Post by : Khushi Joshi
हिमाचल प्रदेश की असली खूबसूरती सिर्फ बर्फ, देवदार, मंदिरों और घाटियों में नहीं है, बल्कि यहां की बोली, लोकगीत, नाटियां, देव संस्कृति और संगीत में भी बसती है। पहाड़ों में गीत केवल मनोरंजन नहीं होते, बल्कि जीवन का हिस्सा होते हैं। खेतों में काम करते समय, देव कार्यक्रमों में, मेलों में, शादी-ब्याह में, त्योहारों पर और अकेले पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए भी लोकगीत लोगों के साथ चलते हैं।
Upper Himachal और Shimla क्षेत्र की इसी संगीत परंपरा को आगे बढ़ाने वाले कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें केवल गायक कहना कम होगा। वे इस मिट्टी की आवाज बन गए। ऐसे ही एक सम्मानित और पुराने दौर के प्रसिद्ध कलाकार हैं Prof. Som Datt Battu। उन्होंने Himachali folk music और Hindustani classical music दोनों को अपनी साधना से मजबूत किया और संगीत को केवल पेशा नहीं, बल्कि जीवन की तपस्या माना।
Prof. Som Datt Battu Himachal Pradesh के जाने-माने veteran singer, musicologist, composer और classical music guru हैं। वे Shimla-based vocalist के रूप में पहचाने जाते हैं और उन्होंने लंबे समय तक संगीत की शिक्षा, गायन और हिमाचली लोक-संगीत के संरक्षण में काम किया। उनका नाम उन कलाकारों में लिया जाता है जिन्होंने पहाड़ी संगीत को शास्त्रीय संगीत की गंभीरता और अनुशासन के साथ जोड़ा।
उनकी पहचान केवल मंच पर गाने वाले कलाकार की नहीं है। वे एक ऐसे गुरु भी हैं जिन्होंने कई शिष्यों को संगीत सिखाया, लोक और शास्त्रीय परंपरा को समझाया और संगीत को ज्ञान की तरह आगे बढ़ाया। यही कारण है कि उनका योगदान केवल उनकी अपनी गायकी तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक फैला हुआ है।
Prof. Som Datt Battu का जन्म संगीत से जुड़े परिवार में हुआ। बचपन से ही उनके आसपास सुर, राग, बंदिशें और गायकी का माहौल था। जब किसी बच्चे के घर में संगीत सांसों की तरह मौजूद हो, तो उसके भीतर सुरों के प्रति लगाव अपने आप जन्म लेता है। Prof. Battu के साथ भी यही हुआ।
उन्होंने बहुत छोटी उम्र से ही संगीत को अपनाया। उनके पिता Pt. Ram Lal Battu स्वयं संगीत परंपरा से जुड़े थे और उन्होंने ही उन्हें शुरुआती प्रशिक्षण दिया। घर की यह सीख आगे चलकर बड़े गुरुओं की तालीम से और मजबूत होती गई। यही कारण है कि उनकी गायकी में बचपन से सीखी हुई परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध और रियाज की गहराई साफ महसूस होती थी।
Prof. Som Datt Battu की गायकी की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि उन्होंने अलग-अलग संगीत परंपराओं से सीख ली। उन्होंने Shyam Chaurasi Gharana, Gwalior Gharana, Punjab Gharana और Patiala Gharana की गायकी की बारीकियों को समझा। इसी कारण उनकी आवाज में केवल लोक-संगीत की मिठास नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत की गहराई भी दिखाई देती थी।
Himachali लोकगीतों में भाव, मिट्टी और भाषा की सुगंध होती है, जबकि Hindustani classical music में राग, लय, तालीम और अनुशासन की मजबूत परंपरा होती है। Prof. Battu ने इन दोनों संसारों को एक साथ समझा। यही उनकी गायकी को अलग बनाता है। वे पहाड़ की आत्मा को शास्त्रीय संगीत की गंभीरता के साथ प्रस्तुत करने वाले कलाकारों में गिने जाते हैं।
