Post by : Himachal Bureau
हिमाचल प्रदेश में अनुसूचित जाति विकास कार्यक्रम के क्रियान्वयन को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है, जहाँ योजनाओं की कागजी तैयारी और धरातल की वास्तविकता के बीच भारी अंतर देखने को मिल रहा है। राज्य में इस कार्यक्रम के तहत करोड़ों रुपये की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तो तैयार की जा रही हैं, लेकिन विडंबना यह है कि इन बड़ी परियोजनाओं के लिए बजट का प्रावधान हजारों रुपये तक भी नहीं पहुँच पा रहा है। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि विभागों द्वारा इन स्कीमों के लिए 'टोकन मनी' तक जारी नहीं की जा रही है, जिससे विकास की रफ्तार पूरी तरह थम गई है। वर्तमान में लगभग चार हजार संचित कार्य ऐसे हैं जो कागजों में दर्ज हैं, लेकिन बजट के अभाव में वे धरातल पर नहीं उतर पा रहे हैं।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का कहना है कि अक्सर राजनीतिक मंचों से नई स्कीमों की घोषणाएं तो कर दी जाती हैं, लेकिन बाद में उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों में बजट प्रबंध के लिए डाल दिया जाता है, जहाँ एससीडीपी जैसे कार्यक्रमों में पूंजीगत व्यय के लिए नाममात्र का ही बजट रखा जाता है। यही कारण है कि विभिन्न जिलों में सड़कों, उठाऊ पेयजल और सिंचाई से जुड़ी महत्वपूर्ण योजनाएं सालों से अधर में लटकी हुई हैं। इस संदर्भ में विभाग के निदेशक सुमित किमटा का कहना है कि बजट की उपलब्धता के अनुसार ही स्कीमों को प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर शिकायतों का अंबार लगा है।
योजनाओं के विफल होने का एक उदाहरण पूर्व मंत्री विद्या स्टोक्स के कार्यकाल के दौरान प्रस्तावित शिरगुली-धाली सिंचाई योजना है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस योजना के लिए पाइपें तो बिछाई जा चुकी हैं, लेकिन बजट न होने के कारण यह आज तक चालू नहीं हो पाई, जिससे कई गांवों के किसान प्रभावित हो रहे हैं। इसी तरह, शिमला की 'बीरगढ़ कलाहर उठाऊ सिंचाई योजना' भी साल 2018-19 से अधर में है। लगभग दो करोड़ रुपये की इस लागत वाली योजना के लिए कभी 3 लाख तो कभी 5 लाख रुपये का सूक्ष्म बजट दिया गया, और अब हालत यह है कि इसके खाते में बजट शून्य है।
सिर्फ नई योजनाएं ही नहीं, बल्कि पुरानी मशीनरी के रखरखाव के लिए भी बजट का अकाल पड़ा हुआ है। चौपाल निर्वाचन क्षेत्र की 'बगैण उठाऊ सिंचाई योजना' की मशीनरी पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। विभाग को 16.69 लाख रुपये की आकलन रिपोर्ट सौंपने के बावजूद बजट बुक में इसके लिए शून्य प्रावधान रखा गया है। इसी तरह का हाल कसुम्पटी की 'लिफ्ट इरिगेशन स्कीम खलाओ' का भी है, जहाँ मरम्मत के लिए फंड न मिलने से पानी की सप्लाई प्रभावित हो रही है। कुल मिलाकर, राज्य में अनुसूचित जाति विकास कार्यक्रम महज कागजी औपचारिकताओं तक सीमित होता नजर आ रहा है, जिससे गरीब और ग्रामीण तबके के लोगों में सरकार के प्रति गहरा रोष पनप रहा है।
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