Post by : Himachal Bureau
हिमाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही ग्लेशियर झीलें भविष्य में बड़ी प्राकृतिक आपदा का कारण बन सकती हैं। प्रदेश की कई ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील माना जा रहा है और इनके आकार तथा पानी की मात्रा में हो रही बढ़ोतरी ने वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।
इन झीलों के प्राकृतिक बांध टूटने या पानी का दबाव अचानक बढ़ने की स्थिति में ग्लेशियर झील फटने से तेज बाढ़ आ सकती है। ऐसी स्थिति में ब्यास, सतलुज और इनकी सहायक नदियों के किनारे बसे इलाकों को गंभीर नुकसान होने की आशंका रहती है।
आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग से जुड़े शोधकर्ताओं ने हिमालयी क्षेत्र की ग्लेशियर झीलों के आकार और उनमें जमा पानी में हो रहे बदलावों का अध्ययन किया है।
अध्ययन में हिमाचल प्रदेश की 48 ग्लेशियर झीलों को संभावित खतरे के लिहाज से महत्वपूर्ण माना गया है। वैज्ञानिक कई वर्षों से सैटेलाइट डेटा और अन्य तकनीकी माध्यमों की मदद से इन झीलों में हो रहे बदलावों का विश्लेषण कर रहे हैं।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में करीब 2000 ग्लेशियर झीलों का अध्ययन किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
ग्लेशियर के पिघलने के कारण पहाड़ों के ऊपरी हिस्सों में बड़ी मात्रा में पानी जमा होकर झील का रूप ले लेता है। इनमें से कई झीलें पत्थर, मिट्टी और बर्फ से बने प्राकृतिक मोरेन बांधों के पीछे स्थित होती हैं।
अगर भूकंप, भारी बारिश, चट्टान गिरने, हिमस्खलन या तेजी से बर्फ पिघलने के कारण यह प्राकृतिक बांध टूट जाता है, तो लाखों घन मीटर पानी अचानक निचली घाटियों की ओर बह सकता है।
ऐसी स्थिति में पानी के साथ बड़ी मात्रा में मिट्टी, पत्थर और मलबा भी नीचे आ सकता है, जिससे नुकसान की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।
लाहौल-स्पीति जिले की घेपन झील को सबसे संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में शामिल किया गया है। यह झील सिस्सू के ऊपर चंद्रा बेसिन क्षेत्र में स्थित है।
अध्ययन के अनुसार पिछले करीब 33 वर्षों में इसके आकार में लगभग 178 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका क्षेत्रफल करीब 1.07 से 1.21 वर्ग किलोमीटर बताया गया है।
झील में लगभग 24.1 से 35 मिलियन घन मीटर तक पानी जमा होने का अनुमान है, जबकि इसकी अधिकतम गहराई करीब 46 मीटर बताई गई है।
घेपन झील से बड़े स्तर पर पानी निकलने की स्थिति में सिस्सू और लाहौल घाटी के निचले क्षेत्रों पर असर पड़ सकता है।
इसके अलावा मनाली-लेह हाईवे और क्षेत्र की अन्य महत्वपूर्ण आधारभूत संरचनाएं भी संवेदनशील हो सकती हैं। इसलिए इस झील की लगातार निगरानी को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
लाहौल-स्पीति के चंद्रा बेसिन में स्थित समुद्रा टापू ग्लेशियर झील भी चिंता का कारण बनी हुई है।
इस झील का क्षेत्रफल करीब 1.63 वर्ग किलोमीटर बताया गया है और इसमें लगभग 24.7 मिलियन घन मीटर पानी जमा होने का अनुमान है।
इसकी गहराई करीब 59 मीटर तक हो सकती है। झील से अचानक पानी निकलने की स्थिति में चंद्रा घाटी के निचले क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।
किन्नौर और लाहौल क्षेत्र से जुड़ी पारछू झील भी संवेदनशील झीलों में शामिल है। इसका क्षेत्रफल दस हेक्टेयर से अधिक बताया गया है।
ऊंचाई वाले हिमालयी इलाकों में लगातार बदलते मौसम और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण ऐसी झीलों के आकार और पानी की मात्रा में बदलाव दर्ज किया जा रहा है।
इसी वजह से इन क्षेत्रों में नियमित निगरानी और जोखिम का आकलन जरूरी माना जा रहा है।
कुल्लू जिले के पार्वती बेसिन में स्थित वासुकी ग्लेशियर झील को भी संवेदनशील माना गया है।
यह झील करीब 13.4 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है और इसमें लगभग 2.16 मिलियन घन मीटर पानी जमा होने का अनुमान है।