Prof. Som Datt Battu ji को समझने के लिए यह बात सबसे पहले समझनी जरूरी है कि वे आज के commercial music singer की तरह केवल “hit songs” देने वाले कलाकार नहीं थे। उनकी असली पहचान एक ऐसे गायक, गुरु, संगीतकार और musicologist की थी, जिन्होंने Himachali folk music और Hindustani classical music दोनों को सम्मान के साथ आगे बढ़ाया। उनके गीतों में पहाड़ की मिट्टी भी थी और शास्त्रीय संगीत की गहराई भी।
उनकी गायकी में जल्दबाजी नहीं होती थी। सुर धीरे-धीरे खुलते थे, शब्द साफ सुनाई देते थे और भाव सीधे दिल तक पहुंचता था। यही कारण था कि उन्हें सुनने वाले लोग केवल गीत नहीं सुनते थे, बल्कि एक पूरा अनुभव महसूस करते थे। पुराने समय में जब Akashvani और stage concerts लोगों तक संगीत पहुंचाने का बड़ा माध्यम थे, तब Prof. Battu ji की आवाज ने कई श्रोताओं को पहाड़ी लोक-संगीत और classical गायकी से जोड़ा।
उनके गीतों में शोर नहीं, ठहराव था। उनमें modern beats की चमक से ज्यादा सुरों की सच्चाई थी। उनकी आवाज में पहाड़ी लोकजीवन की सादगी, मां-बेटी के रिश्तों की कोमलता, प्रेम और विरह का भाव, देव संस्कृति की मर्यादा और classical music का अनुशासन एक साथ सुनाई देता था।
Prof. Som Datt Battu ji की लोकप्रियता को आज के singers की तरह album views, YouTube numbers या viral songs से नहीं मापा जा सकता। उनका दौर radio, stage concerts, शास्त्रीय संगीत सभाओं, गुरु-शिष्य परंपरा और लोक-संगीत की मौखिक परंपरा का दौर था। इसलिए उनके काम की पहचान commercial hit list से ज्यादा classical bandishes, Himachali folk renditions, Akashvani recordings, stage performances और compositions के रूप में होती है।
उनके नाम से जुड़े online recordings और संगीत प्रेमियों की चर्चा में “Maae Ni Meriye” जैसे पहाड़ी लोकगीत की प्रस्तुति का उल्लेख मिलता है। यह गीत Himachali-Pahari भावनाओं से जुड़ा हुआ बहुत प्रसिद्ध लोकगीत माना जाता है। इसमें मां-बेटी, घर, दूरी, पहाड़ और अपनापन जैसे भाव मिलते हैं। ऐसे गीत लोगों को इसलिए पसंद आते हैं क्योंकि वे केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए होते हैं।
“Maae Ni Meriye” जैसे गीतों में पहाड़ की वह भावना है, जिसमें घर से दूर जाने की कसक भी है और अपनी मिट्टी से जुड़ाव भी। जब कोई अनुभवी गायक इसे सुर और भाव के साथ प्रस्तुत करता है, तो यह गीत सिर्फ लोकधुन नहीं रहता, बल्कि पहाड़ी जीवन की एक भावनात्मक कहानी बन जाता है। Prof. Battu ji जैसे कलाकार ऐसे लोकगीतों को हल्का entertainment नहीं बनाते थे, बल्कि उन्हें सम्मान और गहराई के साथ गाते थे।
इसके अलावा Prof. Battu ji classical music में रागों और bandishes की प्रस्तुति के लिए भी जाने जाते थे। उन्होंने पारंपरिक classical bandishes को compile और preserve करने का काम किया। उनकी गायकी में Patiala Gharana की मिठास, Gwalior परंपरा की स्पष्टता, Punjab Gharana की तालीम और Shyam Chaurasi Gharana की गहराई दिखाई देती थी। वे ऐसे कलाकार थे जो लोकगीत को भी हल्का नहीं बनाते थे और classical music को भी इतना कठिन नहीं बनाते थे कि आम श्रोता उससे दूर हो जाए।
Himachali folk songs में सबसे जरूरी चीज होती है भाव। अगर कोई गायक केवल सुर लगा दे, लेकिन शब्दों का दर्द, खुशी, विरह या लोकजीवन की आत्मा न समझे, तो गीत अधूरा लगता है। Prof. Som Datt Battu ji की खासियत यही थी कि वे गीत की आत्मा पकड़ते थे। वे लोकगीतों को सिर्फ गाते नहीं थे, उन्हें जीते थे।
