करने, गुणवत्तापूर्ण बीज, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, फसल बीमा, प्रशिक्षण और अनुसंधान जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं पर विशेष ध्यान दिया गया है। इन प्रयासों से किसानों का भरोसा प्राकृतिक खेती की ओर लगातार बढ़ रहा है।
ऊना जिला प्राकृतिक खेती के एक मजबूत मॉडल के रूप में उभरकर सामने आया है। आत्मा परियोजना की निदेशक प्यारो देवी ने जानकारी देते हुए बताया कि जिले में 1907 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती की जा रही है। जिले के कुल 48,006 किसानों में से 14,240 किसान प्रशिक्षण लेकर इस पद्धति को अपना चुके हैं और इससे अपनी आजीविका को सुदृढ़ बना रहे हैं।
उन्होंने बताया कि किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए प्रोत्साहित करने हेतु राज्य सरकार द्वारा विभिन्न प्रकार के अनुदान भी प्रदान किए जा रहे हैं। प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को गौशाला का फर्श पक्का करने और गौमूत्र संग्रह के लिए गड्ढा बनाने हेतु 8 हजार रुपये की सहायता दी जा रही है। इसके अलावा ड्रम खरीद पर 750 रुपये प्रति ड्रम के हिसाब से अधिकतम 2250 रुपये का अनुदान दिया जा रहा है।
इसके साथ ही भारतीय नस्ल की गाय की खरीद पर 50 प्रतिशत या अधिकतम 25 हजार रुपये का अनुदान दिया जा रहा है, जबकि गाय के परिवहन के लिए अतिरिक्त 5 हजार रुपये की सहायता का भी प्रावधान है। ये सभी योजनाएं किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
प्यारो देवी ने यह भी बताया कि प्रदेश सरकार ने प्राकृतिक खेती से उगाई गई फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर किसानों को बड़ा लाभ पहुंचाया है। प्राकृतिक गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 60 रुपये प्रति किलो और मक्की का 40 रुपये प्रति किलो निर्धारित किया गया है। इसके साथ ही किसानों को 2 रुपये प्रति किलो के हिसाब से परिवहन भत्ता भी दिया जा रहा है।
प्राकृतिक मक्की के आटे को ‘हिम भोग’ ब्रांड के तहत बाजार में उतारकर उचित मूल्य की दुकानों के माध्यम से आम जनता तक पहुंचाया जा रहा है। इससे किसानों को सुनिश्चित बाजार मिल रहा है और उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यवर्धक खाद्य विकल्प उपलब्ध हो रहे हैं।
किसानों की सकारात्मक प्रतिक्रिया को देखते हुए राज्य सरकार ने प्राकृतिक खेती से उगाई गई कच्ची हल्दी के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है। चालू वित्त वर्ष से प्राकृतिक कच्ची हल्दी पर 90 रुपये प्रति किलो का एमएसपी प्रदान किया जा रहा है, जिसे ‘हिमाचल हल्दी’ ब्रांड के नाम से बाजार में उतारा जाएगा।
उपायुक्त जतिन लाल ने कहा कि जिला प्रशासन मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंद्र सिंह सुक्खू के निर्देशानुसार किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता उपलब्ध करवा रहा है। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती की सबसे बड़ी विशेषता इसका शून्य लागत मॉडल है, जिससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि होती है, बल्कि भूमि की उर्वरता भी बनी रहती है। उपायुक्त ने लोगों से अधिक से अधिक संख्या में प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील की।
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