Post by : Shivani Kumari
कई दशकों से यह धारणा हमारे स्वास्थ्य विमर्श में गहराई से बैठी हुई है कि “नाश्ता दिन का सबसे महत्वपूर्ण भोजन है।” स्कूलों में, विज्ञापनों में और यहां तक कि चिकित्सा सलाहों में भी यह बात दोहराई जाती रही है कि नाश्ता छोड़ना सेहत के लिए नुकसानदेह है — इससे दिमाग सुस्त पड़ता है, ध्यान भटकता है और ऊर्जा घटती है। लेकिन एक नया वैज्ञानिक अध्ययन इस पुराने विश्वास को चुनौती दे रहा है।
हाल ही में प्रकाशित एक व्यापक शोध में पाया गया है कि वयस्क व्यक्तियों के लिए नाश्ता छोड़ना उतना हानिकारक नहीं जितना पहले माना जाता था। इस अध्ययन के अनुसार, वयस्कों में नाश्ता छोड़ने से दिमाग की कार्यक्षमता, स्मरणशक्ति या फोकस में कोई स्पष्ट गिरावट नहीं आती। यह निष्कर्ष न केवल सामान्य धारणा को बदलने वाला है, बल्कि यह हमारे भोजन और जीवनशैली से जुड़े कई मिथकों पर पुनर्विचार करने का अवसर भी देता है।
यह अध्ययन ‘मनोवैज्ञानिक बुलेटिन’ नामक अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ, जिसमें 63 अलग-अलग शोधों के निष्कर्षों का विश्लेषण किया गया। इन अध्ययनों में कुल 3,400 से अधिक प्रतिभागी शामिल थे। शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि नाश्ता करने वाले और नाश्ता न करने वाले वयस्कों में संज्ञानात्मक (cognitive) प्रदर्शन में कोई अंतर है या नहीं।
इस अध्ययन का नेतृत्व क्रिस्टोफ बैम्बर्ग (क्रिस्टोफ़ बामबर्ग) और डेविड मोरो (डेविड मोरो) नामक दो वैज्ञानिकों ने किया। उन्होंने वर्षों से चले आ रहे शोध डेटा का विश्लेषण किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि नाश्ता करने और नाश्ता छोड़ने वाले लोगों के मस्तिष्क प्रदर्शन में क्या अंतर होता है।
परिणाम चौंकाने वाले थे — शोध के अनुसार, दोनों समूहों के बीच औसत प्रदर्शन का अंतर केवल 0.2 यूनिट था, जो वैज्ञानिक दृष्टि से इतना छोटा है कि उसे ‘अमहत्वपूर्ण’ (statistically insignificant) माना जाता है। दूसरे शब्दों में, नाश्ता करने या नाश्ता छोड़ने से दिमाग की क्षमता पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता।
शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह निष्कर्ष मुख्य रूप से स्वस्थ वयस्कों पर लागू होता है। अध्ययन में यह भी बताया गया कि मानव शरीर और मस्तिष्क में एक प्राकृतिक ‘बैकअप सिस्टम’ मौजूद है जो भोजन न मिलने पर भी ऊर्जा बनाए रखता है। आम तौर पर, हमारा मस्तिष्क ऊर्जा के लिए ग्लूकोज़ का उपयोग करता है, जो खाने से प्राप्त शर्करा होती है। लेकिन जब व्यक्ति कुछ समय तक भोजन नहीं करता, तो शरीर कीटोन (Ketones) नामक एक वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत का निर्माण शुरू कर देता है।
कीटोन का निर्माण तब होता है जब शरीर वसा (fat) को तोड़कर ऊर्जा के रूप में उपयोग करता है। यह प्रक्रिया, जिसे केटोजेनेसिस कहा जाता है, हमारे मस्तिष्क को स्थिर ऊर्जा प्रदान करती है। यही कारण है कि नाश्ता छोड़ देने या थोड़े समय तक उपवास करने के बावजूद अधिकांश वयस्क लोग ध्यान केंद्रित कर पाते हैं और मानसिक रूप से सक्रिय रहते हैं।
