Author : Rajneesh Kapil Hamirpur
हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा के लंबागांव क्षेत्र में किसानों की एक सामूहिक पहल ने ग्रामीण विकास की दिशा में एक मजबूत उदाहरण प्रस्तुत किया है। मई 2023 में स्थापित लंबागांव मिल्क फेड फार्मर प्रोड्यूसर एफपीओ ने बहुत कम समय में किसानों की आर्थिक स्थिति को बदलने का काम किया है। सुआ गांव, जो ब्लॉक लंबागांव और तहसील जयसिंहपुर के अंतर्गत आता है, इस संगठन का केंद्र है।
इस एफपीओ का उद्देश्य किसानों को एक मंच पर लाकर उनकी आय बढ़ाना, खेती को लाभकारी बनाना और गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना है। आज इस संगठन से 500 से अधिक किसान जुड़े हुए हैं। सभी किसान मिलकर सामूहिक रूप से खेती, विपणन और डेयरी गतिविधियों को आगे बढ़ा रहे हैं।
इस एफपीओ की सबसे खास बात इसका महिला नेतृत्व है। 10 निदेशकों में से 5 महिलाएं हैं और संचालन की मुख्य जिम्मेदारी भी महिलाओं के पास है। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं द्वारा इस तरह का नेतृत्व एक सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है।
महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से संगठन में पारदर्शिता, अनुशासन और समर्पण देखने को मिल रहा है। इससे अन्य ग्रामीण महिलाओं को भी प्रेरणा मिली है कि वे केवल सहयोगी भूमिका में ही नहीं, बल्कि नेतृत्व की भूमिका में भी आगे आ सकती हैं।
इस एफपीओ की स्थापना में प्रो. डॉ. अशोक कुमार सरयाल, जो कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के पूर्व कुलपति रह चुके हैं, की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपने गांव लौटकर किसानों को संगठित किया और उन्हें वैज्ञानिक खेती की जानकारी दी।
उन्होंने किसानों को समझाया कि यदि वे संगठित होकर कार्य करेंगे तो खेती को लाभकारी बनाया जा सकता है। क्षेत्र में आवारा पशुओं और बंदरों की समस्या के कारण किसान खेती छोड़ रहे थे। ऐसे में एफपीओ के माध्यम से किसानों को हल्दी और अदरक जैसी सुरक्षित और लाभकारी फसलों की ओर प्रेरित किया गया।
वर्ष 2018 में कृषि विभाग के सहयोग से लगभग 7.5 हेक्टेयर क्षेत्र में सोलर फेंसिंग लगाई गई। इस परियोजना पर 20.50 लाख रुपये खर्च हुए, जिसमें 17.50 लाख रुपये कृषि विभाग ने और 3 लाख रुपये किसानों ने मिलकर वहन किए।
सोलर फेंसिंग लगने से फसलों को आवारा पशुओं से सुरक्षा मिली और किसानों का भरोसा खेती की ओर फिर से लौटा। इसके बाद किसानों ने जैविक गेहूं, मक्का और हल्दी की खेती को दोबारा शुरू किया। कृषि विभाग समय-समय पर जैविक खेती, खाद प्रबंधन, कीट एवं रोग नियंत्रण पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। किसानों को बीज, खाद और कृषि यंत्र भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
हाल ही में कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर और एफपीओ के बीच एक एमओयू हुआ है। इससे किसानों को निरंतर वैज्ञानिक मार्गदर्शन और तकनीकी सहयोग मिल रहा है। यह सहयोग खेती को आधुनिक और लाभकारी बनाने में मदद कर रहा है।
हिमाचल सरकार द्वारा जैविक कच्ची हल्दी को 90 रुपये प्रति किलो के समर्थन मूल्य पर खरीदने का निर्णय किसानों के लिए लाभकारी साबित हुआ है। पहले हल्दी 30 से 35 रुपये प्रति किलो बिकती थी, जिससे किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता था।
अब बेहतर बाजार व्यवस्था और सरकारी योजनाओं के कारण किसानों को उचित मूल्य मिल रहा है। इससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और विपणन की समस्या भी काफी हद तक दूर हुई है।
जिला निगरानी समिति ने एफपीओ को तीन मुख्य गतिविधियों के लिए अधिकृत किया है – जैविक हल्दी, जैविक अदरक और दूध व दुग्ध उत्पादों का संग्रह व वितरण।
वर्तमान में एफपीओ प्रतिदिन 150 से 200 लीटर दूध एकत्र कर 100 से अधिक परिवारों तक घर-द्वार पर दूध, पनीर और दही उपलब्ध करा रहा है। इससे स्थानीय लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है।
बड़े डेयरी किसान प्रतिदिन 35-40 लीटर और छोटे किसान 5-10 लीटर दूध बेच रहे हैं। इससे उनकी मासिक आय में 7,000 से 50,000 रुपये तक की वृद्धि हो रही है। युवाओं को भी डेयरी के माध्यम से अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है।
कृषि उपनिदेशक कुलदीप धीमान के अनुसार, जिला कांगड़ा में हल्दी की खेती से किसानों की आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो रही है। सोलर फेंसिंग जैसे उपायों से फसल सुरक्षा सुनिश्चित हुई है और किसानों का विश्वास मजबूत हुआ है। उपायुक्त कांगड़ा हेमराज बैरवा ने कहा कि प्रदेश सरकार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की पहल के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। लंबागांव एफपीओ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
उन्होंने किसानों से अपील की कि वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं और एफपीओ जैसे संगठनों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ें। लंबागांव एफपीओ यह साबित कर रहा है कि संगठित प्रयास, सही मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं के उचित उपयोग से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है।
यह पहल केवल किसानों की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि महिला सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और आत्मनिर्भरता का मजबूत मॉडल बनकर उभरी है। आने वाले समय में यह मॉडल अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणास्रोत साबित हो सकता है।
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