Author : Man Singh
शिमला विश्वविद्यालय नगर रूरा क्षेत्र और इसके आसपास के मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों में इन दिनों सूखे की गंभीर मार देखने को मिल रही है। यह क्षेत्र सामान्य रूप से संतुलित मौसम और समय पर वर्षा के लिए जाना जाता है, लेकिन इस वर्ष बारिश की कमी ने किसानों की कमर तोड़ दी है। यहां के किसान मुख्य रूप से गेहूं की फसल पर निर्भर रहते हैं और उनकी सालभर की आय का बड़ा हिस्सा इसी फसल से आता है। लेकिन इस बार मौसम की बेरुखी ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है।
बरसात के बाद किसानों को गेहूं की फसल की कटाई के लिए काफी लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा था। मौसम के असामान्य व्यवहार के कारण पहले ही कृषि कार्यों में देरी हो चुकी थी। 23 जनवरी को जब बारिश हुई, तब किसानों के चेहरों पर एक बार फिर उम्मीद की किरण दिखाई दी थी। उन्हें लगा था कि अब मौसम साथ देगा और वे समय पर बुवाई कर पाएंगे। उस दिन हुई बारिश ने खेतों में नमी दी और किसानों ने राहत की सांस ली।
लेकिन यह राहत ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई। जैसे ही किसानों ने अपने खेतों में गेहूं की बुवाई की, उसके बाद दोबारा बारिश नहीं हुई। कई किसानों को खेत खाली करने और जमीन तैयार करने में समय लग गया, जिससे वे बुवाई में देरी का शिकार हो गए। जब तक उन्होंने बीज डाले, तब तक खेतों की नमी कम होने लगी थी। परिणामस्वरूप बीजों को अंकुरित होने के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिला और खेत दोबारा सूखे की चपेट में आ गए।
इस सूखे का सबसे बड़ा असर गेहूं की फसल पर पड़ा है। सामान्य परिस्थितियों में मार्च के अंतिम सप्ताह तक गेहूं की फसल लगभग एक फीट तक बढ़ जाती है। हरे-भरे खेतों में लहलहाती बालियां किसानों को खुश कर देती हैं। लेकिन इस बार स्थिति बिल्कुल अलग है। वर्तमान समय में फसल की ऊंचाई केवल एक इंच से डेढ़ इंच तक ही पहुंच पाई है। कई जगहों पर पौधे जड़ों में ही कमजोर पड़ गए हैं और पीले पड़ते नजर आ रहे हैं।
किसानों का कहना है कि इस बार नुकसान की शुरुआत ही बीज बोने के समय से हो गई थी। बीज, खाद और अन्य कृषि सामग्री पहले से ही बाजार में महंगे दामों पर मिल रही हैं। किसानों ने उधार लेकर या अपनी जमा पूंजी लगाकर खेतों में निवेश किया था। लेकिन अब जब फसल ठीक से बढ़ ही नहीं पा रही, तो उन्हें भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।
सूखे के कारण किसान खेतों में गोबर की खाद भी नहीं डाल पा रहे हैं। सूखी जमीन में खाद डालने का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि बिना नमी के वह मिट्टी में ठीक से मिल नहीं पाती। इसके अलावा, पानी की कमी के कारण खेतों की मिट्टी सख्त हो गई है, जिससे जड़ों का विकास रुक गया है।
एक और बड़ी समस्या जंगली जानवरों की है। जिन खेतों में थोड़ी बहुत हरी घास या फसल उगी भी है, वहां जंगली जानवर उसे घास समझकर चट कर जा रहे हैं। इससे किसानों की चिंता और बढ़ गई है। पहले सूखा और अब जंगली जानवरों का खतरा, दोनों मिलकर किसानों के लिए दोहरी मार साबित हो रहे हैं।
मार्च का अंतिम सप्ताह चल रहा है, लेकिन अब तक पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है। किसान आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यदि समय रहते बारिश हो जाए, तो शायद कुछ हद तक फसल को बचाया जा सके। हालांकि कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई, तो इस बार उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि वे पहले ही बढ़ती लागत और घटती आय से जूझ रहे हैं। खेती अब पहले जितनी लाभदायक नहीं रही। ऐसे में प्राकृतिक आपदा जैसी स्थिति उनके लिए और भी घातक साबित हो रही है। कई किसान परिवारों की रोजी-रोटी पूरी तरह खेती पर निर्भर है। यदि गेहूं की फसल खराब होती है, तो उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा।
किसानों ने सरकार से मांग की है कि हिमाचल प्रदेश में सूखे से प्रभावित क्षेत्रों का सर्वेक्षण कराया जाए और प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा दिया जाए। साथ ही, उन्हें सस्ती दरों पर बीज और खाद उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे अगली फसल की तैयारी कर सकें। किसानों का कहना है कि यदि सरकार समय पर राहत package की घोषणा करती है, तो उन्हें इस कठिन समय से उबरने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा, किसानों ने सिंचाई सुविधाओं को मजबूत करने की भी मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि क्षेत्र में बेहतर irrigation system हो, तो वे पूरी तरह वर्षा पर निर्भर नहीं रहेंगे। छोटी-छोटी सिंचाई योजनाएं और जल संरक्षण के उपाय भविष्य में ऐसे संकट से बचा सकते हैं।
शिमला के मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इस समय निराशा का माहौल है। जिन खेतों में इस समय हरियाली होनी चाहिए थी, वहां सूखी और कमजोर फसल नजर आ रही है। किसानों के चेहरों पर मायूसी साफ दिखाई दे रही है। वे चाहते हैं कि सरकार और प्रशासन उनकी स्थिति को समझे और जल्द से जल्द राहत के कदम उठाए।
यदि आने वाले दिनों में मौसम मेहरबान नहीं हुआ, तो इस बार गेहूं का उत्पादन काफी कम हो सकता है। इससे न केवल किसानों की आय प्रभावित होगी, बल्कि स्थानीय बाजार और खाद्यान्न आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। ऐसे में समय रहते ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है, ताकि किसानों को इस प्राकृतिक आपदा से राहत मिल सके और उनकी मेहनत पूरी तरह बर्बाद न हो।
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