हिन्दू त्योहारों को एक ही दिन मनाने की आवश्यकता पर प्रवीन कुमार की अपील
हिन्दू त्योहारों को एक ही दिन मनाने की आवश्यकता पर प्रवीन कुमार की अपील

Author : Rajesh Vyas

March 3, 2026 5:48 p.m. 1923

समाज सेवा में सक्रिय और पूर्व विधायक प्रवीन कुमार ने हिन्दू त्योहारों की तिथियों को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। उन्होंने कहा कि हमारे Hindu त्योहार हमारी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। विशेष रूप से होली जैसे पावन पर्व केवल रंगों का उत्सव नहीं बल्कि भाईचारे, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का संदेश भी देते हैं।

हालांकि, प्रवीन कुमार ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि विभिन्न पंचांगों या मतभेदों के कारण यही त्योहार अलग-अलग दिन मनाए जाते हैं। इससे आम जनता में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है और सामाजिक समन्वय प्रभावित होता है। उनका मानना है कि यह समय की मांग है कि सभी धर्माचार्य, ज्योतिषाचार्य और संबंधित संस्थाएँ मिलकर वैज्ञानिक आधार और सर्वमान्य पंचांग के अनुसार त्योहारों की तिथियाँ निर्धारित करें।

पूर्व विधायक ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पूरे देश में एक ही दिन त्योहार मनाया जाए, तो समाज में एकता, उत्साह और सामूहिकता की भावना और भी अधिक मजबूत होगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत जैसे विशाल देश में जब मुस्लिम समाज के इमाम ईद के चाँद की घोषणा करते हैं, तो पूरे समुदाय में उसी तिथि के अनुसार पर्व मनाया जाता है। इसी प्रकार, हिन्दू समाज में भी विश्व हिन्दू परिषद के नेतृत्व में धर्माचार्यों, ज्योतिषाचार्यों और विद्वानों के साथ समन्वय, सामंजस्य और सहमति से त्योहारों की तिथियाँ निश्चित की जानी चाहिए।

प्रवीन कुमार ने कहा कि होली का संदेश रंगों की विविधता में एकता का है। इसी तरह, यदि हम अपने त्योहारों को भी एक स्वर और एक तिथि में मनाएँ, तो यह न केवल समाज में भ्रम को दूर करेगा बल्कि राष्ट्रीय और सामाजिक एकजुटता को भी मजबूत करेगा। उन्होंने इस प्रक्रिया के लिए धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक संस्थाओं के सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया।

पूर्व विधायक ने यह भी कहा कि त्योहार केवल व्यक्तिगत उत्सव नहीं हैं, बल्कि समाज को जोड़ने और परस्पर भाईचारे को बढ़ावा देने का एक माध्यम हैं। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि सभी हिन्दू त्योहारों की तिथियाँ एक समान हों और पूरे समाज में समान रूप से उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएँ।

इस पहल से यह उम्मीद जताई जा रही है कि हिन्दू समाज में पारंपरिक उत्सवों की महत्ता बनी रहेगी और नए पीढ़ी में सांस्कृतिक मूल्य, एकता और सामाजिक समरसता की भावना मजबूत होगी।

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