दरअसल, यह मानव जीवविज्ञान का एक पुराना हिस्सा है। प्राचीन काल में मनुष्य दिन के कई घंटे या कभी-कभी पूरे दिन भोजन के बिना गुजार देता था, लेकिन उसे सतर्क रहना और निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखनी पड़ती थी। यह जीववैज्ञानिक प्रणाली हमारे अंदर आज भी मौजूद है।
20वीं सदी के उत्तरार्ध से पहले तक नाश्ते को लेकर वैज्ञानिक मतभेद मौजूद थे। 1970 और 1980 के दशक में कई पोषण विशेषज्ञों ने यह प्रचारित किया कि दिन की शुरुआत भारी नाश्ते से करनी चाहिए ताकि शरीर को ऊर्जा मिले और मेटाबॉलिज़्म सक्रिय रहे। हालांकि, उन शुरुआती अध्ययनों में प्रतिभागियों की संख्या कम थी और वे मुख्य रूप से बच्चों या किशोरों पर केंद्रित थे।
नए अध्ययन ने इन पुराने प्रयोगों की तुलना वयस्कों के व्यापक डेटा से की और पाया कि वयस्कों में यह नियम लागू नहीं होता। यानी बच्चों के लिए नाश्ता ज़रूरी है, लेकिन वयस्कों के लिए यह एक ‘विकल्प’ है, कोई अनिवार्यता नहीं।
शोधकर्ताओं ने 63 स्वतंत्र अध्ययनों के परिणामों का एकीकृत विश्लेषण (मेटा-एनालिसिस) किया। इन अध्ययनों में संज्ञानात्मक कार्यों जैसे स्मरणशक्ति, ध्यान, निर्णय लेने और प्रतिक्रिया समय का परीक्षण किया गया। प्रतिभागियों को दो समूहों में बाँटा गया — एक ने नाश्ता किया, जबकि दूसरे ने उपवास की स्थिति में वही कार्य किए।
परिणामों में पाया गया कि:
इसलिए अध्ययन ने निष्कर्ष निकाला कि “नाश्ता छोड़ना स्वस्थ वयस्कों में दिमागी कार्यक्षमता को प्रभावित नहीं करता।”
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि मानव मस्तिष्क का विकास इसी क्षमता पर आधारित है कि वह भोजन की कमी में भी कार्य कर सके। शिकारी-संग्राहक काल में मनुष्य घंटों और कभी-कभी दिनों तक भोजन के बिना रहता था, फिर भी उसे शिकार करने, सोचने और निर्णय लेने की आवश्यकता होती थी।
इस प्राकृतिक अनुकूलन क्षमता के कारण ही आज के वयस्क कुछ घंटों का उपवास या नाश्ता छोड़ने के बावजूद थकान या सुस्ती महसूस नहीं करते। शरीर तुरंत वसा से कीटोन बनाकर ऊर्जा स्रोत को स्थानापन्न कर देता है।
इस अध्ययन ने एक और रोचक अवधारणा पर रोशनी डाली — मेटाबॉलिक फ्लेक्सिबिलिटी यानी शरीर की वह क्षमता जिससे वह ग्लूकोज़ और फैट दोनों से ऊर्जा प्राप्त कर सके। स्वस्थ व्यक्ति में यह लचीलापन होता है, इसलिए वह बिना नाश्ते के भी अपने कार्य पूरे कर सकता है।
वहीं, जिन व्यक्तियों का मेटाबॉलिज़्म असंतुलित होता है — जैसे मधुमेह रोगियों में — यह क्षमता घट जाती है। इसलिए शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि नाश्ता छोड़ने से पहले अपने स्वास्थ्य की स्थिति को समझना ज़रूरी है।
शोध का यह पहला बड़ा निष्कर्ष है कि वयस्कों में नाश्ता छोड़ने से मस्तिष्क की गति, एकाग्रता या याददाश्त में कोई नकारात्मक परिवर्तन नहीं होता। बल्कि, शरीर के भीतर मौजूद ऊर्जा तंत्र (energy systems) मस्तिष्क को आवश्यक ईंधन प्रदान करते रहते हैं।
अध्ययन के अनुसार, यह भी देखा गया कि जो लोग नियमित रूप से नाश्ता नहीं करते, उनके शरीर में कीटोन स्तर अधिक स्थिर होते हैं और वे मानसिक रूप से उतने ही सतर्क रहते हैं जितने कि नाश्ता करने वाले। यह निष्कर्ष इंटरमिटेंट फास्टिंग के सिद्धांतों के अनुरूप भी है, जिसे हम अगले भाग में विस्तार से समझेंगे।
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