अगर इस झील से अचानक बड़ी मात्रा में पानी निकलता है, तो पार्वती और मणिकर्ण घाटी के निचले इलाकों पर प्रभाव पड़ सकता है।
किन्नौर की सांगला घाटी में स्थित सांगला-बास्पा ग्लेशियर झील करीब 14 से 19 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली बताई गई है।
इसमें लगभग 1.5 मिलियन घन मीटर पानी जमा होने का अनुमान है।
झील में किसी बड़े बदलाव या प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में बास्पा नदी का जलस्तर अचानक बढ़ सकता है। इससे आसपास की बस्तियां, सड़कें और जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
हिम्सू और कलका ग्लेशियर झीलों को भी संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है। ये झीलें ब्यास और सतलुज नदी बेसिन से जुड़े क्षेत्रों में स्थित हैं।
इनका आकार अलग-अलग है और वैज्ञानिक इनके क्षेत्रफल, पानी की मात्रा तथा आसपास के भूगर्भीय बदलावों का अध्ययन कर रहे हैं।
ग्लेशियर झील फटने की स्थिति में बड़ी मात्रा में पानी अचानक नदी में पहुंच सकता है। इससे ब्यास और सतलुज जैसी नदियों में पानी का बहाव बहुत तेजी से बढ़ सकता है।
ऐसी बाढ़ सामान्य बाढ़ से ज्यादा खतरनाक हो सकती है, क्योंकि इसके साथ भारी मात्रा में पत्थर, मिट्टी और मलबा भी आता है।
इससे नदी किनारे बसे गांव, सड़कें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और अन्य आधारभूत ढांचे प्रभावित हो सकते हैं।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कई संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की पहचान की गई है।
इनमें बड़ी संख्या ऐसी झीलों की है, जिन्हें उच्च या बहुत उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।
हिमाचल प्रदेश में घेपन, सिस्सू, पारछू और सांगला क्षेत्र की झीलों को लेकर विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत बताई गई है।
ग्लेशियर झील के प्राकृतिक बांध टूटने के कई कारण हो सकते हैं। इनमें भूकंप, चट्टानों का गिरना, हिमस्खलन, आइस कोर का पिघलना और पानी का लगातार बढ़ता दबाव शामिल हैं।
कई बार तेज बारिश या अचानक तापमान बढ़ने से भी झील में पानी की मात्रा तेजी से बढ़ सकती है।
अगर प्राकृतिक बांध इस दबाव को सहन नहीं कर पाता, तो पानी अचानक नीचे की ओर बहने लगता है।
ग्लेशियर झील फटने की स्थिति में केवल नदी किनारे की बस्तियां ही नहीं, बल्कि सड़कें, पुल और जलविद्युत परियोजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
बास्पा, पंडोह, कोलडैम और अन्य नदी घाटी क्षेत्रों में मौजूद परियोजनाओं के लिए ऐसी घटनाएं गंभीर चुनौती बन सकती हैं।
इसी कारण वैज्ञानिक संभावित बाढ़ मार्गों की मैपिंग और पहले से चेतावनी देने वाली प्रणाली विकसित करने पर जोर दे रहे हैं।
आईआईटी मंडी के वैज्ञानिक हिमालयी क्षेत्र की करीब 2000 ग्लेशियर झीलों के आकार और उनमें जमा पानी की मात्रा का अध्ययन कर रहे हैं।
पुराने और नए सैटेलाइट डेटा की तुलना कर यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि किन झीलों का आकार सबसे तेजी से बढ़ रहा है।
इस अध्ययन का उद्देश्य भविष्य में संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान करना और समय रहते सुरक्षा उपायों को मजबूत करना है।
आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग से जुड़े प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला के अनुसार ग्लेशियर झीलों के आकार में बदलाव दर्ज किया जा रहा है।
टीम इनके क्षेत्रफल और पानी की मात्रा का विश्लेषण कर रही है और इस विषय पर विस्तृत शोध पत्र प्रकाशित करने की तैयारी है।
ग्लेशियर झील फटने से कुछ ही समय में बड़ी मात्रा में पानी पहाड़ों से नीचे की ओर आ सकता है।
तेज पानी अपने साथ मिट्टी, चट्टानें, पेड़ और अन्य मलबा लेकर आता है। इससे निचले क्षेत्रों में अचानक बाढ़ की स्थिति बन सकती है।
इसी वजह से ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में समय पर निगरानी, चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन की तैयारी बेहद जरूरी मानी जाती है।
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