Post by : Himachal Bureau
हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में बेसहारा पशुओं की बढ़ती संख्या अब लोगों के लिए बड़ी चिंता बनती जा रही है। सड़कों, बाजारों और रिहायशी क्षेत्रों के साथ-साथ स्कूलों के आसपास भी ऐसे पशुओं की मौजूदगी से लोगों में डर का माहौल बन रहा है। सबसे ज्यादा चिंता बच्चों की सुरक्षा को लेकर है, क्योंकि स्कूल आने-जाने के दौरान उन्हें इन पशुओं के बीच से गुजरना पड़ता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई जगहों पर बेसहारा पशु घंटों तक सड़कों और गलियों में घूमते रहते हैं। कभी-कभी इनके झुंड अचानक वाहनों के सामने आ जाते हैं, जिससे दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता है। स्कूलों के आसपास स्थिति और गंभीर हो जाती है, क्योंकि छुट्टी के समय बड़ी संख्या में बच्चे एक साथ बाहर निकलते हैं। प्रदेश सरकार पहले ही बेसहारा पशुओं की समस्या से निपटने के लिए राज्य स्तर पर कार्यबल गठित कर चुकी है। सरकार के अनुसार प्रदेश में सैकड़ों गोशालाओं और गो-सदनों के माध्यम से हजारों बेसहारा पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है। इसके बावजूद कई क्षेत्रों में सड़कों और आबादी के बीच घूमते पशु यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि जमीनी स्तर पर व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
बेसहारा पशुओं की मौजूदगी स्कूलों के आसपास सबसे अधिक चिंता का विषय बन रही है। सुबह स्कूल खुलने और दोपहर में छुट्टी के समय बच्चों की आवाजाही काफी बढ़ जाती है। ऐसे में अगर सड़क या स्कूल के मुख्य द्वार के आसपास पशुओं का झुंड मौजूद हो तो बच्चों के लिए परेशानी पैदा हो सकती है। अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को अकेले स्कूल भेजते समय उन्हें लगातार चिंता रहती है। छोटे बच्चे अचानक सामने आए पशु को देखकर घबरा सकते हैं और भागने की कोशिश में सड़क पर गिरने या वाहन की चपेट में आने का खतरा भी पैदा हो सकता है।
बेसहारा पशुओं की समस्या केवल सड़कों तक सीमित नहीं है। कई रिहायशी इलाकों में भी लोगों को इनसे परेशानी का सामना करना पड़ता है। गलियों में घूमते पशु कूड़े के ढेर के आसपास जमा हो जाते हैं। इससे गंदगी फैलने के साथ-साथ लोगों के आने-जाने में भी परेशानी होती है। बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह समस्या ज्यादा गंभीर मानी जा रही है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि प्रशासन को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहां पशुओं की संख्या अधिक है और वहां नियमित कार्रवाई की जानी चाहिए।
सड़कों पर घूमते बेसहारा पशु वाहन चालकों के लिए भी बड़ा खतरा बन सकते हैं। खासकर रात के समय कम रोशनी वाले रास्तों पर अचानक सड़क के बीच आ जाने वाले पशुओं को देख पाना मुश्किल होता है। दोपहिया वाहन चालक ऐसे मामलों में संतुलन खो सकते हैं। तेज रफ्तार वाहनों के लिए स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है। इसलिए लोगों का कहना है कि सड़क किनारे और आबादी वाले क्षेत्रों से पशुओं को हटाने के लिए नियमित अभियान चलाया जाना चाहिए।
हिमाचल में बेसहारा पशुओं की समस्या पुरानी है, लेकिन कई स्थानों पर इसके लगातार बने रहने से प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। सरकार की ओर से गोशालाओं और गो-सदनों में पशुओं को रखने की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन लोगों की शिकायत है कि इसके बावजूद बड़ी संख्या में पशु सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई देते हैं। सरकार ने समस्या से निपटने के लिए राज्य स्तरीय कार्यबल बनाया है। साथ ही नए आश्रय स्थलों के निर्माण की दिशा में भी काम किया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 222 गोशालाओं और गो-सदनों में 23 हजार से अधिक बेसहारा पशुओं को आश्रय दिया जा रहा है।
विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के अनुसार समस्या का स्थायी समाधान केवल नए आश्रय स्थल बनाने से नहीं होगा। पशुओं के संरक्षण के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पालतू पशुओं को उनके मालिक खुले में न छोड़ें। यदि कोई व्यक्ति अपने पशु को सड़क पर छोड़ता है तो उसके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की व्यवस्था भी जरूरी है। इसके अलावा नगर निकायों, पंचायतों और पशुपालन विभाग के बीच बेहतर तालमेल होने से समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि स्कूलों, अस्पतालों, बाजारों और रिहायशी इलाकों के आसपास विशेष निगरानी रखी जाए। जिन स्थानों पर बार-बार पशुओं के झुंड दिखाई देते हैं, वहां नियमित अभियान चलाकर उन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया जाए। लोगों का कहना है कि किसी हादसे या हमले के बाद कार्रवाई करने के बजाय पहले से व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए। बच्चों की सुरक्षा को देखते हुए स्कूलों के आसपास विशेष व्यवस्था करना भी जरूरी है।
हिमाचल के पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों और आबादी के आसपास घूमते बेसहारा पशु कई तरह की समस्याएं पैदा करते हैं। एक तरफ किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचने की शिकायतें सामने आती हैं, वहीं दूसरी ओर सड़क दुर्घटनाओं और सार्वजनिक सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है। हाल के दिनों में प्रदेश में पशुओं से जुड़ी समस्याओं को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों से आवाजें उठती रही हैं। ऐसे में इस मुद्दे का समाधान केवल स्थानीय स्तर की कार्रवाई से नहीं, बल्कि लंबे समय की योजना के तहत किए जाने की जरूरत है।
बेसहारा पशुओं के मामले में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा आम लोगों की सुरक्षा है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर बुजुर्गों और वाहन चालकों तक, सभी को इसका सामना करना पड़ सकता है। प्रशासन के सामने अब चुनौती यह है कि सरकारी योजनाओं और आश्रय व्यवस्था का लाभ जमीन पर कितना पहुंच रहा है। यदि पशुओं को सुरक्षित आश्रय देने के साथ खुले में छोड़ने की समस्या पर भी प्रभावी नियंत्रण किया जाए तो स्थिति में सुधार आ सकता है।
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