उनकी आवाज में पहाड़ों की ठहराव वाली शांति थी। वे गीत को बहुत शोर या दिखावे से नहीं गाते थे। उनकी प्रस्तुति में सादगी, मर्यादा और गहराई रहती थी। यही वजह थी कि बुजुर्ग श्रोता उन्हें सम्मान से सुनते थे और संगीत सीखने वाले students उन्हें गुरु की तरह मानते थे।
Himachali folk music में प्रेम गीत, देव गीत, ऋतु गीत, विवाह गीत, नाटी धुनें और लोक-कथाओं से जुड़े गीत बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। Prof. Battu ji ने इन लोक-सुरों को शास्त्रीय अनुशासन के साथ प्रस्तुत करके उन्हें और मजबूत पहचान दी। उनकी गायकी में पहाड़ी भाषा की मिठास और राग की गहराई दोनों साथ चलते थे।
लोग Prof. Som Datt Battu ji को इसलिए पसंद करते थे क्योंकि उनकी आवाज में बनावट नहीं थी। आज के दौर में कई बार गाने में music production, beats और effects बहुत ज्यादा हो जाते हैं, लेकिन Battu ji की गायकी में असली ताकत सुर, भाव और शब्दों की साफगोई थी। उनकी आवाज सुनकर लगता था कि कोई अनुभवी कलाकार अपनी साधना से निकला हुआ संगीत सुना रहा है।
उनके गीतों में तीन बातें सबसे ज्यादा पसंद की जाती थीं। पहली, उनकी शुद्ध गायकी। वे सुर और राग की मर्यादा को बहुत गंभीरता से निभाते थे। दूसरी, उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति। वे गीत के शब्दों को केवल बोलते नहीं थे, बल्कि उनमें भाव भरते थे। तीसरी, उनकी पहाड़ी जड़ों से जुड़ी पहचान। वे हिमाचल की लोक-संगीत परंपरा को सम्मान के साथ प्रस्तुत करते थे, इसलिए लोगों को उनमें अपनी मिट्टी की आवाज सुनाई देती थी।
उनका संगीत उन लोगों को बहुत पसंद आता था जो गीत में केवल rhythm नहीं, बल्कि अर्थ और आत्मा भी सुनना चाहते थे। वे लोकगीत को भी इतनी गंभीरता से गाते थे कि सुनने वाला अपने गांव, अपने घर, अपनी मां, अपने बचपन और अपने पहाड़ को याद करने लगे।
Prof. Battu ji को खासकर वे लोग बहुत पसंद करते थे जो असली संगीत सुनना जानते थे। उनके श्रोता केवल entertainment के लिए नहीं, बल्कि संगीत की quality और गहराई के लिए उन्हें सुनते थे। Akashvani के दौर में उनकी प्रस्तुतियां उन लोगों तक पहुंचती थीं जो radio पर classical और folk music को ध्यान से सुनते थे।
बुजुर्गों के लिए उनकी आवाज पुराने Himachal की याद लेकर आती थी। Students के लिए वे एक गुरु थे। Classical music lovers के लिए वे disciplined vocalist थे। Himachali folk lovers के लिए वे अपनी सांस्कृतिक पहचान की आवाज थे। यही उनकी popularity की असली वजह थी।
उनकी गायकी में पहाड़ों की सादगी, रिश्तों की गर्माहट, लोकजीवन की मिठास और आध्यात्मिक ठहराव महसूस होता था। Himachali folk songs में अक्सर घर से दूरी, मां-बेटी का रिश्ता, प्रेम, प्रकृति, देव आस्था और जीवन की छोटी-छोटी खुशियां गाई जाती हैं। Battu ji ऐसे गीतों को बहुत सम्मान से गाते थे।
उनका संगीत यह बताता था कि पहाड़ी गीत केवल नाचने के लिए नहीं होते, बल्कि सोचने, महसूस करने और याद करने के लिए भी होते हैं। यही कारण है कि उनके गीतों और प्रस्तुतियों में शोर कम और आत्मा ज्यादा महसूस होती थी।
Prof. Som Datt Battu ji केवल लोकगीत और classical गायकी तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने Army, Navy और Air Force के लिए martial songs की composition में भी योगदान दिया। ऐसे गीतों में जोश, अनुशासन और देशभक्ति का भाव जरूरी होता है। उन्होंने Corps of Signals के लिए martial tune भी compose की, जिसे पुराने British tune की जगह अपनाया गया।
