प्राकृतिक खेती से हरनेड़ के किसान ने चने की शानदार पैदावार हासिल की
प्राकृतिक खेती से हरनेड़ के किसान ने चने की शानदार पैदावार हासिल की

Author : Rajneesh Kapil Hamirpur

May 16, 2026 3 p.m. 1418

हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिला के निकटवर्ती हरनेड़ गांव के किसान ललित कालिया इन दिनों प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में अपनी अनोखी सफलता को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने इस बार बिना किसी रासायनिक खाद और कीटनाशक के चने की खेती कर अच्छी पैदावार हासिल की है। उनकी मेहनत और खेती के प्रति समर्पण अब दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बनता जा रहा है।

ललित कालिया लंबे समय से प्राकृतिक तरीके से खेती कर रहे हैं। उनका मानना है कि रसायन मुक्त खेती न केवल मिट्टी की गुणवत्ता को सुरक्षित रखती है बल्कि लोगों को भी शुद्ध और पौष्टिक अनाज उपलब्ध करवाती है। इस बार उन्होंने अपने खेतों में गेहूं के साथ-साथ चने की फसल भी उगाई थी। खेती पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से की गई और इसका परिणाम काफी बेहतर देखने को मिला।

उन्होंने बताया कि इस सीजन में उन्हें लगभग 75 किलोग्राम चने की पैदावार प्राप्त हुई है। खास बात यह है कि चने की गुणवत्ता भी काफी अच्छी रही। गांव के लोग और आसपास के किसान उनकी इस उपलब्धि की सराहना कर रहे हैं। इससे पहले भी ललित कालिया प्राकृतिक खेती के माध्यम से कई सफल प्रयोग कर चुके हैं। उन्होंने सीमित जमीन पर गन्ने की खेती करके अच्छी मात्रा में शक्कर तैयार की थी, जिसकी चर्चा पूरे क्षेत्र में हुई थी।

उनका कहना है कि यदि किसान आधुनिक रसायनों पर निर्भरता कम करें और पारंपरिक खेती की ओर लौटें तो खेती अधिक लाभकारी बन सकती है। ललित कालिया केवल खेती तक सीमित नहीं हैं बल्कि पुराने और दुर्लभ देसी बीजों को संरक्षित करने का भी कार्य कर रहे हैं। उन्होंने अपने घर में एक छोटा बीज बैंक तैयार किया है, जिसमें गेहूं, मक्की, जौ, बाजरा, कोदरा, कौंगणी और कई पारंपरिक फसलों के बीज सुरक्षित रखे गए हैं।

उनके पास कई प्रकार की दलहनी और तिलहनी फसलों के पुराने बीज भी मौजूद हैं। इसके अलावा सब्जियों की पारंपरिक किस्मों को भी उन्होंने संरक्षित किया हुआ है। किसानों का कहना है कि ऐसे प्रयास भविष्य में खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक खेती से खेती की लागत कम होती है और मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है। यही कारण है कि अब कई किसान इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

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