Post by : Himachal Bureau
हिमाचल प्रदेश सरकार वर्तमान में अब तक के सबसे गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रही है। प्रदेश की वित्तीय स्थिति इतनी नाजुक हो चुकी है कि कर्मचारियों की वेतन देनदारियां, पेंशन भुगतान और विभिन्न विकास परियोजनाओं पर गहरा असर पड़ा है। वित्त विभाग द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि सरकार के पास न केवल खर्च पूरा करने के संसाधन कम हैं, बल्कि भविष्य में वित्तीय संतुलन बनाए रखना भी कठिन होता जा रहा है।
प्रदेश के कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए यह समय बेहद चिंताजनक है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार इस वित्तीय संकट के कारण कर्मचारियों को महंगाई भत्ता (DA) और बकाया एरियर देने में असमर्थ है। वित्त विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश पर वेतन और पेंशन संशोधन का लगभग 8,500 करोड़ रुपए का बोझ है, जबकि DA और DR एरियर के रूप में 5,000 करोड़ रुपए और बकाया हैं। यह स्थिति इस कदर गंभीर है कि मौजूदा पे-स्केल को बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। आगामी DA की किस्त जारी करने की स्थिति में भी सरकार फिलहाल नहीं है।
प्रदेश में नागरिकों से जुड़े कल्याणकारी और स्वास्थ्य योजनाएं भी संकटग्रस्त हैं। सरकार ने माना है कि वह 'हिमकेयर' और 'सहारा' जैसी प्रमुख योजनाओं के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं करा पा रही है। इसके अलावा लगभग 2,000 करोड़ रुपए के विकास कार्य भी अगले वित्त वर्ष के लिए लंबित रह गए हैं। केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं के लिए मैचिंग ग्रांट देने का बजट भी पूरी तरह समाप्त हो गया है, जिससे नए विकास कार्यों की शुरुआत करना मुश्किल हो गया है।
आर्थिक तंगी का असर नीतिगत और कानूनी फैसलों पर भी पड़ रहा है। कोर्ट के आदेशों के अनुसार सरकार को करीब 1,000 करोड़ रुपए का भुगतान करना है, लेकिन राजकोष खाली होने के कारण यह राशि चुकाना असंभव हो गया है। बिगड़ते वित्तीय हालात को देखते हुए सरकार को अब सब्सिडी बंद करने जैसे कठिन कदम उठाने पड़ सकते हैं। साथ ही, वित्तीय बोझ और कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्थाओं को देखते हुए यूनिफाइड पेंशन स्कीम पर भी गंभीर पुनर्विचार करना आवश्यक हो गया है।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि सरकार सभी पुरानी देनदारियों को रोक देती है, चल रही विकास परियोजनाओं को स्थगित कर देती है और सब्सिडी बंद कर देती है, तब भी आगामी वित्त वर्ष में सरकार को लगभग 6,000 करोड़ रुपए का वित्तीय घाटा झेलना पड़ेगा। यह आंकड़ा दर्शाता है कि हिमाचल प्रदेश वर्तमान में एक गहरे आर्थिक संकट में फंसा हुआ है। मौजूदा सरकार के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह इस आर्थिक भंवर से बाहर निकलने के लिए स्थायी और प्रभावी उपाय कर सके।
हिमाचल प्रदेश के आर्थिक हालात न केवल कर्मचारियों और पेंशनरों के लिए चिंता का विषय हैं, बल्कि प्रदेश के विकास कार्यों और कल्याणकारी योजनाओं के लिए भी गंभीर चुनौती पेश कर रहे हैं। वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और घाटे को कम करना वर्तमान सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बन गया है। प्रदेश के लिए यह समय निर्णायक है, जहां सही आर्थिक रणनीति और कड़ा वित्तीय प्रबंधन ही हिमाचल प्रदेश को स्थिर और मजबूत बना सकता है।
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