Author : Prem Sagar
ब्रेलंगा मेले में तीर्थन घाटी की आराध्य देवी माता गाड़ा दुर्गा सहित कई देवी-देवताओं ने अपने-अपने सैकड़ों हारियानों के साथ शिरकत की। इनमें गांव पेखड़ी के देवता लोमश ऋषि, गांव नाहीं के देवता चौरासी सिद्ध, गांव तिंदर के देवता लक्ष्मी नारायण, गांव फरियाडी के देवता लक्ष्मी नारायण और गांव जन्हार के देवता विमु नाग शामिल रहे। देवरथों के साथ पहुंचे हारियानों और देवलुओं की मौजूदगी ने मेले के धार्मिक स्वरूप को और खास बना दिया। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुनों के बीच देवताओं का आगमन पूरे आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहा।
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ब्रेलंगा मेले की अपनी विशेष देव परंपरा है। यहां माता गाड़ा दुर्गा की पालकी के गुशैनी मंदिर परिसर में प्रवेश से पहले अन्य देवी-देवताओं का आगमन नहीं होता। माता की पालकी के पहुंचने के बाद ही अन्य देवी-देवता अपने देवलुओं और हारियानों के साथ ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर देव मिलन में शामिल होते हैं। इस पारंपरिक प्रक्रिया के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। देव मिलन और पूजा-अर्चना की धार्मिक प्रक्रिया के बाद मेले में लोक संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए गए।
देव मिलन के बाद पारंपरिक लोक नृत्य नाटी का आयोजन किया गया। इसमें स्थानीय ग्रामीणों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर ग्रामीणों ने नाटी डालकर तीर्थन घाटी की लोक संस्कृति की झलक पेश की। मेले में धार्मिक गतिविधियों के साथ ग्रामीणों के बीच मेलजोल और आपसी भाईचारे का माहौल भी देखने को मिला। घाटी के अलग-अलग गांवों से आए लोगों ने एक साथ इस पारंपरिक आयोजन का हिस्सा बनकर अपनी देव संस्कृति से जुड़ाव को दर्शाया।
ब्रेलंगा मेला तीर्थन घाटी की पुरानी देव परंपराओं और लोक संस्कृति से जुड़ा महत्वपूर्ण आयोजन है। ऐसे मेलों के माध्यम से स्थानीय लोग अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाने के साथ नई पीढ़ी को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ रहे हैं। तीर्थन घाटी पर्यटन के लिए भी जानी जाती है। ऐसे पारंपरिक आयोजन यहां आने वाले पर्यटकों को स्थानीय देव संस्कृति और लोक परंपराओं को करीब से जानने का अवसर देते हैं। ब्रेलंगा मेले ने एक बार फिर तीर्थन घाटी की धार्मिक आस्था, देव परंपरा, लोक नृत्य और सामाजिक एकता की झलक प्रस्तुत की।
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