Post by : Himachal Bureau
घुमारवीं उपमंडल के बरोटा गांव के रहने वाले लग्नेश कुमार ने अपनी मेहनत और हौसले से इतिहास रच दिया है। शारीरिक चुनौती और कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी कर हिमाचल प्रदेश के पहले नेत्रहीन अधिवक्ता बनने का गौरव हासिल किया है। वर्तमान में वह घुमारवीं सिविल कोर्ट में वकालत कर रहे हैं और समाज के लिए प्रेरणा बनकर उभरे हैं।
लग्नेश की जिंदगी में वर्ष 2009 में बड़ा बदलाव आया, जब आंखों में हुए सामान्य संक्रमण ने धीरे-धीरे उनकी रोशनी छीन ली। बेहतर इलाज के लिए बड़े अस्पतालों में भी उपचार करवाया गया, लेकिन 33 वर्षीय लग्नेश पूरी तरह दृष्टिहीन हो गए। इस कठिन दौर में उनके पिता का निधन हो गया, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर हो गई। उनकी माता आंगनबाड़ी हेल्पर के रूप में काम कर परिवार का पालन-पोषण करती रहीं और बेटे के सपनों को टूटने नहीं दिया।
लग्नेश ने वर्ष 2016 में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद कानून की पढ़ाई करने का फैसला लिया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए केके फाउंडेशन ने उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान की, जिससे वह अपनी पढ़ाई जारी रख सके।
उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर से वर्ष 2020 में एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। लग्नेश की मेहनत और संघर्ष ने समाज के साथ-साथ संस्थानों को भी प्रेरित किया। उनके मामले को देखते हुए बार काउंसिल ऑफ हिमाचल प्रदेश को अपने नियमों में बदलाव करना पड़ा।
बार काउंसिल ने न केवल लग्नेश का पंजीकरण किया, बल्कि भविष्य में दिव्यांग अधिवक्ताओं के लिए नई नीति भी बनाई। इस नीति के तहत किसी भी दिव्यांग वकील से पंजीकरण शुल्क नहीं लिया जाएगा। यह निर्णय दिव्यांग व्यक्तियों के लिए कानून के क्षेत्र में आगे बढ़ने का रास्ता आसान बनाने वाला माना जा रहा है।
लग्नेश की सफलता इस बात का उदाहरण है कि मजबूत इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के बल पर किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है। उनकी कहानी आज युवाओं और समाज के लिए प्रेरणा बन चुकी है और यह संदेश देती है कि सफलता हौसलों से हासिल होती है, सीमाओं से नहीं।
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