Post by : Himachal Bureau
हिमाचल प्रदेश में अभी मानसून की औपचारिक शुरुआत नहीं हुई है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएं सामने आने लगी हैं। ताजा मामला किन्नौर जिले के पोवारी क्षेत्र का है, जहां शुक्रवार सुबह शोंगटोंग जलविद्युत परियोजना की बैराज साइट पर अचानक भारी लैंडस्लाइड हो गया। इस घटना के बाद निर्माण स्थल पर काम कर रहे मजदूरों और स्थानीय लोगों में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
अचानक दरकी पहाड़ी, नीचे आया भारी मलबा
जानकारी के अनुसार शोंगटोंग जलविद्युत परियोजना की बैराज साइट पर नियमित निर्माण कार्य चल रहा था। इसी दौरान पहाड़ी का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर नीचे आ गया। देखते ही देखते भारी मात्रा में मलबा, मिट्टी और कई बड़े पेड़ ढलान से नीचे गिरने लगे। घटना इतनी अचानक हुई कि कुछ समय के लिए पूरे क्षेत्र में धूल का घना गुबार छा गया।
मौके पर मौजूद लोगों ने बताया कि पहाड़ी से लगातार मलबा गिरता देख मजदूर तुरंत सुरक्षित स्थानों की ओर भागे। समय रहते सभी लोगों के हट जाने के कारण कोई भी व्यक्ति इसकी चपेट में नहीं आया और एक बड़ा हादसा टल गया।
मजदूरों ने सूझबूझ से बचाई अपनी जान
लैंडस्लाइड के समय निर्माण कार्य में लगे कई मजदूर साइट पर मौजूद थे। जैसे ही पहाड़ी खिसकने के संकेत मिले, उन्होंने तुरंत वहां से दूरी बना ली। यदि कुछ सेकंड की भी देरी होती तो जान-माल का बड़ा नुकसान हो सकता था। स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में लगातार पहाड़ी ढलानों पर दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में निर्माण कार्य वाले क्षेत्रों में अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना से बचा जा सके।
बैराज निर्माण को पहुंचा नुकसान
इस भूस्खलन का सबसे अधिक असर निर्माणाधीन बैराज पर पड़ा है। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार बैराज के कुछ हिस्सों को नुकसान पहुंचा है। हालांकि नुकसान का पूरा आकलन संबंधित विभागों द्वारा किया जा रहा है। परियोजना से जुड़े अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया। विशेषज्ञ टीम अब यह जांच कर रही है कि भूस्खलन के कारण निर्माण कार्य पर कितना प्रभाव पड़ा है और आगे सुरक्षा के लिए किन कदमों की जरूरत होगी।
पेट्रोल पंप और मकान पर भी मंडराया खतरा
घटनास्थल के पास स्थित एक पेट्रोल पंप और एक आवासीय मकान भी इस लैंडस्लाइड के कारण खतरे की जद में आ गए हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि यदि भविष्य में दोबारा इसी तरह पहाड़ी का हिस्सा खिसकता है तो इन संरचनाओं को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। लोगों ने प्रशासन से क्षेत्र का विस्तृत निरीक्षण करवाने और आवश्यक सुरक्षा उपाय करने की मांग की है ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते रोका जा सके।
शिमला में भी सामने आया था ऐसा ही मामला
इस घटना से एक दिन पहले राजधानी शिमला के संजौली-ढली बाईपास स्थित लंबीधार क्षेत्र में भी पहाड़ी दरकने की घटना सामने आई थी। वहां भारी चट्टानें, पेड़ और मलबा सड़क पर गिर गया था, जिसके कारण यातायात कई घंटों तक प्रभावित रहा। लोक निर्माण विभाग की टीम ने तुरंत राहत कार्य शुरू किया और सड़क को पहले आंशिक तथा बाद में पूरी तरह यातायात के लिए बहाल कर दिया। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
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बढ़ी सुरक्षा और भू-स्थिरता की चिंता
मानसून से पहले ही विभिन्न क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाएं सामने आने से पहाड़ी इलाकों में सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित निगरानी, ढलानों का वैज्ञानिक अध्ययन और समय पर सुरक्षा उपाय बेहद जरूरी हैं।
किन्नौर में हुई यह घटना भले ही बिना जनहानि के समाप्त हुई हो, लेकिन इसने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि मानसून के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों में विशेष सतर्कता की आवश्यकता होगी। प्रशासन और संबंधित विभाग अब ऐसे क्षेत्रों पर नजर बनाए हुए हैं ताकि भविष्य में किसी भी बड़े हादसे को रोका जा सके।
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