हिमाचल में 813 आत्महत्याओं की रिपोर्ट से चिंतित शांता कुमार, गरीबी और बेरोजगारी को बताया बड़ी चुनौती
हिमाचल में 813 आत्महत्याओं की रिपोर्ट से चिंतित शांता कुमार, गरीबी और बेरोजगारी को बताया बड़ी चुनौती

Author : Rajneesh Kapil Hamirpur

Oct. 10, 2026 9:57 a.m. 104

पालमपुर, 10 अक्तूबर, रजनीश कपिल: हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री शांता कुमार ने देश और प्रदेश में बढ़ती आत्महत्याओं की घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 में हिमाचल प्रदेश में 813 लोगों की आत्महत्या से जुड़ी रिपोर्ट ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। उन्होंने युवाओं में बढ़ती निराशा, गरीबी, बेरोजगारी और देश की बढ़ती आबादी को गंभीर चुनौती बताते हुए इन समस्याओं पर व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत जताई। शांता कुमार के अनुसार, आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या केवल हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत में एक वर्ष के दौरान लगभग 1.87 लाख आत्महत्याएं हुईं, जिनमें करीब 13 हजार विद्यार्थी शामिल थे। उन्होंने कहा कि समाचार पत्रों में रोजाना आत्महत्या की घटनाओं से जुड़ी खबरें सामने आना समाज और व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है।

गरीबी और बेरोजगारी से बढ़ रही युवाओं की निराशा

शांता कुमार ने कहा कि युवाओं में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे गरीबी, बेरोजगारी और उनसे पैदा होने वाली निराशा महत्वपूर्ण कारण हो सकते हैं। उन्होंने माना कि आत्महत्या के पीछे कई व्यक्तिगत और सामाजिक परिस्थितियां भी हो सकती हैं, लेकिन आर्थिक तंगी और रोजगार की अनिश्चितता युवाओं के सामने बड़ी चुनौती हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से गरीबी और बेरोजगारी कम करने के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं और युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, उनके अनुसार, रोजगार की तलाश करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या के कारण यह चुनौती लगातार बनी हुई है।

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देश की बढ़ती आबादी को बताया गंभीर समस्या

पूर्व मुख्यमंत्री ने देश की जनसंख्या में हुई वृद्धि का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1947 में भारत की आबादी लगभग 38 करोड़ थी, जबकि अब यह 140 करोड़ से अधिक हो चुकी है। उन्होंने कहा कि बढ़ती आबादी के कारण रोजगार, संसाधनों और आर्थिक अवसरों पर दबाव बढ़ता है। शांता कुमार का मानना है कि यदि जनसंख्या वृद्धि पर समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए होते, तो गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं को कम करने में मदद मिल सकती थी। उन्होंने इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता जताई।

आर्थिक विकास के बावजूद विषमता पर चिंता

शांता कुमार ने देश की आर्थिक प्रगति और समाज में मौजूद आर्थिक असमानता के बीच अंतर की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और देश में संपन्न लोगों की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसके बावजूद गरीबी और भुखमरी जैसी समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। उन्होंने आर्थिक विषमता को देश की प्रमुख चुनौतियों में से एक बताते हुए कहा कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचना जरूरी है। उनके अनुसार, यदि आर्थिक प्रगति के साथ असमानता बनी रहती है, तो गरीब और कमजोर वर्गों की मुश्किलें कम करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

आत्महत्याओं के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत

शांता कुमार ने कहा कि भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। उन्होंने बढ़ती आबादी, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दों पर राजनीतिक नेतृत्व का ध्यान आकर्षित करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि आत्महत्या की घटनाओं को केवल आंकड़ों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इनके पीछे मौजूद सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत परिस्थितियों को समझना भी आवश्यक है। गरीबी और रोजगार की अनिश्चितता से पैदा होने वाली निराशा को कम करने के लिए प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार, देश के आर्थिक विकास के साथ सामाजिक असमानता कम करने, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने और जरूरतमंद लोगों को बेहतर सहायता उपलब्ध कराने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

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