Post by : Shivani Kumari
हिमाचल प्रदेश, जिसे प्यार से “देवभूमि” कहा जाता है, केवल बर्फ से ढकी पहाड़ियों और घने जंगलों की धरती नहीं है — यह मेहनती किसानों की भूमि भी है।
यहाँ खेती पहाड़ों जितनी कठिन जरूर है, लेकिन उतनी ही सुंदर भी।
कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद हिमाचल के किसानों ने सदियों से प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीवन यापन करना सीखा है।
हिमाचल की खेती को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यहाँ का हर खेत, हर पौधा और हर बीज प्रकृति के मिजाज से जुड़ा होता है।
यहाँ बारिश और धूप दोनों जीवन का हिस्सा हैं — और किसान इन दोनों के साथ तालमेल बैठाना जानते हैं।
पहाड़ी इलाकों में सपाट जमीन नहीं होती। इसलिए किसान ढलानों को काटकर सीढ़ीनुमा खेत (Terraced Fields) बनाते हैं।
यह केवल खेती की तकनीक नहीं, बल्कि सदियों की समझदारी का उदाहरण है।
इससे मिट्टी का कटाव रुकता है और हर इंच जमीन खेती योग्य बन जाती है।
हिमाचल की पारंपरिक कूल प्रणाली (छोटी जलधाराएँ) दुनिया की सबसे पुरानी जल प्रबंधन प्रणालियों में से एक है।
पहाड़ों से पिघलता हुआ हिमजल इन नालों के माध्यम से खेतों तक पहुँचाया जाता है।
आज भी यह प्रणाली कांगड़ा, मंडी जैसे इलाकों में जीवित है — यह बताती है कि हिमाचल के किसान प्रकृति के सच्चे इंजीनियर हैं।
हिमाचल की खेती एकरूप नहीं है —
हर ज़िले की ऊँचाई, मिट्टी और मौसम के अनुसार फसलें बदल जाती हैं।
यहाँ मौसम गर्म रहता है, इसलिए इन फसलों की खेती होती है:
धान, गेहूँ, मक्का
सरसों, मूँगफली, तिल
फल: नींबू, अमरूद, आम
सब्ज़ियाँ: पत्तागोभी, भिंडी, टमाटर
यहाँ मौसम मध्यम रहता है।
आलू, मटर, टमाटर
राजमा, गाजर, पालक
फल: आड़ू, नाशपाती, खुबानी
यहाँ लंबे और ठंडे सर्दी के मौसम में मुख्यतः ये फसलें उगाई जाती हैं:
जौ, कोदा (मंडुआ), जई
फल: सेब, चेरी, कीवी, आलूबुखारा, अखरोट
यहाँ बागवानी (Horticulture) खेती से अधिक प्रचलित है।
आज हिमाचल को “एप्पल स्टेट” कहा जाता है।
सन 1950 में अमेरिकी किसान सैमुअल इवान स्टोक्स (सत्यनंद स्टोक्स) ने शिमला के कोटगढ़ में पहली बार सेब की खेती शुरू की।
उनका यह प्रयोग धीरे-धीरे एक क्रांति बन गया।
आज हजारों किसान सेब की खेती से आत्मनिर्भर हैं।
मुख्य उत्पादन क्षेत्र: शिमला, किन्नौर, कुल्लू, चंबा
प्रमुख किस्में: रॉयल डिलीशियस, रेड चीफ, गोल्डन एप्पल
सरकार की “मिशन हॉर्टिकल्चर योजना” ने नई पीढ़ी को भी खेती की ओर प्रेरित किया है।
अब सेब केवल फल नहीं, बल्कि हिमाचल की आर्थिक रीढ़ बन चुका है।
पहले हिमाचल की खेती पूरी तरह पारंपरिक थी —
लकड़ी के हल, बैलों की जोड़ी और बारिश पर निर्भरता।
लेकिन अब खेती धीरे-धीरे आधुनिक और स्मार्ट बन रही है।
ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई – कम पानी में अधिक उत्पादन
पॉलीहाउस खेती – हर मौसम में सब्ज़ियों की खेती
जैविक खेती (ऑर्गेनिक फार्मिंग) – रासायनिक रहित और निर्यात योग्य उत्पाद
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) – किसानों को नई तकनीक और प्रशिक्षण
इन पहलों ने हिमाचल के किसानों को परंपरागत से तकनीकी रूप से सक्षम किसान बना दिया है।
हिमाचल की कृषि पद्धतियाँ पर्यावरण-अनुकूल हैं।
यहाँ जैविक खेती, मिट्टी संरक्षण और वृक्षारोपण खेती का अभिन्न हिस्सा हैं।
किसान जानते हैं कि उनका जीवन जल, मिट्टी और वायु पर निर्भर है,
इसलिए वे जंगलों और प्रकृति की रक्षा को अपना कर्तव्य मानते हैं।
इसलिए कहा जा सकता है —
“हिमाचल में खेती केवल फसल नहीं, बल्कि धरती माता के प्रति सम्मान की परंपरा है।”
भूस्खलन और जलवायु परिवर्तन से नुकसान
छोटे खेतों में सीमित उत्पादन
बाज़ार तक पहुँच और उचित मूल्य की कमी
फलों में कीट और रोगों की बढ़ती समस्या
युवाओं का खेती से दूर होना
फिर भी हिमाचल का किसान हार नहीं मानता —
वह हर बार पहाड़ों की तरह अडिग खड़ा रहता है।
हिमाचल सरकार अब कृषि को तकनीक, पर्यटन और ऑर्गेनिक बाजार से जोड़ रही है।
नई योजनाएँ जैसे:
“हिमधरा ऑर्गेनिक मिशन”
“डिजिटल किसान कार्ड”
“हिमाचल एग्री-टेक पार्क्स”
महिला किसान आत्मनिर्भरता योजना
इनसे हिमाचल की खेती आने वाले वर्षों में और भी हरित (Green) और वैश्विक (Global) बन जाएगी।
हिमाचल की खेती केवल मिट्टी में बीज बोने की कहानी नहीं,
बल्कि यह जीवन, धैर्य और प्रकृति पर विश्वास की कहानी है।
यहाँ का किसान अपनी भूमि से उतना ही प्रेम करता है जितना अपने देवताओं से।
चाहे बर्फ गिरे या सूखा पड़े, वह जानता है —
पहाड़ों की तरह अडिग रहना ही उसकी असली ताकत है।
यह लेख जन जागरूकता के लिए है। दी गई जानकारी कृषि विभाग और स्थानीय स्रोतों पर आधारित है। किसी सुधार या सुझाव के लिए कृपया जन हिमाचल टीम से संपर्क करें।
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