यह उनके संगीत कौशल की बड़ी पहचान है कि वे एक तरफ पहाड़ी लोकगीतों की कोमलता को समझते थे और दूसरी तरफ martial compositions में वीर रस और अनुशासन भी ला सकते थे। यह versatility बहुत कम कलाकारों में मिलती है।
हिमाचली लोक-संगीत बहुत विविध है। हर जिले की बोली, नाटी, लोकधुन और गाने की शैली अलग है। Shimla, Kullu, Kinnaur, Sirmaur, Chamba, Mandi और Kangra की अपनी-अपनी musical identity है। पुराने समय में ये गीत लिखित रूप में कम और याददाश्त व परंपरा के सहारे ज्यादा चलते थे। ऐसे में अगर किसी कलाकार ने इन्हें समझा, गाया और आगे बढ़ाया, तो वह काम बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
Prof. Som Datt Battu ने Himachali folk music को केवल मनोरंजन के रूप में नहीं देखा। उन्होंने इसे culture, language और identity का हिस्सा माना। पहाड़ी लोकगीतों में देव आस्था, प्रेम, विरह, ऋतु परिवर्तन, मेहनत, मेलों और सामाजिक जीवन की झलक मिलती है। Prof. Battu जैसे कलाकारों ने इन लोक-सुरों को सम्मान दिया और उन्हें बड़े मंचों तक पहुंचाने में योगदान दिया।
Prof. Som Datt Battu की सबसे खास पहचान यही है कि उन्होंने classical music और pahari folk music के बीच एक सुंदर पुल बनाया। कई बार लोक-संगीत को लोग simple या हल्का समझ लेते हैं, जबकि असल में उसमें समाज की आत्मा छिपी होती है। दूसरी ओर classical music को कई लोग कठिन और सीमित मान लेते हैं। Prof. Battu ने दोनों की गरिमा को समझा।
उनकी गायकी बताती है कि पहाड़ी लोकगीतों की जड़ें भी उतनी ही गहरी हैं जितनी किसी शास्त्रीय राग की। अगर लोकगीत को सही सुर, सही भाव और सही प्रस्तुति मिले, तो वह किसी भी बड़े मंच पर असर छोड़ सकता है। यही सोच उन्हें सामान्य गायक से अलग बनाती है।
Prof. Som Datt Battu की विरासत को समझने के लिए उन्हें केवल performer के रूप में देखना काफी नहीं है। उनकी असली पहचान एक गुरु के रूप में भी बहुत बड़ी है। उन्होंने दशकों तक colleges, universities और अलग-अलग संस्थानों में classical music सिखाया। उन्होंने कई students और disciples को संगीत की सही दिशा दी।
उनकी खास बात यह रही कि उन्होंने संगीत को सिर्फ tuition या earning का माध्यम नहीं माना। उन्होंने इसे ज्ञान की परंपरा माना। संगीत सिखाना उनके लिए ज्ञान-दान जैसा था। इस सोच में ही उनके व्यक्तित्व की गंभीरता और विनम्रता दिखाई देती है। आज के समय में जब कला कई बार केवल commercial platform तक सीमित हो जाती है, ऐसे कलाकार हमें याद दिलाते हैं कि संगीत पहले साधना है, फिर प्रदर्शन।
Prof. Battu ने लंबे समय तक Akashvani और stage concerts के माध्यम से संगीत प्रस्तुत किया। पुराने समय में Akashvani किसी भी कलाकार के लिए बहुत बड़ा मंच होता था। वहां गाने का मतलब था कि आवाज घर-घर तक पहुंच रही है। TV और social media से पहले radio ही वह माध्यम था जिसके जरिए लोक-संगीत और classical music लोगों तक पहुंचता था।
उनकी आवाज ने कई श्रोताओं को पहाड़ी और शास्त्रीय संगीत से जोड़ा। Stage concerts में उन्होंने Himachal की संगीत परंपरा को सम्मान के साथ प्रस्तुत किया। विदेशों में भी भारतीय संगीत को showcasing करने का अवसर उन्हें मिला, जिससे उनकी कला हिमाचल से बाहर भी पहुंची।
