Author : Rajneesh Kapil Hamirpur
हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी अपनी विशिष्ट संस्कृति, परंपराओं और कठिन जीवनशैली के लिए पूरे प्रदेश में जाना जाता है। भारी बर्फबारी और कड़ाके की ठंड के बीच रविवार को पांगी घाटी में ऐतिहासिक खौउल उत्सव का विधिवत शुभारंभ हो गया। स्थानीय भाषा में इस उत्सव को “चजगी” भी कहा जाता है। माइनस तापमान और चारों ओर बर्फ की मोटी परत के बावजूद, इस त्योहार के शुरू होते ही पूरी घाटी में उत्सव और उमंग का माहौल बन गया है।
खौउल उत्सव पांगी घाटी की एक अत्यंत प्राचीन और आस्था से जुड़ी परंपरा है। स्थानीय बुजुर्गों और जानकारों के अनुसार, सर्दियों के लंबे और कठिन महीनों में घाटी में बुरी शक्तियों और नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। इन्हीं बुरी शक्तियों और राक्षसी प्रवृत्तियों को दूर भगाने के उद्देश्य से खौउल उत्सव मनाया जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक माना जाता है।
रविवार को घाटी की विभिन्न पंचायतों में विशेष पूजा-अर्चना के बाद लोगों ने अपने-अपने घरों से जलती हुई मशालें निकालीं। इन मशालों को लेकर लोग गांवों की गलियों, रास्तों और आसपास के क्षेत्रों में घूमे। मान्यता है कि आग की रोशनी और धुएं से बुरी आत्माएं और नकारात्मक शक्तियां क्षेत्र छोड़कर चली जाती हैं। इस दौरान लोगों ने अपने पूर्वजों को भी श्रद्धापूर्वक याद किया और परिवार व गांव की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की।
पांगी घाटी में खौउल उत्सव एक ही दिन पूरे क्षेत्र में नहीं मनाया जाता, बल्कि इसे अलग-अलग गांवों में अलग-अलग तिथियों पर मनाने की परंपरा है। इस उत्सव की शुरुआत सबसे पहले जम्मू सीमा से सटे पांगी के अंतिम गांव सुराल से होती है। इसके बाद धीरे-धीरे यह पर्व पूरी घाटी में फैलता है। सुराल, धरवास और लुज जैसे गांवों में खौउल उत्सव लगभग एक माह पहले ही मनाया जा चुका है। अब पांगी के मुख्यालय किलाड़, मिंधल, साच, कुमार, परमार, फिंडरू और कुलाल सहित अन्य गांवों में यह उत्सव धूमधाम से मनाया गया।
खौउल उत्सव के दौरान हर गांव में लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा पहनकर उत्सव में शामिल होते हैं। पारंपरिक लोकरीति, धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक आयोजन इस पर्व को और भी खास बनाते हैं। गांवों में आपसी मेल-जोल बढ़ता है और लंबे समय से बर्फ में बंद घाटी में एक नई ऊर्जा का संचार होता है।
साच पंच नाग देवता के चेला इंद्र सिंह ने बताया कि खौउल उत्सव के ठीक 15 दिन बाद पांगी घाटी का सबसे बड़ा और बहुप्रतीक्षित पर्व जुकारू उत्सव शुरू होता है। जुकारू पर्व का इंतजार पांगीवासी पूरे साल करते हैं। खौउल को जुकारू पर्व की तैयारी और शुभ संकेत के रूप में भी देखा जाता है।
खौउल उत्सव के अवसर पर घाटी में पारंपरिक दावतों का दौर भी शुरू हो गया है। हर घर में विशेष पारंपरिक व्यंजन बनाए जा रहे हैं। इनमें मंडे, हलवा, पूरी, चावल, कढ़ी और दाल प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन व्यंजनों के माध्यम से लोग आपसी प्रेम, भाईचारे और अतिथि सत्कार की परंपरा को निभाते हैं।
पांगी-भरमौर विधानसभा क्षेत्र के विधायक डॉ. जनक राज ने भी खौउल उत्सव के अवसर पर पांगी घाटी के लोगों को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से पांगीवासियों को इस पारंपरिक पर्व की बधाई देते हुए कहा कि खौउल उत्सव पांगी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और जनजातीय पहचान का प्रतीक है। उन्होंने क्षेत्र के लोगों के सुख, शांति और समृद्धि की कामना की।
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