Author : Rajneesh Kapil Hamirpur
हिमाचल प्रदेश की वीरभूमि हमीरपुर के लिए 1 सितंबर का दिन बेहद खास है। 1 सितंबर 1972 को तत्कालीन कांगड़ा जिले का पुनर्गठन हुआ और हमीरपुर को स्वतंत्र जिला बनाया गया। इसी प्रशासनिक पुनर्गठन के दौरान ऊना को भी अलग जिला बनाया गया था। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद हमीरपुर ने एक स्वतंत्र प्रशासनिक इकाई के रूप में अपनी नई पहचान बनाई। आज का Hamirpur District केवल प्रशासनिक सीमाओं से पहचाना जाने वाला जिला नहीं है। इसकी पहचान सदियों पुराने इतिहास, राजवंशों, धार्मिक आस्था, संस्कृति, शिक्षा और सैनिक परंपराओं से जुड़ी हुई है।
हमीरपुर के इतिहास की जड़ें प्रसिद्ध Katoch Dynasty से जुड़ी हैं। माना जाता है कि राजा हमीर चंद ने लगभग 1700 से 1740 ईस्वी के बीच इस क्षेत्र पर शासन किया था। उन्हीं के नाम से इस क्षेत्र का नाम हमीरपुर पड़ा। राजा हमीर चंद द्वारा यहां किले का निर्माण करवाए जाने का भी इतिहास में उल्लेख मिलता है। प्राचीन समय में यह क्षेत्र जालंधर-त्रिगर्त का हिस्सा माना जाता था। त्रिगर्त की परंपरा को योद्धाओं और वीरता से जोड़कर देखा जाता है। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आगे चलकर हमीरपुर की वीर पहचान का आधार बनी।
हमीरपुर की धरती महान कटोच शासक राजा संसार चंद के शासनकाल से भी जुड़ी रही है। संसार चंद ने सुजानपुर टीहरा को अपनी राजधानी बनाया था। सुजानपुर के किले, महल और अन्य ऐतिहासिक अवशेष आज भी उस दौर की समृद्ध विरासत की कहानी बताते हैं। इसके बाद हमीरपुर क्षेत्र ने सिख और ब्रिटिश शासन का दौर भी देखा। 1846 के प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के बाद यह इलाका ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया और हमीरपुर कांगड़ा जिले का हिस्सा बना रहा।
ब्रिटिश काल में प्रशासनिक व्यवस्था के तहत 1846 के बाद नादौन को तहसील मुख्यालय बनाया गया। बाद में वर्ष 1868 में तहसील मुख्यालय को नादौन से स्थानांतरित करके हमीरपुर कर दिया गया। इससे क्षेत्र का प्रशासनिक महत्व लगातार बढ़ता गया।
आजादी के बाद भी हमीरपुर कांगड़ा जिले का हिस्सा था। वर्ष 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के दौरान कांगड़ा समेत कई पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में शामिल हुए। इसके बाद प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और लोगों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से जिलों का पुनर्गठन किया गया। आखिरकार 1 सितंबर 1972 को वह ऐतिहासिक दिन आया, जब कांगड़ा जिले का पुनर्गठन करके हमीरपुर को स्वतंत्र जिला बनाया गया। शुरुआत में नए जिले में हमीरपुर और बड़सर दो तहसीलें शामिल थीं। समय के साथ प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार तहसीलों और उप-तहसीलों की संख्या बढ़ती गई।
Veerbhumi Hamirpur के नाम से प्रसिद्ध इस जिले की सबसे मजबूत पहचान इसकी सैनिक परंपरा है। जिले के बड़ी संख्या में परिवारों का भारतीय सेना और सुरक्षा बलों से जुड़ाव रहा है। देश की रक्षा में हमीरपुर के वीरों का योगदान इस जिले के गौरव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी हमीरपुर ने अपनी अलग पहचान बनाई है। साक्षरता और शिक्षा के मामले में यह जिला हिमाचल प्रदेश के अग्रणी जिलों में शामिल रहा है।
हमीरपुर की पहचान केवल सैनिक परंपरा तक सीमित नहीं है। सुजानपुर की ऐतिहासिक धरोहर, नादौन का पुराना इतिहास, बाबा बालक नाथ से जुड़ी धार्मिक आस्था और ग्रामीण क्षेत्रों की लोक संस्कृति जिले की विरासत को समृद्ध बनाती है। आज Hamirpur HP आधुनिक विकास के साथ अपनी ऐतिहासिक जड़ों को भी संभालकर आगे बढ़ रहा है। व्यापार, शिक्षा, पर्यटन और स्थानीय गतिविधियों में व्यापार मंडल हमीरपुर समेत विभिन्न सामाजिक एवं व्यावसायिक संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
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1 सितंबर 1972 को जिला बनने के बाद हमीरपुर ने प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक विकास की लंबी यात्रा तय की है। वर्ष 2026 में जिला अपने 54वें स्थापना दिवस के अवसर पर उस ऐतिहासिक सफर को याद कर रहा है। हमीरपुर की कहानी सिर्फ एक जिले के गठन की कहानी नहीं है। यह प्राचीन त्रिगर्त परंपरा, कटोच राजवंश, वीर सैनिकों, धार्मिक आस्था, शिक्षा और आधुनिक विकास के बीच निरंतर आगे बढ़ती एक ऐसी यात्रा है, जिसने हिमाचल प्रदेश के नक्शे पर हमीरपुर को अलग पहचान दिलाई है।
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