Prof. Som Datt Battu केवल vocalist नहीं, बल्कि composer और musicologist भी हैं। एक singer गीत गाता है, लेकिन musicologist संगीत को समझता, लिखता, अध्ययन करता और उसकी परंपरा को दस्तावेज की तरह सुरक्षित करता है। यही काम किसी भी संस्कृति को लंबे समय तक बचाने में मदद करता है।
उनके संगीत संबंधी लेखन को भी मान्यता मिली। उन्होंने traditional classical bandishes को compile करने का काम किया और संगीत पर गंभीर अध्ययन भी किया। पहाड़ी संगीत के लिए ऐसे विद्वान बहुत जरूरी हैं, क्योंकि वे परंपरा को केवल गाकर नहीं, बल्कि लिखकर और समझाकर भी बचाते हैं।
Prof. Som Datt Battu को भारत सरकार द्वारा Padma Shri से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल उनके व्यक्तिगत सफर की उपलब्धि नहीं है, बल्कि Himachal Pradesh की संगीत परंपरा के लिए भी बड़ा गौरव है। Padma Shri देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों में शामिल है और किसी कलाकार को यह सम्मान मिलना उसके जीवनभर के योगदान की राष्ट्रीय पहचान है।
जब Upper Himachal और Shimla से जुड़े किसी veteran artist को यह सम्मान मिलता है, तो पहाड़ी लोक-संगीत, classical गायकी और local culture तीनों को नई पहचान मिलती है। यह सम्मान बताता है कि पहाड़ों की आवाज भी राष्ट्रीय मंच पर उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी किसी बड़े metropolitan संगीत केंद्र की।
Prof. Battu को उनके योगदान के लिए कई सम्मान मिले। उन्हें Himachal Gaurav Puraskar, Sangeet Natak Akademi Award, Punjab Sangeet Rattan Award, Lifetime Achievement Award और कई अन्य music honours से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल awards की सूची नहीं हैं, बल्कि इस बात का प्रमाण हैं कि उनका काम कई दशकों तक लगातार पहचाना गया।
किसी कलाकार के लिए सबसे बड़ी बात यह होती है कि उसकी कला समय के साथ भी सम्मानित रहे। Prof. Battu की यात्रा में यही दिखाई देता है। उन्होंने trend के हिसाब से संगीत नहीं बदला, बल्कि अपनी जड़ों और तालीम के साथ ईमानदार रहे।
Upper Himachal की संस्कृति में लोकगीतों का बहुत महत्व है। Shimla, Kullu, Kinnaur, Sirmaur और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में नाटी, देव गीत, ऋतु गीत और पारंपरिक धुनें पीढ़ियों से चली आ रही हैं। लेकिन आज modern music और social media के दौर में पुराने लोक-संगीत को संभालना चुनौती बनता जा रहा है।
Prof. Som Datt Battu जैसे कलाकारों की कहानी इसलिए जरूरी है क्योंकि वे बताते हैं कि लोक-संगीत को बचाने के लिए केवल गाना काफी नहीं, बल्कि उसे समझना, सिखाना, लिखना और सम्मान देना भी जरूरी है। अगर नई पीढ़ी अपने पुराने artists को जानेगी, तभी वह अपनी musical roots को समझ पाएगी।
नई पीढ़ी Prof. Som Datt Battu ji से यह सीख सकती है कि अपनी लोक संस्कृति को modern दौर में भी सम्मान के साथ प्रस्तुत किया जा सकता है। Himachali songs को popular बनाने के लिए उनकी आत्मा खोना जरूरी नहीं है। गीत में beats और music arrangement नए हो सकते हैं, लेकिन भाषा, भाव और लोकधुन की गरिमा बची रहनी चाहिए।
Battu ji की यात्रा यह भी सिखाती है कि singer को केवल आवाज का मालिक नहीं, बल्कि संस्कृति का जिम्मेदार वाहक भी होना चाहिए। अगर कोई कलाकार अपनी मिट्टी को समझकर गाता है, तो लोग उसे लंबे समय तक याद रखते हैं।
