तीर्थन नदी के संकट में ब्राउन ट्राउट पर खतरा, सीवेज और कचरे से बढ़ी चिंता
तीर्थन नदी के संकट में ब्राउन ट्राउट पर खतरा, सीवेज और कचरे से बढ़ी चिंता

Author : Prem Sagar

Sept. 25, 2026 4:39 p.m. 134

कुल्लू जिले की तीर्थन घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और जैव-विविधता के लिए देश-विदेश में पहचान रखती है। यहां की तीर्थन नदी में पाई जाने वाली ब्राउन ट्राउट मछली भी इस क्षेत्र की खास पहचान है। ठंडे और स्वच्छ पानी में पाई जाने वाली यह मछली नदी के जलीय पर्यावरण की स्थिति का महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है। ऐसे में नदी के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियों को लेकर पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों ने चिंता जताई है।

बाढ़ और बढ़ते पर्यटन दबाव से चिंता

युवा क्रांति दल के संयोजक ठाकुर पवन सिंह ने कहा कि हिमाचल सरकार ने तीर्थन नदी को एंगलिंग रिजर्व घोषित किया है। उनके अनुसार नदी की जैव-विविधता को बचाने के लिए प्रावधान होने के बावजूद पर्यटन गतिविधियों और निर्माण कार्यों का बढ़ता दबाव चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2023 और 2025 में आई बाढ़ से तीर्थन नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ा है। इसके अलावा नदी के आसपास सड़क निर्माण, होटल, होमस्टे और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने से सीवेज, रसोई के गंदे पानी, प्लास्टिक और ठोस कचरे के निस्तारण को लेकर भी ध्यान देने की जरूरत है।

नदी में पहुंच रहा मलबा और सिल्ट भी चिंता का विषय

ठाकुर पवन सिंह ने नदी किनारे अनियंत्रित निर्माण और बाढ़ क्षेत्र में होने वाली गतिविधियों की निगरानी की मांग की। उन्होंने कहा कि सड़क निर्माण के दौरान मिट्टी, मलबा और पत्थर नदी तक पहुंचने की स्थिति में जलीय पर्यावरण प्रभावित हो सकता है। बाढ़ के बाद नदी में जमा होने वाली सिल्ट और प्राकृतिक जलधाराओं में संभावित बदलाव को लेकर भी उन्होंने वैज्ञानिक स्तर पर अध्ययन कराने की जरूरत बताई है। हालांकि इन गतिविधियों से ब्राउन ट्राउट की संख्या या नदी की जल गुणवत्ता पर कितना वास्तविक प्रभाव पड़ा है, इसका आकलन वैज्ञानिक सर्वेक्षण से ही स्पष्ट हो सकेगा।

ब्राउन ट्राउट के लिए नियमित निगरानी की मांग

ठाकुर पवन सिंह ने कहा कि ब्राउन ट्राउट केवल एक मछली नहीं है, बल्कि तीर्थन नदी के स्वच्छ और स्वस्थ जलीय पर्यावरण की महत्वपूर्ण पहचान है। उनके अनुसार पानी की गुणवत्ता और प्राकृतिक आवास में गिरावट का असर ब्राउन ट्राउट के साथ अन्य जलीय जीवों, स्थानीय आजीविका और एंगलिंग पर्यटन पर भी पड़ सकता है। उन्होंने ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क प्रशासन, मत्स्य विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और पर्यटन विभाग से संयुक्त रूप से तीर्थन नदी का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करवाने की मांग की है।

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होटल और होमस्टे के सीवेज सिस्टम की हो जांच

उन्होंने सुझाव दिया कि नदी में गिरने वाले संभावित गंदे पानी के निकासी बिंदुओं की पहचान की जाए। इसके साथ ही होटल, होमस्टे और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में लगाए गए एसटीपी और सेप्टिक सिस्टम की भी जांच हो। नदी के पानी की गुणवत्ता की नियमित वैज्ञानिक जांच और निगरानी की व्यवस्था करने की मांग भी उठाई गई है, ताकि प्रदूषण या जलीय पर्यावरण में बदलाव की स्थिति का समय रहते पता लगाया जा सके।

पर्यटन के साथ पर्यावरण संरक्षण पर जोर

तीर्थन घाटी में पर्यटन स्थानीय लोगों के रोजगार और आजीविका का महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में पर्यटन गतिविधियों को पूरी तरह रोकने के बजाय पर्यावरणीय नियमों के पालन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर देने की मांग की जा रही है। तीर्थन नदी, इसकी जैव-विविधता और ब्राउन ट्राउट इस क्षेत्र की प्राकृतिक पहचान का हिस्सा हैं। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोगों का कहना है कि नदी की स्वच्छता और प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने के लिए समय रहते वैज्ञानिक निगरानी और प्रभावी प्रबंधन जरूरी है।

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