Author : Rajneesh Kapil Hamirpur
हमीरपुर जिले के सुजानपुर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत कुठेड़ा के डलवाना गुज़रा गांव में स्थित वर्षों पुराना प्राथमिक विद्यालय आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष करता नजर आ रहा है। एक समय ऐसा था जब इस स्कूल में बच्चों की चहल-पहल, पढ़ाई की आवाजें और सुबह की प्रार्थना पूरे गांव का माहौल बदल देती थीं। आसपास के कई गांवों के बच्चे यहां शिक्षा प्राप्त करने आते थे और यह विद्यालय पूरे क्षेत्र का प्रमुख शिक्षा केंद्र माना जाता था। लेकिन समय के साथ छात्र संख्या कम होती गई और अंततः विद्यालय को बंद कर दिया गया। इसके बाद यह भवन सरकारी उपेक्षा का शिकार बन गया। आज सरकारी स्कूल की यह इमारत धीरे-धीरे खंडहर बनने की ओर बढ़ रही है और इसकी हालत देखकर ग्रामीणों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
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आखिर स्कूल की हालत इतनी खराब कैसे हो गई?
विद्यालय बंद होने के बाद इसकी नियमित देखभाल पूरी तरह बंद हो गई। धीरे-धीरे भवन के चारों ओर घास, झाड़ियां और छोटे-बड़े पेड़ उग आए। स्कूल का मैदान, प्रांगण और आसपास का पूरा परिसर वीरान दिखाई देता है। भवन की दीवारों में जगह-जगह दरारें आने लगी हैं और छत भी कमजोर होती जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इस भवन की मरम्मत नहीं करवाई गई तो आने वाले समय में यह पूरी तरह गिर सकता है। स्कूल भवन की खराब होती स्थिति न केवल गांव की धरोहर को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि यह लोगों की सुरक्षा के लिए भी चिंता का कारण बनती जा रही है।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह विद्यालय केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं था। यहां गांव और आसपास के क्षेत्रों के कई सामाजिक, सांस्कृतिक और सरकारी कार्यक्रम भी आयोजित होते थे। पंचायत चुनावों के दौरान यह भवन मतदान केंद्र के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था। इसी विद्यालय से पढ़कर निकले कई विद्यार्थी आज सरकारी विभागों, निजी संस्थानों और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि इस विद्यालय ने कई परिवारों के भविष्य को नई दिशा दी थी। इसलिए यह भवन केवल ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि गांव के गौरव और शिक्षा की पहचान है। प्राथमिक विद्यालय की यह विरासत आज भी लोगों की यादों में जीवित है।
मतदान केंद्र बंद होने से ग्रामीणों को हुई परेशान
ग्रामीणों ने बताया कि हाल ही में हुए पंचायत चुनावों के दौरान भी इस विद्यालय का उपयोग मतदान केंद्र के रूप में नहीं किया गया। कारण यह बताया गया कि विद्यालय सरकारी रिकॉर्ड में निष्क्रिय दर्ज है और यहां बिजली तथा पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसके चलते डलवाना गुज़रा और आसपास के गांवों के लोगों को मतदान करने के लिए लगभग तीन किलोमीटर दूर दूसरे विद्यालय जाना पड़ा। सबसे अधिक परेशानी बुजुर्गों, महिलाओं और दिव्यांग मतदाताओं को उठानी पड़ी। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस भवन को समय रहते उपयोग में लाया जाता तो लोगों को इतनी कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।
ग्रामीणों ने आशंका जताई है कि यदि इस भवन की देखभाल नहीं की गई तो आने वाले समय में यह असामाजिक तत्वों और नशा करने वाले लोगों का अड्डा बन सकता है। इसके अलावा आवारा पशुओं का ठिकाना बनने की भी संभावना बढ़ रही है। लंबे समय से खाली पड़े भवन में किसी भी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। यदि इसकी स्थिति इसी तरह बिगड़ती रही तो यह आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी खतरा बन सकता है। गांव की धरोहर को बचाने के लिए अब ग्रामीण लगातार आवाज उठा रहे हैं।
भवन के बेहतर उपयोग की उठी मांग
गांववासियों का कहना है कि यदि इस भवन में दोबारा स्कूल चलाना संभव नहीं है तो इसे किसी दूसरे सरकारी कार्य के लिए इस्तेमाल किया जाए। यहां आंगनबाड़ी केंद्र, पुस्तकालय, सामुदायिक भवन, स्वास्थ्य उपकेंद्र, कौशल विकास केंद्र या किसी अन्य सरकारी कार्यालय की शुरुआत की जा सकती है। इससे भवन भी सुरक्षित रहेगा और गांव के लोगों को बेहतर सुविधाएं भी मिलेंगी। ग्रामीणों का मानना है कि सरकारी संपत्ति को यूं ही बर्बाद होने देना सही नहीं है और इसका उपयोग जनहित में किया जाना चाहिए।
गांव के लोगों का कहना है कि इस विद्यालय से उनकी भावनाएं जुड़ी हुई हैं। यहां पढ़े कई लोग आज बड़े पदों पर कार्य कर रहे हैं और जब वे गांव लौटते हैं तो अपने पुराने स्कूल की बदहाल स्थिति देखकर दुखी हो जाते हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि शिक्षा विभाग, जिला प्रशासन और सरकार इस ओर गंभीरता से ध्यान देंगे। यदि समय रहते इस भवन का संरक्षण और उपयोग सुनिश्चित किया गया तो गांव की यह अमूल्य धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रह सकेगी। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस जर्जर भवन को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएगा या फिर यह भी सरकारी उपेक्षा की एक और कहानी बनकर रह जाएगा।
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