Post by : Shivani Kumari
हिमाचल प्रदेश के दूरदराज इलाकों में सड़क की कमी आज भी लोगों की जान पर बन आई है। आजादी के 78 साल बीत जाने के बाद भी उपतहसील तेलका के अंतर्गत आने वाले कई गांव आज भी सड़क जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। ऐसी ही एक घटना ने पूरे क्षेत्र को हिला कर रख दिया जब एक बीमार व्यक्ति को पालकी पर ले जाते समय आधे रास्ते में ही उसकी मौत हो गई और परिजनों को शव लेकर वापस लौटना पड़ा। यह दर्दनाक हादसा न केवल प्रशासन की लापरवाही को उजागर करता है बल्कि ग्रामीणों की उस पीड़ा को भी सामने लाता है जो सालों से सड़क के लिए तरस रहे हैं।
घटना की शुरुआत उस समय हुई जब तेलका क्षेत्र के एक गांव में रहने वाले व्यक्ति को अचानक गंभीर बीमारी हो गई। परिवार वालों ने तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाने का फैसला किया लेकिन गांव से मुख्य सड़क तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं था। मजबूरन ग्रामीणों ने पुरानी परंपरा को अपनाते हुए लकड़ी की पालकी बनाई और बीमार व्यक्ति को उस पर लिटाकर कंधों पर उठाया। रास्ता दुर्गम था, जंगल, पहाड़ और खड्डों से भरा हुआ। कई किलोमीटर तक पैदल चलना था और हर कदम पर जान का खतरा था।
ग्रामीणों ने बताया कि व्यक्ति को तेज बुखार था और सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। शुरू में लगा कि यदि जल्दी अस्पताल पहुंच जाए तो शायद जान बच जाए। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, हालत बिगड़ती गई। आधे रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था। जो लोग उम्मीद लेकर चल रहे थे, अब उन्हें शव लेकर वापस लौटना पड़ रहा था। यह दृश्य देखकर हर कोई सन्न रह गया। किसी ने सोचा भी नहीं था कि सड़क न होने की वजह से ऐसा हादसा हो जाएगा।
यह कोई पहली घटना नहीं है। तेलका क्षेत्र के कई गांवों जैसे भजोत्रा, आज्ज और आसपास के इलाकों में सालों से सड़क की मांग की जा रही है। ग्रामीण बार-बार प्रशासन से गुहार लगा चुके हैं लेकिन हर बार आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता। लोक निर्माण विभाग के अधिकारी मौके पर आते हैं, फाइलें बनती हैं, सर्वे होता है लेकिन काम शुरू नहीं होता। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता वादे करते हैं लेकिन जीतने के बाद भूल जाते हैं।
स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों ने भी इस मामले में अपनी आवाज बुलंद की है। उन्होंने बताया कि कई बार प्रस्ताव पास किए गए, बजट की मांग की गई लेकिन हर बार कोई न कोई बहाना बना दिया जाता है। कभी फंड की कमी, कभी जमीन का विवाद, कभी तकनीकी अड़चन। लेकिन असल में कोई गंभीरता नहीं दिखाई जाती। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द सड़क नहीं बनी तो वे आंदोलन करने पर मजबूर होंगे।
इस घटना के बाद पूरे इलाके में आक्रोश है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कब तक उन्हें इस तरह की जिंदगी जीनी पड़ेगी। क्या सड़क एक लग्जरी है या मूल अधिकार। क्या किसी की जान जाने के बाद ही प्रशासन जागेगा। कई लोग तो यह भी कह रहे हैं कि यदि एंबुलेंस या हेलीकॉप्टर की सुविधा होती तो शायद जान बच जाती। लेकिन पहाड़ी इलाकों में यह सुविधाएं भी सीमित हैं और बिना सड़क के पहुंचना नामुमकिन है।
इस घटना के बाद पूरे इलाके में आक्रोश है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर कब तक उन्हें इस तरह की जिंदगी जीनी पड़ेगी। क्या सड़क एक लग्जरी है या मूल अधिकार। क्या किसी की जान जाने के बाद ही प्रशासन जागेगा। कई लोग तो यह भी कह रहे हैं कि यदि एंबुलेंस या हेलीकॉप्टर की सुविधा होती तो शायद जान बच जाती। लेकिन पहाड़ी इलाकों में यह सुविधाएं भी सीमित हैं और बिना सड़क के पहुंचना नामुमकिन है।
यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत की कहानी नहीं है बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी का प्रतीक है। हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में सड़कें जीवन रेखा होती हैं। बिना सड़क के न शिक्षा, न स्वास्थ्य, न व्यापार कुछ संभव है। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते, मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, किसान अपनी उपज बाजार नहीं ले जा पाते। यह चक्र सालों से चल रहा है और हर बार कोई न कोई जान चली जाती है।
ग्रामीणों ने एकजुट होकर फैसला किया है कि अब वे चुप नहीं बैठेंगे। वे धरना, प्रदर्शन, रास्ता रोको आंदोलन whatever it takes करेंगे। उनका कहना है कि यदि सरकार उनकी बात नहीं सुन रही तो उन्हें सड़क पर उतरना पड़ेगा। कुछ युवाओं ने सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया है। हैशटैग के साथ फोटो और वीडियो वायरल हो रहे हैं जिसमें पालकी पर शव ले जाते लोग दिख रहे हैं। यह दृश्य दिल दहला देने वाला है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण चुनौतीपूर्ण जरूर है लेकिन नामुमकिन नहीं। कई जगहों पर सफल मॉडल हैं जहां कठिन परिस्थितियों में भी सड़कें बनाई गई हैं। जरूरत है इच्छाशक्ति की और प्राथमिकता देने की। यदि बजट का सही उपयोग हो, भ्रष्टाचार पर लगाम लगे और लोकल लोगों को शामिल किया जाए तो काम तेजी से हो सकता है।
इस घटना ने एक बार फिर सवाल उठाया है कि विकास की रफ्तार शहरों तक सीमित क्यों है। गांवों को क्यों भुला दिया जाता है। क्या वोट केवल चुनाव के समय याद आते हैं। ग्रामीणों की यह पीड़ा लंबे समय से चली आ रही है और अब विस्फोटक स्थिति बनती जा रही है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो ऐसे हादसे बढ़ते जाएंगे और हर बार कोई न कोई परिवार अपनी जान गंवाएगा।
आखिर में यही कहा जा सकता है कि सड़क केवल पत्थर और सीमेंट का ढांचा नहीं होती, यह जीवन का माध्यम होती है। हिमाचल के इन गांवों को सड़क की जरूरत है, तुरंत और बिना किसी बहाने के। प्रशासन को चाहिए कि वह इस दर्द को समझे और ठोस कदम उठाए। क्योंकि अगली पालकी किसी और की हो सकती है और तब शायद देर हो जाए।
यह कहानी दर्द, संघर्ष और उम्मीद की है। दर्द उन परिवारों का जो अपने प्रियजन को खो चुके हैं, संघर्ष उन ग्रामीणों का जो सालों से लड़ रहे हैं और उम्मीद यह कि शायद इस बार उनकी आवाज सुनी जाए। लेकिन सवाल वही है, कब तक। कब तक इंतजार करना पड़ेगा। कब तक जानें जाती रहेंगी। जवाब किसी के पास नहीं है लेकिन जरूरत है कार्रवाई की, तुरंत कार्रवाई की।
ग्रामीणों का गुस्सा जायज है। वे टैक्स देते हैं, वोट देते हैं, देश की सेवा करते हैं लेकिन बदले में उन्हें क्या मिलता है। पालकी, शव और आंसू। यह तस्वीर बदलनी चाहिए। बदलनी बहुत जरूरी है। और इसके लिए जिम्मेदार हैं हम सब, प्रशासन, सरकार, समाज। क्योंकि चुप्पी भी एक अपराध है जब कोई मर रहा हो।
आज यह घटना सुर्खियों में है, कल शायद भुला दी जाए लेकिन पीड़ित परिवार के लिए यह जख्म जिंदगी भर रहेगा। उनकी आंखों में वह दृश्य हमेशा रहेगा जब वे शव लेकर लौट रहे थे। आधा रास्ता, आधी उम्मीद, पूरी मौत। यह कहानी खत्म नहीं होनी चाहिए, यह शुरुआत होनी चाहिए। सड़क की, बदलाव की, इंसाफ की।
हिमाचल की वादियों में अभी भी कई गांव अंधेरे में हैं, सड़क के अंधेरे में। प्रकाश की किरण चाहिए, विकास की किरण। और वह किरण प्रशासन के हाथ में है। बस इच्छाशक्ति चाहिए, संवेदनशीलता चाहिए। क्योंकि इंसान की जान से कीमती कुछ नहीं होता। और सड़क वह पुल है जो जीवन और मृत्यु के बीच खड़ा होता है। इसे मजबूत करना होगा, इसे बनाना होगा। अब और देरी नहीं।
यह लेख उन सभी ग्रामीणों को समर्पित है जो सड़क के लिए लड़ रहे हैं, जो अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों की जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी हिम्मत को सलाम। और प्रशासन से अपील, सुन लो उनकी पुकार, बनाओ सड़क, बचाओ जान। क्योंकि कल देर हो सकती है। बहुत देर।
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