पालमपुर के डॉ. विकास राणा को मिलेगा ‘यंग साइंटिस्ट अवार्ड 2026’, पुरातत्व शोध के लिए हुआ चयन
पालमपुर के डॉ. विकास राणा को मिलेगा ‘यंग साइंटिस्ट अवार्ड 2026’, पुरातत्व शोध के लिए हुआ चयन

Author : Rajesh Vyas

Oct. 21, 2026 12:34 p.m. 110

पालमपुर, 21 अक्टूबर। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के पालमपुर क्षेत्र के गांव मलाहू निवासी डॉ. विकास राणा को प्रतिष्ठित ‘यंग साइंटिस्ट अवार्ड 2026’ के लिए चुना गया है। कृषि एवं पर्यावरण तकनीकी विकास संस्था (KPTVS) सोसाइटी की ओर से उन्हें यह सम्मान उनके शोध कार्य और अकादमिक योगदान के लिए प्रदान किया जाएगा। डॉ. राणा वर्तमान में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) के पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो हैं। डॉ. विकास राणा की इस उपलब्धि से पालमपुर और कांगड़ा क्षेत्र का नाम अकादमिक जगत में सामने आया है। उनका शोध प्राचीन भारत में मानव जीवन, आजीविका के साधनों, बस्तियों और पर्यावरण के साथ लोगों के संबंधों को समझने पर केंद्रित है।

जयपुर में विश्व सम्मेलन के दौरान मिलेगा सम्मान

डॉ. विकास राणा को यह पुरस्कार ‘लाइफ साइंसेज, एग्रीकल्चर, एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट सॉल्यूशंस (LAECS-2026)’ विषय पर आयोजित होने वाले आठवें विश्व सम्मेलन के पुरस्कार समारोह में प्रदान किया जाएगा। सम्मेलन 24 से 26 अक्टूबर 2026 तक जयपुर स्थित विश्वविद्यालय राजस्थान में आयोजित होना निर्धारित है। इस सम्मेलन में जीव विज्ञान, कृषि, पर्यावरण और जलवायु से संबंधित विषयों पर काम करने वाले शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और विशेषज्ञों के भाग लेने की जानकारी दी गई है। ऐसे मंच पर सम्मानित होना युवा शोधकर्ताओं के अकादमिक योगदान को पहचान दिलाने का अवसर माना जाता है।

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सतलुज-यमुना क्षेत्र पर आधारित है शोध

डॉ. राणा को उनके पीएचडी शोध-प्रबंध “सतलुज-यमुना विभाजक क्षेत्र में जीविकोपार्जन के प्रतिरूप (3200–1200 ईसा पूर्व): निरंतरताएँ और परिवर्तन” के लिए सम्मानित किया जा रहा है। उनका शोध सतलुज-यमुना विभाजक क्षेत्र में प्राचीन समुदायों की आजीविका, बस्तियों और पर्यावरण के अनुरूप जीवन जीने के तरीकों का अध्ययन करता है। इस शोध के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि प्राचीन काल में मानव समुदायों की आजीविका के स्वरूप किस प्रकार विकसित हुए और समय के साथ उनमें क्या निरंतरताएं तथा बदलाव आए। इसमें मानव जीवन और पर्यावरण के बीच संबंधों को ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक दृष्टिकोण से देखा गया है। प्राचीन बस्तियों और आजीविका के तरीकों का अध्ययन अतीत के सामाजिक जीवन को समझने में मदद करता है। साथ ही, पर्यावरण के साथ मानव समुदायों के अनुकूलन से जुड़े सवालों पर भी जानकारी मिलती है। डॉ. राणा का शोध प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व और पर्यावरण परिवर्तन के अध्ययन के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है।

शोध-निर्देशिका प्रो. पारु बल सिद्धू का जताया आभार

अपनी उपलब्धि पर डॉ. विकास राणा ने अपनी शोध-निर्देशिका प्रो. पारु बल सिद्धू के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि उनके निरंतर मार्गदर्शन, प्रोत्साहन और सहयोग ने शोध यात्रा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। शोध कार्य में मार्गदर्शन और अकादमिक सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। डॉ. राणा ने अपने शोध से जुड़ी इस उपलब्धि में अपनी शोध-निर्देशिका के योगदान को भी स्वीकार किया।

पर्यावरण और मानव अनुकूलन पर शोध आगे बढ़ाने की प्रेरणा

डॉ. विकास राणा ने कहा कि यह पुरस्कार उनके लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि इससे उन्हें अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने पुरातात्विक साक्ष्यों को पर्यावरण, सतत विकास और मानव अनुकूलन से जुड़े सवालों के साथ जोड़कर अध्ययन करने की दिशा में काम जारी रखने की बात कही। उनके अनुसार, अतीत के मानव समुदायों और पर्यावरण के बीच संबंधों को समझना शोध के लिए महत्वपूर्ण विषय है। इस तरह का अध्ययन इतिहास और पुरातत्व के साथ-साथ पर्यावरण से जुड़े व्यापक प्रश्नों को समझने में भी उपयोगी हो सकता है।

कांगड़ा और पंजाब विश्वविद्यालय के लिए उपलब्धि

‘यंग साइंटिस्ट अवार्ड’ उन युवा शोधकर्ताओं को दिया जाता है, जिन्होंने अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान, मौलिकता और शोध क्षमता का परिचय दिया हो। डॉ. विकास राणा का इस सम्मान के लिए चयन उनके शोध कार्य को मिली पहचान के रूप में देखा जा रहा है। पालमपुर के गांव मलाहू से संबंध रखने वाले डॉ. राणा वर्तमान में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में शोध कार्य कर रहे हैं। उनकी यह उपलब्धि कांगड़ा क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है और युवा शोधकर्ताओं को इतिहास, पुरातत्व तथा पर्यावरण जैसे विषयों में अध्ययन और अनुसंधान के लिए प्रेरित कर सकती है।

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