Post by : Shivani Kumari
शिमला, 4 अक्टूबर 2025: हिमाचल प्रदेश के किसानों के लिए 2025 का मौसम चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है। राज्य में बदलते जलवायु पैटर्न और असामान्य मौसम ने कृषि और बागवानी दोनों क्षेत्रों को गहरा प्रभावित किया है, जिससे उत्पादन में कमी, आर्थिक नुकसान और फसल चक्र में बदलाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
राज्य की प्रमुख आर्थिक फसल सेब पर मौसमी बदलाव का गंभीर असर पड़ा है। 2025 के मानसून में उच्च वर्षा और नमी के कारण कुछ बागों में रहस्यमय फंगल संक्रमण ने 35-40% सेब के पेड़ों को प्रभावित किया। वहीं, भारी वर्षा, ओलावृष्टि और पत्ती झड़ने की बीमारी के चलते कुल सेब उत्पादन में लगभग 11.48% की गिरावट दर्ज की गई और 20-30% फसल नष्ट हो गई।
बढ़ते तापमान और कम ठंड के घंटों के कारण सेब की खेती अब अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थानांतरित हो रही है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रवृत्ति से पारंपरिक बागवानी क्षेत्रों में भविष्य में उत्पादन और रोजगार पर असर पड़ सकता है।
हिमाचल प्रदेश की अन्य फसलों को भी मौसम परिवर्तन से नुकसान हुआ है। टमाटर, राजमा और अनाज फसलें जैसे मक्का, धान, रागी, बाजरा भारी बारिश और अनियमित वर्षा से प्रभावित हुई हैं। खरीफ दालों और व्यावसायिक फसलों जैसे अदरक, आलू, तिलहन पर भी नकारात्मक असर पड़ा।
रबी फसलों में भी 2024-2025 की सर्दियों में लंबे समय तक सूखे और वर्षा की कमी (लगभग 75%) से पत्तागोभी, फूलगोभी, मटर, प्याज, लहसुन और अन्य जड़ वाली सब्जियों की पैदावार प्रभावित हुई।
किसानों को 2025 के मानसून सीज़न में कुल मिलाकर ₹5,000 करोड़ से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ। फसल नष्ट होने और उत्पादन लागत के बावजूद किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। भूस्खलन और सड़क अवरोध के कारण कई बार किसानों को अपनी उपज को बाजार तक पहुंचाने में कठिनाई हुई, जिससे उन्हें मजबूरन फसल फेंकनी पड़ी।
मंडी जिला सबसे अधिक संवेदनशील पाया गया, जबकि कुल्लू जिले के किसान परिवार जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिए सबसे अधिक भेद्य हैं। सरकार ने सितंबर और अक्टूबर 2025 में ₹1,500 करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की थी, लेकिन कई किसानों तक यह राहत अभी तक नहीं पहुंची।
असामान्य मौसम ने फसल पैटर्न में बदलाव को मजबूर किया है। किसान पारंपरिक फसलों से हटकर अधिक जलवायु-लचीली और लाभकारी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। अनार, कीवी, परसिमन, कटहल, लीची और चेरी जैसी फसलें अब लोकप्रिय हो रही हैं।
मौसमी बदलावों के कारण अंकुरण, फूल आने और फसल चक्र में अनियमितता देखी जा रही है। अनियमित वर्षा और गर्म सर्दियों ने पारंपरिक कृषि योजनाओं और विकासात्मक चरणों को प्रभावित किया है।
कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सुझाव दिया है कि वे फसल विविधीकरण और जलवायु-लचीली किस्मों का चुनाव करें। वर्षा जल संचयन, कुशल सिंचाई तकनीक, मिट्टी संरक्षण, रोग और कीट प्रबंधन, उच्च नमी प्रबंधन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली का लाभ उठाएं।
किसान भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और राज्य कृषि विभाग की सलाह का पालन कर सकते हैं। साथ ही, हिमाचल प्रदेश सरकार की जलवायु परिवर्तन कार्य योजना, जैविक खेती और फसल बीमा योजनाओं का भी लाभ उठाना चाहिए।
जलवायु परिवर्तन के चलते हिमाचल प्रदेश में लंबी अवधि की चुनौतियां उत्पन्न हो रही हैं। घटती बर्फबारी और सूखते जल स्रोत सिंचाई संकट पैदा कर रहे हैं। लगातार भारी वर्षा, भूस्खलन और ओलावृष्टि जैसी चरम मौसमी घटनाएं आपूर्ति श्रृंखला और बुनियादी ढांचे पर दबाव डाल रही हैं। हिमनदों पर प्रभाव भविष्य में जल संकट की संभावना को और बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल रणनीतियां और सरकारी सहयोग सुनिश्चित नहीं किया गया, तो हिमाचल प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था और किसान परिवारों की आजीविका पर गंभीर और दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।
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