Author : Bhardwaj Mandi. (HP) Mandi. HP
हिमाचल प्रदेश के पर्यटन शहर धर्मशाला में सामने आई एक दर्दनाक सच्चाई ने पूरे प्रदेश को सोचने पर मजबूर कर दिया है। कांगड़ा जिले में नशे की गिरफ्त में फंसा एक युवक अपने ही पिता के सामने चिट्टे की लत के कारण पूरी तरह टूट चुका दिखाई देता है। पिता उसे घर लौटने के लिए मनाता है, लेकिन बेटा नशे की ऐसी हालत में है कि उसे अपने जीवन, परिवार और सम्मान की कोई परवाह नहीं रह जाती। यह दृश्य केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि हिमाचल में तेजी से फैलते चिट्टा नशा की भयावह हकीकत को सामने लाता है।
इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि नशे की समस्या अब छिपी हुई नहीं रही। धर्मशाला जैसी शांत और धार्मिक पहचान वाली जगहों तक चिट्टा अपनी जड़ें जमा चुका है। नशे की शुरुआत अक्सर दोस्तों के दबाव या शौक के नाम पर होती है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत इंसान को परिवार से दूर कर देती है। जो युवक कभी पढ़ाई और भविष्य की उम्मीद माना जाता है, वही गलत संगत और नशे की वजह से समाज के लिए बोझ बन जाता है। यह कहानी उन सैकड़ों परिवारों की सच्चाई है, जो अंदर ही अंदर टूट रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश में चिट्टा, जो हेरोइन का ही एक रूप है, पिछले कुछ वर्षों में सबसे खतरनाक नशे की समस्या बनकर उभरा है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी सप्लाई बाहरी राज्यों से होकर हिमाचल तक पहुंचती है और युवा इसकी चपेट में सबसे ज्यादा आ रहे हैं। नशे के साथ अपराध, शारीरिक शोषण और सामाजिक पतन भी जुड़ जाता है, जिससे यह संकट केवल कानून का नहीं, बल्कि एक गंभीर मानवीय त्रासदी बन चुका है।
सरकारी आंकड़े भी हालात की गंभीरता को दिखाते हैं। पिछले ढाई वर्षों में हिमाचल में एनडीपीएस एक्ट के तहत 5,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान नशे के कारोबार से जुड़ी करीब 36.95 करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति जब्त की गई है। सरकार ने ड्रग माफिया पर शिकंजा कसने के लिए सख्त कानून बनाए हैं, जिनमें आजीवन कारावास, भारी जुर्माना और संपत्ति कुर्क करने जैसे प्रावधान शामिल हैं। इसके साथ ही हिमाचल सरकार नशे के खिलाफ जागरूकता अभियानों को भी लगातार आगे बढ़ा रही है।
सिर्फ कानून और पुलिस कार्रवाई से ही इस लड़ाई को नहीं जीता जा सकता। समाज और परिवार की भूमिका सबसे अहम है। विशेषज्ञ बताते हैं कि अधिकतर नशाग्रस्त युवा 18 से 30 वर्ष की उम्र के होते हैं। बच्चों के व्यवहार में बदलाव, अचानक खर्च बढ़ना, पढ़ाई या काम से दूरी और चिड़चिड़ापन जैसे संकेतों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। समय रहते काउंसलिंग और नशा मुक्ति केंद्रों की मदद ली जाए, तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।
हिमाचल में सरकारी और निजी नशा मुक्ति केंद्र लगातार काम कर रहे हैं, जहां काउंसलर और डॉक्टर युवाओं को दोबारा सामान्य जीवन की ओर लौटने में मदद कर रहे हैं। स्कूलों, कॉलेजों और पंचायत स्तर पर भी जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। धर्मशाला की यह घटना पूरे प्रदेश के लिए चेतावनी है कि अगर आज नशे के खिलाफ एकजुट होकर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाला समय और भी दर्दनाक हो सकता है। देवभूमि की पहचान बचाने के लिए जरूरी है कि हर परिवार और हर युवा नशे के खिलाफ खड़ा हो और जीवन को चुने।
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