Author : Bhardwaj Mandi. (HP) Mandi. HP
हिमाचल प्रदेश में अनाथ बच्चों से जुड़ा एक और संवेदनशील मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पांवटा साहिब क्षेत्र की ग्राम पंचायत कुंठ में रहने वाले दो नाबालिग भाई अरुण और विजय आज अपने ही घर में रहने के लिए तरस रहे हैं। दोनों बच्चों की जिंदगी उस वक्त पूरी तरह बदल गई, जब उनकी मां उन्हें और उनके पिता को छोड़कर चली गई। इसके कुछ समय बाद बीमारी के चलते पिता की भी मृत्यु हो गई, जिसके बाद ये दोनों मासूम पूरी तरह बेसहारा हो गए।
इन बच्चों का पैतृक घर भी बेहद जर्जर हालत में है, जहां रहना जान के खतरे से खाली नहीं है। छत और दीवारों की हालत इतनी खराब है कि किसी भी वक्त बड़ा हादसा हो सकता है। ऐसे हालात में गांव के ही एक पड़ोसी ने इंसानियत दिखाते हुए दोनों बच्चों को अपने घर में आश्रय दिया। यह पड़ोसी खुद मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालता है और सीमित संसाधनों के बावजूद अरुण और विजय को भोजन और रहने की जगह उपलब्ध करवा रहा है।
हालांकि यह सहारा अस्थायी है, क्योंकि उस व्यक्ति के पास इतने साधन नहीं हैं कि वह इन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, कपड़े, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ी जरूरतों को पूरा कर सके। उसके अपने बच्चों की जिम्मेदारी भी उसी के कंधों पर है। ऐसे में उसने कई बार स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मदद की गुहार लगाई। बताया जा रहा है कि इस मामले को लेकर एसडीएम और स्थानीय विधायक को भी अवगत करवाया गया, लेकिन अब तक किसी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को मुख्यमंत्री सुख आश्रय योजना की जानकारी नहीं है, जो विशेष रूप से अनाथ और बेसहारा बच्चों के लिए शुरू की गई है। यह योजना ऐसे ही बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पालन-पोषण की जिम्मेदारी सरकार द्वारा उठाने के उद्देश्य से बनाई गई है। इसके बावजूद अरुण और विजय का मामला अब तक इस योजना तक नहीं पहुंच पाया है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि कुछ दिन पहले जिला चंबा की बझोतरा पंचायत में सामने आए एक समान मामले में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने तुरंत संज्ञान लेते हुए अनाथ बच्चों से वीडियो कॉल पर बात की थी और उन्हें सुख आश्रय योजना के तहत हर संभव मदद का भरोसा दिलाया था। मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता जगजाहिर है, लेकिन पांवटा साहिब के इन दो मासूम बच्चों का मामला उनके संज्ञान में क्यों नहीं लाया गया, यह सवाल अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह मामला समय रहते मुख्यमंत्री तक पहुंचाया जाए, तो अरुण और विजय को भी वही संरक्षण और सम्मानजनक जीवन मिल सकता है, जिसकी वे हकदार हैं। फिलहाल दोनों बच्चे दूसरों की दया और मदद पर जीवन काटने को मजबूर हैं और उनकी पढ़ाई व भविष्य अधर में लटका हुआ है। यह मामला न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा है, बल्कि समाज के सामूहिक दायित्व को भी उजागर करता है।
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