Post by : Khushi Joshi
हिमाचल प्रदेश में बागबानी क्षेत्र एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। लंबे समय से सेब पर निर्भर रहने वाली बागबानी अर्थव्यवस्था अब धीरे-धीरे विविधता की ओर बढ़ रही है। इसी कड़ी में प्रदेश सरकार और बागबानी विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है, जिसके तहत आने वाले वर्षों में प्लम उत्पादन को सेब के बराबर, बल्कि उससे भी अधिक स्तर तक ले जाने की तैयारी की जा रही है। विभाग ने बताया कि प्लम की उच्च गुणवत्ता वाली नई किस्में ऑस्ट्रेलिया, इटली और संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात की गई हैं, ताकि प्रदेश के बागवान अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेती तकनीकों से अधिक उपज प्राप्त कर सकें।
बागबानी विभाग के विशेषज्ञ कौशल मेहता ने बताया कि हिमाचल के कई क्षेत्रों में बदलते मौसम, कम होती चिलिंग ऑवर्स और अस्थिर जलवायु से सेब उत्पादन प्रभावित हो रहा है। ऐसे क्षेत्रों में प्लम का उत्पादन अधिक लाभकारी साबित हो सकता है, क्योंकि प्लम को अपेक्षाकृत कम चिलिंग ऑवर्स की जरूरत होती है और यह कम ऊंचाई वाले स्थानों पर भी बेहतर परिणाम देता है। उन्होंने बताया कि नई किस्मों में फल का आकार बड़ा, शेल्फ लाइफ लंबी और बाजार में मांग अधिक होती है।
विभाग जल्द ही प्रदेश के अलग-अलग जिलों में जागरूकता शिविर और तकनीकी प्रशिक्षण शिविर आयोजित करेगा, ताकि बागवानों को नई किस्मों, वैज्ञानिक खेती प्रणाली, सही सिंचाई तकनीक और रोग प्रबंधन के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा सके। विभाग का दावा है कि आने वाले वर्षों में यदि बागवान बड़े पैमाने पर प्लम की नई किस्मों को अपनाते हैं, तो प्रदेश की बागबानी आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और किसानों को प्लम की बिक्री से सेब के मुकाबले बेहतर दाम मिल सकते हैं।
प्रदेश के कई क्षेत्रों—जैसे सोलन, मंडी, शिमला ग्रामीण, सिरमौर और कांगड़ा—में नई प्लम किस्मों के ट्रायल पहले ही शुरू किए जा चुके हैं। प्रारंभिक फीडबैक के अनुसार यह किस्में हिमाचल की मिट्टी और जलवायु में बेहद अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। विभाग का कहना है कि प्लम की खेती से उन किसानों को भी लाभ होगा, जिनकी सेब फसल लगातार असफल या कमजोर हो रही है।
नई पौधों के आयात के साथ सरकार का लक्ष्य अगले पाँच वर्षों में प्लम उत्पादन को दोगुना करना है। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि हिमाचल के बागबानी क्षेत्र को नई पहचान भी मिलेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि सही तकनीक, उपयुक्त खाद-पानी और समय पर रोग नियंत्रण से प्लम की पैदावार सेब की तुलना में भी अधिक लाभकारी साबित हो सकती है।
इस पहल को प्रदेश के बागवानों द्वारा सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है, क्योंकि कई क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के कारण पारंपरिक सेब उत्पादन की चुनौतियाँ लगातार बढ़ रही हैं। प्लम विविधता के साथ न केवल बागवानों की जोखिम क्षमता कम होगी, बल्कि प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था भी और मजबूत होगी
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