Himachal की कई पुरानी लोकधुनें और गीत अभी भी गांवों, बुजुर्गों और परंपरागत गायकों के पास जीवित हैं। अगर इन्हें समय पर document नहीं किया गया, तो बहुत कुछ खो सकता है। Prof. Battu जैसे musicologists और gurus की अहमियत यहीं समझ आती है। उन्होंने संगीत को केवल perform नहीं किया, बल्कि उसकी गंभीरता को भी समझा।
Prof. Som Datt Battu Himachal Pradesh के veteran singer, musicologist, composer और classical music guru हैं। वे Shimla-based vocalist के रूप में जाने जाते हैं और Himachali folk तथा Hindustani classical music में उनका बड़ा योगदान है।
उनकी पहचान modern commercial hit songs से ज्यादा Himachali folk renditions, classical bandishes, Akashvani recordings और stage performances से जुड़ी रही। Online recordings में “Maae Ni Meriye” जैसी पहाड़ी लोकधुन उनके नाम से जुड़ी दिखाई देती है, लेकिन उनकी पूरी verified song list सार्वजनिक रूप से आसानी से उपलब्ध नहीं है।
लोग उन्हें उनकी शुद्ध गायकी, भावपूर्ण प्रस्तुति, पहाड़ी जड़ों से जुड़े संगीत और classical discipline के कारण पसंद करते थे। उनकी आवाज में बनावट नहीं, बल्कि रियाज और सादगी की गहराई थी।
वे Hindustani classical music, Himachali folk music, musicology और composition से जुड़े हैं। उन्होंने folk और classical दोनों संगीत परंपराओं को आगे बढ़ाने में काम किया।
हां, Prof. Som Datt Battu को Art field में Padma Shri से सम्मानित किया गया। यह Himachal Pradesh की music heritage के लिए गर्व की बात है।
उनकी गायकी में Himachali folk music की मिट्टी और Hindustani classical music की गहराई दोनों दिखाई देती थीं। वे गीत को शोर या दिखावे से नहीं, बल्कि सुर, भाव और मर्यादा से प्रस्तुत करते थे।
नए singers सीख सकते हैं कि असली पहचान केवल popularity से नहीं, बल्कि रियाज, अनुशासन, संस्कृति के प्रति सम्मान और लंबे समय की साधना से बनती है।
Shimla और Upper Himachal की पहचान केवल tourism या natural beauty तक सीमित नहीं है। यहां की लोकधुनें, नाटियां, देव गीत और classical music से जुड़े कलाकार भी इस क्षेत्र की असली विरासत हैं। Prof. Som Datt Battu जैसे artists ने Himachal की आवाज को local मंचों से उठाकर राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। इसलिए Upper Himachal के cultural content में ऐसे पुराने और सम्मानित कलाकारों की कहानियां जरूर शामिल होनी चाहिए।
Prof. Som Datt Battu की कहानी Himachal के संगीत, साधना और सम्मान की कहानी है। उन्होंने पहाड़ी लोक-संगीत और Hindustani classical music दोनों को अपने जीवन का हिस्सा बनाया। उन्होंने गाया, सिखाया, लिखा, compose किया और सबसे महत्वपूर्ण बात — संगीत को सम्मान के साथ आगे बढ़ाया।
उनकी गायकी लोगों को इसलिए पसंद थी क्योंकि उसमें पहाड़ की सादगी, लोकगीतों की आत्मा और शास्त्रीय संगीत की गहराई एक साथ मिलती थी। वे commercial चमक से दूर रहकर संगीत की असली परंपरा के साथ जुड़े रहे। Upper Himachal और Shimla की सांस्कृतिक पहचान में ऐसे कलाकारों का योगदान बहुत बड़ा है। उनकी यात्रा हमें बताती है कि पहाड़ों की आवाज जब सच्चे रियाज और गहरी समझ के साथ निकलती है, तो वह केवल घाटियों में नहीं गूंजती, बल्कि पूरे देश तक पहुंचती है।
Prof. Som Datt Battu Himachal की उसी सुरमयी विरासत का सम्मानित नाम हैं, जिन्हें याद रखना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
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